उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के मनियर वार्ड नंबर 13 से एक बेहद मर्मस्पर्शी और झकझोर देने वाली कहानी सामने आई है। इस परिवार ने माता-पिता दोनों को खो दिया है, जिससे बच्चों के सिर से बड़ों का साया पूरी तरह उठ चुका है। इस कठिन परिस्थिति ने पूरे इलाके को भावुक कर दिया है, क्योंकि बच्चों के पिता के निधन के बाद अब उनकी मां भी इस दुनिया में नहीं रहीं। मां की अंतिम सांसें जब चल रही थीं, तब उन्होंने अपनी सबसे बड़ी बेटी से जो शब्द कहे, वे आज भी उस परिवार और पूरे क्षेत्र के जेहन में गूंज रहे हैं।
मां के आखिरी शब्द बने जीने का सहारा
जब मां अंतिम समय में थीं, तब उन्होंने अपनी बेटी से कहा था कि छोटे-छोटे बच्चे हैं और अब उनका आधार वही है। मां की इन बातों को सुनकर आसपास के लोग भी अपने आंसू नहीं रोक पाए थे। साल 2016 में इन बच्चों के सिर से पिता का साया उठ चुका था, उस समय सभी बच्चे बहुत छोटे थे। इसके बाद मां ने खेतों में मजदूरी करके किसी तरह अपने चारों बच्चों का पेट पाला और उन्हें पाल-पोसकर बड़ा किया। लेकिन करीब दो-तीन महीने पहले गंभीर बीमारियों और लगातार अभावों के चलते मां भी महज 41 वर्ष की आयु में दुनिया छोड़कर चली गईं।
19 साल की उम्र में कंधों पर आया पूरा घर
अब इस परिवार की सारी जिम्मेदारी 19 साल की बड़ी बेटी खुशबू प्रसाद के कंधों पर आ गई है। जिस उम्र में एक युवती को अपनी मां के आंचल में रहकर अपने भविष्य के सपने देखने चाहिए थे, उस उम्र में उसे अपनी मां की अर्थी को कंधा देना पड़ा। परिवार में खुशबू के अलावा दो छोटी बहनें और एक 14 साल का भाई शामिल है, जो सभी नाबालिग हैं। मां के अंतिम संस्कार के दौरान चारों भाई-बहनों ने मिलकर अर्थी को कंधा दिया था। उस पल ऐसा लगा मानो खुशबू की पूरी दुनिया ही उजड़ गई हो, लेकिन मां की आखिरी सीख ने उसे भीतर से मजबूत बना दिया।
दिनभर संघर्ष और रात को चूल्हे-चौके की फिक्र
आज खुशबू अपने छोटे भाई-बहनों के लिए माता और पिता दोनों की भूमिका निभा रही है। उसकी रोजमर्रा की सुबह बहुत संघर्ष के साथ शुरू होती है, जहाँ वह सुबह जल्दी उठकर बच्चों को तैयार करती है, उनके टिफिन का इंतजाम करती है और उन्हें स्कूल भेजती है। इसके बाद वह खुद बस स्टेशन के पास जाकर कड़ी मेहनत और मजदूरी करती है। शाम को घर लौटने पर वह भाई-बहनों की देखभाल करने के साथ-साथ खाना बनाती है और घर में पाली गई एक गाय के चारे-पानी की व्यवस्था भी खुद ही संभालती है। मजदूरी से मिलने वाले थोड़े-बहुत पैसों से वह किसी तरह घर का चूल्हा जलाने और सबकी पढ़ाई लिखाई को बचाने की कोशिश कर रही है।
प्रशासन और सरकार से मदद की गुहार
इतनी कम उम्र में इस तरह की विकट परिस्थितियों का सामना कर रही खुशबू के मन में यही सबसे बड़ा सवाल रहता है कि वह अपने भाई-बहनों को कब तक और कैसे पढ़ा पाएगी। इस अनाथ परिवार को इस समय किसी की दया की नहीं, बल्कि एक ठोस सरकारी सहारे और अवसर की आवश्यकता है। खुशबू और उसके परिवार ने बलिया के जिलाधिकारी मंगला प्रसाद सिंह तथा शासन से गुहार लगाई है कि उनकी कुछ आर्थिक मदद की जाए। उसे पूरी उम्मीद है कि जिला प्रशासन इस मामले में सुध लेगा और उनके टूटे हुए सपनों को फिर से संबल प्रदान करेगा।



















