उत्तराखंड के बागेश्वर जिले में स्थित मनकोट क्षेत्र इन दिनों अपने एक बेहद खास और पारंपरिक पकवान के कारण खान-पान के शौकीनों के बीच चर्चा में है। देवभूमि की समृद्ध पाक परंपरा का हिस्सा 'भट्ट के डुबके' स्थानीय लोगों के साथ-साथ यहाँ आने वाले पर्यटकों को भी खूब लुभा रहा है। काले भट्ट यानी पहाड़ी सोयाबीन से तैयार होने वाला यह व्यंजन अपनी गाढ़ी बनावट, सोंधे स्वाद और उच्च पौष्टिकता के लिए प्रसिद्ध है। पर्वतीय क्षेत्रों में आज भी इसे पारंपरिक तरीके से मिट्टी के चूल्हे और लोहे की कड़ाही में धीमी आंच पर पकाया जाता है। लकड़ी की आंच और लोहे के बर्तन का यह संगम इस दाल के स्वाद को कई गुना बढ़ा देता है, जिससे इसमें पहाड़ी मिट्टी और घर के भोजन का अनूठा अहसास मिलता है।
पारंपरिक सिलबट्टे और लोहे की कड़ाही में पकाने की अनूठी विधि
मनकोट में भट्ट के डुबके तैयार करने की प्रक्रिया पूरी तरह से पारंपरिक और धैर्यपूर्ण है। सुनीता टम्टा ने इस पकवान को बनाने के तरीके के बारे में बताया कि सबसे पहले स्थानीय रूप से उगाए गए काले भट्ट को अच्छी तरह साफ करके पानी में भिगोया जाता है। इसके बाद इसे सिलबट्टे या बारीक पीसकर एक गाढ़ा मिश्रण तैयार किया जाता है। इस पिसे हुए मिश्रण को लोहे की भारी कड़ाही में डाला जाता है। ग्रामीण महिलाएं इसे चूल्हे की धीमी आंच पर कई घंटों तक लगातार चलाती और पकाती हैं। लंबी अवधि तक पकने के कारण दाल स्वाभाविक रूप से गाढ़ी हो जाती है और इसका प्राकृतिक रंग व स्वाद निखर कर बाहर आता है। लोहे की कड़ाही में पकने से इसमें आवश्यक तत्व भी शामिल हो जाते हैं, जो इसे आधुनिक बर्तनों में बने खाने से बिल्कुल अलग बनाते हैं।
पहाड़ी मसालों और शुद्ध घी के तड़के का जादू
इस पारंपरिक डुबके का असली आकर्षण इसमें लगने वाला खास तड़का और स्थानीय मसाले हैं। जब दाल धीमी आंच पर पककर पूरी तरह तैयार हो जाती है, तो इसमें देसी घी का छौंक लगाया जाता है। इस तड़के में हिमालयी क्षेत्रों में पाए जाने वाले विशेष मसालों जैसे जंबू, गंड्रेणी, हींग और बारीक कटे हुए लहसुन का उपयोग किया जाता है। जैसे ही गर्म घी में जंबू और गंड्रेणी पड़ते हैं, उनकी मनमोहक खुशबू पूरे घर और आसपास के वातावरण में फैल जाती है। जंबू और गंड्रेणी को पहाड़ी रसोई की असली पहचान माना जाता है, जो न केवल स्वाद में गहराई लाते हैं बल्कि पाचन के लिए भी बेहद फायदेमंद होते हैं। यह तड़का भट्ट के डुबके को एक विशिष्ट और बेजोड़ स्वाद प्रदान करता है।
पारंपरिक पहाड़ी थाली का मुख्य हिस्सा
मनकोट में भट्ट के डुबके को किसी एक अकेले व्यंजन के रूप में नहीं, बल्कि एक पूरी पारंपरिक पहाड़ी थाली के साथ परोसा जाता है। गरमागरम पहाड़ी भात (चावल) के साथ इस गाढ़ी और स्वादिष्ट दाल का संयोजन खाने वालों को तृप्त कर देता है। इस पूरी थाली में डुबके और भात के अलावा कढ़ी जैसी दिखने वाली 'झोली', ताजी मौसमी हरी सब्जियां, तिल या भांग की तीखी चटनी और मूली की 'थिचुआणी' शामिल होती है। पर्वतीय खान-पान में इन सभी पारंपरिक सह-व्यंजनों का अपना अलग स्थान है। भट्ट के डुबके और पहाड़ी भात का यह मेल एक ऐसा प्रामाणिक स्वाद देता है, जिसे एक बार चकने के बाद लोग लंबे समय तक याद रखते हैं। यही संपूर्ण थाली मनकोट के स्थानीय भोजन को अपनी एक अलग पहचान दिलाती है।
पौष्टिकता से भरपूर और ऊर्जा देने वाला भोजन
काले भट्ट उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में उगाई जाने वाली एक मुख्य पारंपरिक दलहनी फसल है। प्राचीन समय से ही यह स्थानीय निवासियों के दैनिक आहार का मुख्य आधार रही है। काले भट्ट से तैयार किए जाने वाले डुबके प्रोटीन, फाइबर और अन्य आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्वों का एक उत्कृष्ट स्रोत माने जाते हैं। पहाड़ों की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में कठोर शारीरिक श्रम करने वाले ग्रामीणों के लिए यह दाल शरीर को तुरंत ऊर्जा और ताकत देने का काम करती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ और स्थानीय लोग इसे स्वाद के साथ-साथ एक बेहतरीन स्वास्थ्यवर्धक भोजन मानते हैं। हालांकि, इसके पोषण संबंधी लाभ व्यक्ति की शारीरिक गतिविधियों, पाचन क्षमता और सेवन की मात्रा पर भी निर्भर करते हैं।
सांस्कृतिक विरासत और स्थानीय पर्यटन को बढ़ावा
आज के आधुनिक दौर में एलपीजी गैस और बिजली के उपकरणों ने भले ही खाना पकाने की प्रक्रिया को आसान बना दिया हो, लेकिन मनकोट जैसे पहाड़ी गांवों में लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाने की परंपरा आज भी जीवित है। धीमी आंच पर पकने वाले इस भोजन में एक खास तरह की सोंधी खुशबू होती है, जो आधुनिक तकनीकों से गायब रहती है। पुरानी पीढ़ी के लिए जहां यह रोजमर्रा की जीवनशैली का हिस्सा था, वहीं नई पीढ़ी भी अब इन पारंपरिक पकवानों का महत्व समझ रही है और इनके स्वाद में रुचि दिखा रही है। बागेश्वर आने वाले पर्यटकों के लिए मनकोट के भट्ट के डुबके का स्वाद लेना एक यादगार सांस्कृतिक अनुभव बन जाता है। इस तरह के पारंपरिक पहाड़ी व्यंजनों को बढ़ावा मिलने से न केवल उत्तराखंड की ग्रामीण संस्कृति संरक्षित होती है, बल्कि स्थानीय महिलाओं के स्वरोजगार और क्षेत्रीय कृषि उत्पादों को भी नई पहचान मिलती है।



















