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पुलिस की नौकरी के लिए फर्जीवाड़ा, 27 साल बाद दोषी को मिली जेल की सजाउत्तर प्रदेश
12 जुल॰ 2026, 7:10 am (45 दिन पहले)· 1

पुलिस की नौकरी के लिए फर्जीवाड़ा, 27 साल बाद दोषी को मिली जेल की सजा

आगरा की एक अदालत ने 1999 में पुलिस भर्ती के दौरान जाली हलफनामा जमा करने वाले एक व्यक्ति को तीन साल की कैद सुनाई है। आरोपी को धोखाधड़ी और दस्तावेजों में हेरफेर का दोषी पाया गया है।

उत्तर प्रदेश के आगरा की एक अदालत ने एक लंबे समय से लंबित मामले में अपना फैसला सुनाते हुए एक व्यक्ति को तीन साल की जेल की सजा सुनाई है। यह मामला लगभग 27 साल पुराना है, जब आरोपी ने पुलिस विभाग में भर्ती होने के लिए गलत तरीकों का सहारा लिया था। अदालत ने उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले के सिथरपुर गांव निवासी भोजराज को प्रादेशिक आर्म्ड कांस्टेबुलरी (PAC) में कांस्टेबल के पद पर नियुक्त होने के लिए जाली दस्तावेजों और फर्जी हलफनामे का उपयोग करने का दोषी करार दिया है। सजा के अलावा, अदालत ने आरोपी पर 3,000 रुपये का आर्थिक जुर्माना भी लगाया है। यदि भोजराज जुर्माना भरने में विफल रहता है, तो उसे अपनी जेल की अवधि के साथ अतिरिक्त समय तक सलाखों के पीछे बिताना होगा।

मामले की पृष्ठभूमि

यह घटना 1998-99 के दौरान की है। उस समय भोजराज ने सरकारी नौकरी हासिल करने की मंशा से धोखाधड़ी का रास्ता अपनाया था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, जब वह वर्ष 1999 में पीएससी (PAC) में भर्ती के लिए आवेदन कर रहा था, तब उसने चयन प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए एक झूठा हलफनामा पेश किया था। अधिकारियों द्वारा दस्तावेजों के गहन सत्यापन के दौरान ही इन गड़बड़ियों की जानकारी मिली, जिससे पूरा मामला उजागर हुआ और बाद में इसके खिलाफ विधिवत जांच शुरू की गई।

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कानूनी कार्रवाई और एफआईआर

इस धोखाधड़ी के खिलाफ आधिकारिक कार्रवाई उस समय के क्लर्क प्रदीप कुमार वर्मा की शिकायत पर हुई थी। इस आधार पर 1 जनवरी 1999 को आगरा के ताजगंज थाने में भोजराज के विरुद्ध जालसाजी और धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज किया गया था। जांच एजेंसियों ने मामले की गंभीरता को देखते हुए साक्ष्यों को एकत्रित किया और 31 मई 1999 को अदालत के समक्ष अपनी चार्जशीट दाखिल कर दी थी।

न्यायिक प्रक्रिया और फैसला

इस मामले की सुनवाई विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट शिवानंद गुप्ता की अदालत में चल रही थी। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने अपने दावों को पुख्ता करने के लिए गवाहों के बयानों को रिकॉर्ड पर लिया और ठोस दस्तावेजी सबूत पेश किए। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों को विस्तार से सुना और प्रस्तुत साक्ष्यों का सूक्ष्मता से विश्लेषण किया। अंततः, न्यायालय ने भोजराज को धोखाधड़ी के माध्यम से सरकारी पद हासिल करने का दोषी ठहराया और यह सजा सुनाई।

अंतिम निष्कर्ष

सरकारी अधिवक्ता राजेश कुमार ने घटनाक्रम पर टिप्पणी करते हुए बताया कि आरोपी ने भर्ती के दौरान गलत दस्तावेज दिए थे और अदालत में यह साबित हो गया कि वह हलफनामा पूरी तरह से फर्जी था। इस फैसले के साथ ही, 90 के दशक के अंतिम वर्षों से चले आ रहे इस भर्ती फर्जीवाड़े का एक लंबा कानूनी अध्याय समाप्त हो गया है।

सवाल-जवाब

भोजराज को किस आरोप में सजा सुनाई गई है?
भोजराज को 1999 में पीएससी में भर्ती के समय फर्जी हलफनामा जमा करने और सरकारी नौकरी धोखाधड़ी से हासिल करने का दोषी पाया गया है।
कोर्ट ने क्या सजा दी है?
अदालत ने आरोपी को 3 साल की जेल और 3,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई है।
मामला कब का है?
यह मामला 1998-99 के दौरान का है।
शिकायत किसने की थी?
इस मामले में प्राथमिकी तत्कालीन क्लर्क प्रदीप कुमार वर्मा की शिकायत पर दर्ज की गई थी।
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