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चंदौली के कुंडा में धान रोपाई के बीच उभरा महिला मजदूरों का दर्द, 250 रुपये दिहाड़ी के बाद सालभर सताती है बेकारीउत्तर प्रदेश
1 अग॰ 2026, 8:39 am (2 घंटे पहले)· 1

चंदौली के कुंडा में धान रोपाई के बीच उभरा महिला मजदूरों का दर्द, 250 रुपये दिहाड़ी के बाद सालभर सताती है बेकारी

उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले के कुंडा गांव में धान रोपाई का काम शुरू होने के साथ ही महिला कृषि मजदूरों का दर्द छलक पड़ा है। 10 से 20 दिनों की मौसमी मजदूरी और 250 रुपये की दिहाड़ी के सहारे परिवार चलाने वाली ये महिलाएं सालभर स्थायी रोजगार और सरकारी योजनाओं के लाभ का इंतजार कर रही हैं।

उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले में मानसून के आगमन के साथ ही कृषि गतिविधियों में तेजी आई है, लेकिन इसके पीछे ग्रामीण महिला मजदूरों का संघर्ष भी खुलकर सामने आ रहा है। जिले के मुगलसराय विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले कुंडा गांव के खेतों में इन दिनों धान की रोपाई का काम पूरी रफ्तार से चल रहा है। इलाके में पर्याप्त वर्षा न होने और सिंचाई नहरों में पानी का संकट बने रहने के बावजूद, किसान छिटपुट बारिश की बूंदों के बीच अपने खेतों को तैयार कर रोपाई करवा रहे हैं। पानी से लबालब भरे खेतों में सुबह से शाम तक झुकी कमर के साथ काम कर रही महिला मजदूरों का कहना है कि यह सीजनल रोजगार बेहद सीमित समय के लिए होता है। महज 10 से 20 दिनों की यह रोपाई खत्म होते ही उनके सामने आजीविका का गंभीर संकट खड़ा हो जाता है और उन्हें फसल की कटाई का मौसम आने तक बेरोजगार होकर घर बैठना पड़ता है। हालांकि इस साल रोपाई की मजदूरी में थोड़ी बढ़ोतरी हुई है, लेकिन बढ़ती महंगाई के इस दौर में यह दैनिक दिहाड़ी परिवार का गुजारा चलाने के लिए नाकाफी साबित हो रही है।

सीमित दिनों का रोजगार और महंगाई की मार

कुंडा गांव के कृषि भूखंडों पर लगभग 8 महिलाओं का एक दल एक साथ मिलकर धान के पौधों की रोपाई में जुटा हुआ है। घुटनों तक भरे पानी और कीचड़ के बीच खड़े होकर एक तय दूरी पर धान की पौध लगाना अत्यधिक शारीरिक श्रम और लंबे अनुभव की मांग करता है। इस कठिन प्रक्रिया में जुटी गुड्डी देवी कई वर्षों से लगातार रोपाई का कार्य करती आ रही हैं। उनका कहना है कि पिछले वर्ष रोपाई के एवज में मजदूरों को 8 किलो गेहूं या लगभग 200 रुपये दैनिक मजदूरी के रूप में दिए जाते थे। इस वर्तमान सीजन में इसमें थोड़ा इजाफा हुआ है और अब मजदूरी बढ़ाकर 10 किलो गेहूं या करीब 250 रुपये प्रतिदिन कर दी गई है। इसके बावजूद गुड्डी देवी का स्पष्ट मानना है कि आज के समय में आवश्यक वस्तुओं के आसमान छूते दामों के कारण 250 रुपये की यह राशि एक बड़े परिवार के पालन-पोषण के लिए बेहद कम है। रोपाई का 10 से 20 दिन का दौर बीत जाने के बाद गांव में काम का कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता, जिससे पूरे परिवार को तंगी के दौर से गुजरना पड़ता है।

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हाड़तोड़ मेहनत और कटाई के मौसम का इंतजार

खेतों में रोपाई कर रही एक अन्य महिला मजदूर गायत्री देवी बीते 2 वर्षों से इस कृषि कार्य से जुड़ी हुई हैं। उन्होंने बताया कि विवाह के बाद अपनी ससुराल आकर उन्होंने धान की रोपाई की यह पारंपरिक तकनीक सीखी। गायत्री देवी के अनुसार, वह एक दिन में औसतन लगभग ढाई बिस्वा खेत में पौध लगाने का काम पूरा कर लेती हैं। इस कड़ी मेहनत के बदले उन्हें भी 10 किलो गेहूं अथवा 250 रुपये का दैनिक पारिश्रमिक प्राप्त होता है। रोपाई का सीजन समाप्त होते ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कृषि श्रम की मांग ठप हो जाती है। इसके बाद इन महिलाओं को कई महीनों तक धान की फसल पकने और कटाई का मौसम शुरू होने का बेसब्री से इंतजार करना पड़ता है। कटाई के दौरान कुछ दिनों का काम पुनः मिलता है, परंतु साल के बाकी सभी महीनों में नियमित रोजगार का कोई स्थायी जरिया न होने से जीवनयापन की अनिश्चितता बनी रहती है।

सरकारी कल्याणकारी योजनाओं से वंचित रहने की पीड़ा

कठिन शारीरिक मेहनत और सीमित मजदूरी के साथ-साथ इन महिला मजदूरों की सबसे बड़ी निराशा सरकारी जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ न मिल पाना है। गुड्डी देवी ने अपनी व्यथा साझा करते हुए बताया कि उन्होंने सिर पर पक्की छत के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना सहित कई अन्य सरकारी सुविधाओं के लिए बार-बार आवेदन किए हैं। अनेक बार अपनी व्यक्तिगत जानकारी और दस्तावेज जमा कराने के बावजूद आज तक उनका नाम किसी भी सरकारी योजना की लाभार्थी सूची में शामिल नहीं किया गया। यही स्थिति गायत्री देवी की भी है, जिन्हें अब तक न तो आवास योजना का लाभ मिला है और न ही बुनियादी शौचालय जैसी सुविधाएं नसीब हुई हैं। उन्होंने बताया कि कई मौकों पर सूची में नाम जुड़ने की उम्मीद जगती है, लेकिन जमीनी स्तर पर परिणाम शून्य ही रहता है। इसके अतिरिक्त गांव की कई महिलाओं ने यह भी शिकायत की कि उन्हें उज्ज्वला योजना के तहत रसोई गैस कनेक्शन तो मिल गया, लेकिन खातों में सब्सिडी न आने के कारण सिलेंडर भरवाना भारी पड़ रहा है।

स्थायी रोजगार और पारदर्शी कार्यान्वयन की मांग

वर्षों से खेतों में पसीना बहा रही मीरा देवी का परिवार पूरी तरह से खेती-किसानी की मजदूरी पर ही आश्रित है। मीरा देवी ने बताया कि धान की रोपाई और तत्पश्चात फसल की कटाई के संक्षिप्त अवधियों को छोड़कर उनके पास कमाई का कोई अन्य माध्यम उपलब्ध नहीं है। उन्होंने शासन-प्रशासन से पुरजोर अपील की है कि गरीब मजदूर परिवारों तक सरकारी योजनाओं की पहुंच पूरी ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ सुनिश्चित की जाए। कुंडा गांव की यह जमीनी तस्वीर उत्तर प्रदेश के ग्रामीण अंचल की श्रमजीवी महिलाओं की वास्तविकता को उजागर करती है। मौसम की मार, नहरों के जल संकट और सीमित संसाधनों के बीच परिवार पाल रही इन महिलाओं की मांग है कि सरकार केवल मौसमी कृषि कार्यों पर उनकी निर्भरता समाप्त करे। ग्रामीण क्षेत्रों में कुटीर उद्योगों या अन्य माध्यमों से सालभर रोजगार के स्थायी अवसर पैदा किए जाने चाहिए ताकि उनका जीवन केवल 250 रुपये की अल्पकालिक दिहाड़ी और अनिश्चित मौसम के भरोसे न रहे।

सवाल-जवाब

चंदौली के कुंडा गांव में महिला मजदूरों को धान रोपाई के लिए क्या मजदूरी मिल रही है?
इस वर्ष महिला मजदूरों को धान रोपाई के बदले 10 किलो गेहूं या लगभग 250 रुपये दैनिक मजदूरी मिल रही है, जो पिछले साल के 8 किलो गेहूं या 200 रुपये से अधिक है।
धान की रोपाई का काम साल में कितने दिनों तक चलता है?
खेत में धान की रोपाई का काम केवल 10 से 20 दिनों तक ही चलता है, जिसके बाद कटाई का मौसम आने तक मजदूरों को काम की तलाश में घर बैठना पड़ता है।
गायत्री देवी एक दिन में कितने खेत की रोपाई कर लेती हैं?
गायत्री देवी एक दिन में लगभग ढाई बिस्वा खेत की धान रोपाई कर लेती हैं, जिसके एवज में उन्हें 10 किलो गेहूं या करीब 250 रुपये मिलते हैं।
ग्रामीण महिला मजदूरों की मुख्य शिकायतें क्या हैं?
महिला मजदूरों की मुख्य शिकायतें सालभर नियमित रोजगार का न होना, बढ़ती महंगाई में कम दिहाड़ी और प्रधानमंत्री आवास योजना व शौचालय जैसी सरकारी योजनाओं का लाभ न मिलना हैं।
बारिश और सिंचाई की क्या स्थिति बताई गई है?
जिले में पर्याप्त बारिश नहीं होने और नहरों में पानी की भारी कमी के बावजूद किसान हल्की बारिश के सहारे खेतों में धान की रोपाई करवा रहे हैं।
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