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गंडक और झरही नदियों का जलस्तर बढ़ते ही महराजगंज जिले के किसानों की फसलें डूबने लगती हैंउत्तर प्रदेश
22 जुल॰ 2026, 5:33 am (45 दिन पहले)· 0

गंडक और झरही नदियों का जलस्तर बढ़ते ही महराजगंज जिले के किसानों की फसलें डूबने लगती हैं

उत्तर प्रदेश के महराजगंज जिले में नेपाल की पहाड़ियों से आने वाली गंडक और झरही नदियों के उफनते ही सीमावर्ती इलाके के किसानों की हजारों एकड़ फसल हर साल पानी में डूब जाती है।

उत्तर प्रदेश के महराजगंज जिले में मानसून एक अजीब दोहरा असर लेकर आता है, हल्की बारिश खेतों को हरा-भरा कर देती है, लेकिन थोड़ी ज्यादा बारिश ही किसानों की पूरे साल की मेहनत को चंद घंटों में डुबो देती है। जिले का इंडो-नेपाल सीमावर्ती इलाका हर बरसात में इसी संकट से जूझता है, जहां किसान हर साल अपनी आंखों के सामने फसल को पानी में बहते देखने को मजबूर हैं।

नेपाल के पहाड़ों की बारिश से नदियां उफान पर

महराजगंज जिले से होकर गंडक नदी और झरही नदी जैसी कई छोटी-बड़ी नदियां गुजरती हैं, जो नेपाल के पहाड़ों से निकलती हैं। इन नदियों के दोनों किनारों पर सीमावर्ती इलाके के किसानों की हजारों एकड़ खेती की जमीन फैली हुई है। मानसून शुरू होते ही नेपाल की पहाड़ियों में बारिश तेज हो जाती है और इसका सीधा असर इन नदियों के जलस्तर पर पड़ता है। नदियां उफनती हैं और उनका पानी सीमा पार कर सीधे महराजगंज के खेतों में घुस आता है।

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महीनों की मेहनत मिनटों में बर्बाद

नेपाल के पहाड़ी इलाकों में जब लगातार दो-तीन दिन तेज बारिश होती है, तो सीमावर्ती किसानों की हजारों एकड़ फसल पानी में डूब जाती है। जिस फसल को किसान पूरे सीजन दिन-रात मेहनत करके तैयार करते हैं, वह उनकी आंखों के सामने ही बर्बाद हो जाती है। बाढ़ की इस स्थिति में सबसे ज्यादा नुकसान धान, गन्ना और दूसरी मौसमी फसलों को होता है, क्योंकि यही फसलें इस मौसम में खेतों में खड़ी होती हैं।

हर साल एक जैसा मंजर, राहत कहीं नजर नहीं आती

महराजगंज के इंडो-नेपाल सीमावर्ती इलाके के ज्यादातर गांव बरसात के मौसम में बाढ़ से जूझते हैं। पहाड़ों में भारी बारिश शुरू होते ही नदियों का जलस्तर तेजी से बढ़ता है और इसका सीधा असर इन गांवों पर पड़ता है। बाढ़ आते ही सैकड़ों एकड़ फसल बर्बाद होने लगती है। किसानों के लिए यह कोई नई मुसीबत नहीं है, बल्कि हर साल दोहराई जाने वाली त्रासदी है। जिस फसल को किसान अपनी मेहनत और जान लगाकर तैयार करते हैं, बारिश तेज होते ही वे उसे अपनी ही आंखों के सामने बर्बाद होते देखते हैं। साल-दर-साल यही हाल होने के बावजूद अब तक इसका कोई स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है, जिसकी वजह से किसान हर बरसात में इस पीड़ा को झेलने को मजबूर हैं। इस सीमावर्ती इलाके में कई किसानों की पूरी आर्थिक स्थिति इन्हीं खेतों पर टिकी है, इसलिए बाढ़ आने पर उन्हें भारी आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ता है।

गांवों में भी घुसा पानी, जिंदगी अस्त-व्यस्त

बाढ़ का असर सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं रहता, बरसात शुरू होते ही महराजगंज के सीमावर्ती इलाकों में पानी जमा होने लगता है, जिससे किसानों की फसल के साथ-साथ उनका रोजमर्रा का जीवन भी प्रभावित होता है। जिले के निचलौल क्षेत्र के सीमावर्ती गांव जैसे भेड़िहारी, सोहगीबरवा, शिकारपुर और भोतहा में ज्यादा बारिश होने पर पानी भर जाता है, जिससे लोगों के लिए अपने घरों से बाहर निकलना तक मुश्किल हो जाता है।

एक फसल पर निर्भर किसानों की मुश्किलें और बढ़ीं

बाढ़ का असर सिर्फ किसानों की आर्थिक स्थिति पर ही नहीं, बल्कि इलाके के सामाजिक जनजीवन पर भी पड़ता है। इस क्षेत्र के ज्यादातर किसानों के खेत नदी के आसपास होने के चलते वे साल में सिर्फ एक ही सीजन में खेती कर पाते हैं। ऐसे में जब मानसून के दौरान बाढ़ आती है, तो उनके खेत में उस सीजन कोई पैदावार ही नहीं हो पाती, जिससे उनकी पूरे साल की आमदनी पर सीधा असर पड़ता है। नदी किनारे बसे इन गांवों के किसानों के पास फिलहाल इस बार-बार होने वाले नुकसान से बचने का कोई ठोस उपाय नहीं है, इसलिए हर मानसून में वे एक बार फिर उसी बर्बादी के मंजर से गुजरते हैं।

सवाल-जवाब

महराजगंज में हर साल बाढ़ क्यों आती है?
नेपाल के पहाड़ों में तेज बारिश होते ही गंडक और झरही जैसी नदियों का जलस्तर बढ़ जाता है, जिसका पानी सीमा पार कर महराजगंज के खेतों में घुस आता है।
बाढ़ से सबसे ज्यादा नुकसान किन फसलों को होता है?
बाढ़ में धान, गन्ना और अन्य मौसमी फसलों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचता है, क्योंकि यही फसलें उस समय खेतों में खड़ी होती हैं।
बाढ़ से महराजगंज के कौन से गांव सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं?
निचलौल क्षेत्र के भेड़िहारी, सोहगीबरवा, शिकारपुर और भोतहा जैसे सीमावर्ती गांवों में हर बरसात पानी भर जाता है।
क्या किसानों के लिए बाढ़ से बचाव का कोई स्थायी इंतजाम है?
अभी तक इसका कोई स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है, जिसकी वजह से किसानों को हर साल यही नुकसान झेलना पड़ता है।
इन इलाकों के किसान साल में कितनी बार खेती कर पाते हैं?
नदी किनारे खेत होने के चलते ज्यादातर किसान साल में सिर्फ एक ही सीजन में खेती कर पाते हैं।
क्या बाढ़ का असर सिर्फ खेती तक ही सीमित रहता है?
नहीं, बाढ़ के दौरान गांवों में पानी भरने से लोगों का घरों से निकलना भी मुश्किल हो जाता है।
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