नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान दुनिया के सबसे प्रभावशाली नेताओं की मुलाकातों के बीच एक शांत और गंभीर चेहरा लगातार चर्चा के केंद्र में बना रहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से गर्मजोशी से मिल रहे थे या चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ द्विपक्षीय बातचीत कर रहे थे, ठीक उसी समय उनके साए की तरह एक युवा भारतीय राजनयिक हर फ्रेम में मौजूद थे। दोनों शीर्ष नेताओं के बीच खड़े होकर बातचीत को ध्यान से सुनते और उसका सटीक संप्रेषण करते इस अधिकारी की तस्वीरें जब सोशल मीडिया पर सामने आईं, तो हर कोई यह जानने को उत्सुक हो गया कि वैश्विक महाशक्तियों के इस मंच पर प्रधानमंत्री के साथ खड़ा यह शख्स कौन है।
यह अधिकारी केरल के कोच्चि के रहने वाले सिद्धार्थ बाबू हैं। वह 2017 बैच के भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस) अधिकारी हैं और इस ऐतिहासिक ब्रिक्स सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आधिकारिक राजनयिक इंटरप्रेटर की बेहद अहम भूमिका निभा रहे थे। वर्तमान में वह विदेश मंत्रालय के यूरोप और यूरेशिया प्रभाग में उप सचिव के पद पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
उच्चस्तरीय कूटनीति में इंटरप्रेटर की संवेदनशील भूमिका
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के बंद कमरों में इंटरप्रेटर केवल एक भाषा को दूसरी भाषा में बदलने वाला अनुवादक भर नहीं होता, बल्कि वह दो अलग-अलग देशों और संस्कृतियों के बीच भरोसे का सबसे नाजुक माध्यम होता है। जब रूस और चीन जैसे देशों के सर्वोच्च नेता आमने-सामने बैठते हैं, तब कही गई बात का भाव, कूटनीतिक शिष्टाचार और लहजा बेहद मायने रखता है। ऐसे में एक भी गलत या असंतुलित शब्द पूरे कूटनीतिक विमर्श की दिशा बदल सकता है।
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की गहरी और जटिल कूटनीतिक भाषा के सूक्ष्म संदेशों को सही संदर्भ में पकड़ना और तुरंत प्रधानमंत्री तक पहुंचाना भारी मानसिक दबाव का काम होता है। सिद्धार्थ बाबू ने इस जिम्मेदारी को अत्यंत सहजता और पेशेवर अंदाज में पूरा किया। विदेश मंत्रालय में यूरेशिया और यूरोप डेस्क की जिम्मेदारी संभालने के कारण उन्हें इस पूरे भौगोलिक क्षेत्र के भू-राजनीतिक समीकरणों, नीतियों और राजनयिक बारीकियों की जमीनी समझ है, जिसका सीधा लाभ इस अहम बैठक में मिला।
इंजीनियरिंग से ई-कॉमर्स और फिर यूपीएससी का सफर
केरल की सांस्कृतिक और व्यापारिक नगरी कोच्चि से निकलकर नई दिल्ली स्थित साउथ ब्लॉक तक सिद्धार्थ बाबू का सफर दृढ़ संकल्प से भरा रहा है। उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा मैकेनिकल इंजीनियरिंग में पूरी की थी। कॉलेज के बाद उन्होंने शुरुआत में निजी क्षेत्र में काम करना शुरू किया, जिसमें ई-कॉमर्स का क्षेत्र भी शामिल था। हालांकि, उनका असली रुझान वैश्विक मामलों और विदेश नीति की तरफ था।
निजी क्षेत्र में काम करने के बाद उन्होंने संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी का फैसला किया। साल 2016 की सिविल सेवा परीक्षा में उन्होंने पूरे देश में 15वीं रैंक (एआईआर 15) हासिल की। इतनी शानदार रैंक हासिल करने के बाद उन्हें भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) का पद बेहद आसानी से मिल सकता था, जिसे देश में सबसे प्रतिष्ठित करियर माना जाता है। इसके बावजूद सिद्धार्थ बाबू ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों और वैश्विक कूटनीति के प्रति अपने गहरे लगाव के चलते भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस) को चुना।
भाषा दक्षता और राष्ट्रीय आयोजनों में अहम जिम्मेदारियां
विदेश सेवा में चयन के बाद प्रशिक्षण के दौरान उन्होंने विदेशी भाषाओं पर विशेष महारत हासिल की। यह भाषाई दक्षता उनके दैनिक राजनयिक कामकाज और बहुपक्षीय वार्ताओं में सबसे बड़ी ताकत साबित हुई है। सिद्धार्थ बाबू को इससे पहले भी कई महत्वपूर्ण राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अवसरों पर ऐसी अहम भूमिकाएं निभाते देखा जा चुका है। इसी साल गणतंत्र दिवस समारोह के अवसर पर भी वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मौजूद थे और विदेशी मेहमानों के साथ उच्चस्तरीय संवाद में सहायता कर रहे थे। वैश्विक मंच पर देश के हितों को कुशलता से आगे बढ़ाते हुए वह नई पीढ़ी के भारतीय राजनयिकों के सशक्त चेहरे के रूप में उभरे हैं।



















