उत्तर प्रदेश के बलिया जिले का द्वाबा क्षेत्र एक ऐसे भौगोलिक संकट का सामना कर रहा है, जिसने सैकड़ों परिवारों की रातों की नींद छीन ली है। यह इलाका एक तरफ से पवित्र गंगा नदी और दूसरी तरफ से उफनती घाघरा नदी के बीच घिरा हुआ है। हर साल मानसून के मौसम में इन नदियों का जलस्तर बढ़ने से यहां बाढ़ और कटान की भयानक स्थिति पैदा हो जाती है। लेकिन इस साल, यह प्राकृतिक आपदा गोपाल नगर ताड़ी गांव के लिए एक अस्तित्व का संकट बन गई है। लगातार हो रहे भू-कटाव के कारण गांव का वजूद ही खतरे में पड़ गया है। अब तक सात पक्के घर पूरी तरह से नदी की तेज धार में समा चुके हैं, और विनाश का यह सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है।
6 किलोमीटर आगे बढ़ी नदी
गांव के लोगों के लिए सबसे ज्यादा खौफनाक बात घाघरा नदी के आगे बढ़ने की रफ्तार है। स्थानीय निवासियों के अनुसार, जो घाघरा नदी कुछ साल पहले तक गांव से लगभग 6 किलोमीटर की सुरक्षित दूरी पर बहती थी, वह आज उनके दरवाजों पर दस्तक दे रही है। यह कोई अचानक आई आपदा नहीं है, बल्कि पिछले पांच सालों से लगातार हो रहे कटान का नतीजा है। इतने लंबे समय तक कटान होने के बावजूद, इसे रोकने के लिए किसी भी स्तर पर कोई ठोस और स्थायी कदम नहीं उठाया गया। इसी प्रशासनिक अनदेखी का परिणाम है कि आज एक पूरा का पूरा गांव जलमग्न होने की कगार पर खड़ा है और लोग खौफ के साए में जीने को मजबूर हैं।
अपने हाथों से घर तोड़ने की मजबूरी
इस पूरी त्रासदी का सबसे हृदयविदारक पहलू यह है कि ग्रामीण अब खुद अपने हाथों से अपने ही घरों को हथौड़े और फावड़े से तोड़ रहे हैं। जब उन्हें यह एहसास हो गया कि नदी उनके घरों को निगल लेगी, तो वे अपनी ईंटों और लोहे के अन्य सामानों को बचाने की आखिरी कोशिश कर रहे हैं। गोपाल नगर ताड़ी के निवासी राजेश कुमार यादव ने अपनी आंखों के सामने अपने खूबसूरत पक्के मकान को नदी में समाते हुए देखा है। उनका कहना है कि अब तक घाघरा नदी सात से ज्यादा घरों को पूरी तरह से निगल चुकी है। अब जो भी थोड़ा बहुत सामान या ईंटें बच गई हैं, लोग उन्हें बटोर कर सुरक्षित स्थानों पर ले जाने की जद्दोजहद कर रहे हैं। राजेश ने भारी मन से बताया कि जिस घर को इंसान अपने खून-पसीने की गाढ़ी कमाई से बनाता है, उसे अपने ही हाथों से तोड़ने का दर्द कितना भयानक और असहनीय होता है, इसका अंदाजा कोई और नहीं लगा सकता।
प्रशासन की लापरवाही और जियो बैग में भ्रष्टाचार
इतनी बड़ी प्राकृतिक और मानवीय आपदा के बावजूद, जिला प्रशासन का रवैया पूरी तरह से उदासीन बना हुआ है। ग्रामीणों का आरोप है कि अब तक सरकारी स्तर पर किसी भी प्रकार की कोई राहत सामग्री उन तक नहीं पहुंची है। स्थानीय निवासी अंकित कुमार यादव ने प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि बड़े-बड़े अधिकारी और अफसर प्रभावित इलाके का दौरा करने तो आते हैं, लेकिन वे सिर्फ मूकदर्शक बनकर हालात का जायजा लेते हैं और वापस चले जाते हैं। कटान को रोकने के लिए कोई भी सार्थक या जमीनी पहल नहीं की गई है। सरकारी खानापूर्ति के नाम पर नदी के किनारे जियो बैग लगाए गए थे, लेकिन वे भी अब गंगा और घाघरा की तेज लहरों में समा चुके हैं। अंकित ने साफ तौर पर कहा कि कटान रोकने के नाम पर पिछले कई सालों से सिर्फ भ्रष्टाचार का खेल चल रहा है। ठेकेदारों ने बाहर से मिट्टी लाने के बजाय आसपास से ही मिट्टी काटकर उन जियो बैग में भर दी थी, जो प्रशासन की खुली लापरवाही और लूट को उजागर करता है।
सिकुड़ती आबादी और गांव के खत्म होने का डर
इस गांव की आबादी 400 से अधिक है, और अब इन सभी लोगों के सिर पर मौत और तबाही का खतरा मंडरा रहा है। संजय कुमार यादव ने गांव वालों की पीड़ा को शब्दों में पिरोते हुए कहा कि वे अपना दुखड़ा किससे जाकर रोएं। उन्होंने इस दोहरी मार का वर्णन करते हुए कहा कि ऊपर से आसमान से इंद्रदेव का प्रकोप बरस रहा है और नीचे से उफनती घाघरा नदी अपना कहर बरपा रही है। इस असहनीय कष्ट में गांव के लोग दिन-रात गुजार रहे हैं। संजय ने बताया कि जिस जगह से मीडिया की रिपोर्टिंग हो रही थी, वहां से नदी पहले 6 किलोमीटर दूर थी, लेकिन अब वह कटान करते हुए बिल्कुल पास आ गई है। उन्होंने गहरी चिंता जताते हुए कहा कि गांव की 400 से ज्यादा की आबादी अब धीरे-धीरे बेघर होकर दर-दर भटक रही है। हालात इतने बदतर हैं कि ऐसा लग रहा है मानो इस साल गोपाल नगर ताड़ी गांव का अस्तित्व हमेशा के लिए नक्शे से मिट जाएगा। अब पूरे गांव में बमुश्किल 20 से 25 घर ही बचे होंगे, जो किसी भी वक्त नदी में समा सकते हैं।
जनप्रतिनिधियों की बेरुखी और बदहाली
लोगों का गुस्सा इस बात को लेकर भी है कि इस मुश्किल घड़ी में कोई भी उनका साथ देने नहीं आया। अपना सब कुछ गंवा चुके ग्रामीण एक नए आशियाने की तलाश में दर-दर भटकने को मजबूर हैं, लेकिन अभी तक कोई भी समाजसेवी संस्था या कोई भी चुना हुआ जनप्रतिनिधि उनकी सुध लेने नहीं पहुंचा है। गांव के एक अन्य निवासी बबलू कुमार ने जमीनी हकीकत बयां करते हुए कहा कि यहां की स्थिति बहुत ही ज्यादा खराब और भयावह हो चुकी है। कटान की वजह से कई परिवारों के घर पूरी तरह डूब चुके हैं और जो बचे हैं, वे भी जल्द ही पानी में समाने वाले हैं। बबलू ने भी भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाते हुए कहा कि अगर जिम्मेदार अधिकारियों और ठेकेदारों ने ईमानदारी से काम कराया होता, तो शायद आज यह कटान रुक गया होता और गांव बच जाता। लेकिन हर साल बाढ़ और कटान के नाम पर सिर्फ लूटपाट होती है, और जियो बैग जैसी दिखावटी चीजों से इस उफनती नदी को रोकने का कोई मतलब ही नहीं है।
खुले आसमान के नीचे जीवन का संघर्ष
इस विनाशकारी कटान ने लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी और अस्तित्व को पूरी तरह से तबाह कर दिया है। सबसे ज्यादा असर छोटे बच्चों और महिलाओं पर पड़ा है। हालात का जायजा लेते वक्त गांव का ही एक बच्चा पूरी तरह से भावुक होकर रो पड़ा। उस मासूम ने बताया कि अब गांव में सिर्फ थोड़ा सा खेत बचा है, और जब पानी और आगे आएगा तो वे उसी खेत में जाकर शरण लेंगे। फिलहाल, जिन लोगों के घर टूट चुके हैं, वे बिना किसी छत के, खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हैं। बारिश और बाढ़ के कारण उनके पास खाना पकाने का कोई साधन नहीं बचा है। उनके पास गैस सिलेंडर नहीं है, और जलाने के लिए रखे गए गोबर के उपले भी पूरी तरह से भीग कर खराब हो चुके हैं। बेघर होने के साथ-साथ अब इन परिवारों के सामने दो वक्त की रोटी का भी गंभीर संकट पैदा हो गया है, और वे सरकार व प्रशासन से तत्काल मदद की गुहार लगा रहे हैं।




















