पहाड़ों की ढलानों पर उगने वाले मोटे अनाज और पारंपरिक पकवान अब केवल स्थानीय रसोई तक सीमित नहीं रहे। उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों में महिलाओं के समूह संगठित होकर सदियों पुराने कृषि उत्पादों को आधुनिक पैकेजिंग और मजबूत आपूर्ति व्यवस्था के जरिए व्यापक बाजार में उतार रहे हैं। नैनीताल जिले के पर्वतीय गांवों में रहने वाली गृहणियां स्वयं सहायता समूहों से जुड़कर न केवल अपने लिए आजीविका जुटा रही हैं, बल्कि घर की चारदीवारी के भीतर से ही बड़े कारोबारी तंत्र का हिस्सा बन चुकी हैं। सरकारी प्रोत्साहन और समर्पित बिक्री केंद्रों के सहयोग से उनके द्वारा तैयार पौष्टिक खाद्य पदार्थ अब राज्य की सीमाओं को पार कर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी विशिष्ट पहचान कायम कर रहे हैं।
हिलांस केंद्रों से बदली विपणन की तस्वीर
पर्वतीय क्षेत्रों में उगाई जाने वाली फसलों और पारंपरिक व्यंजनों के सामने सबसे बड़ी अड़चन सही बाजार और उचित मूल्य की रही है। बिचौलियों की गैरमौजूदगी और सुव्यवस्थित तंत्र के अभाव में किसानों को उनकी मेहनत का वाजिब दाम नहीं मिल पाता था। इस अंतर को पाटने के लिए हिलांस आउटलेट की रूपरेखा तैयार की गई, जिसने सुदूर गांवों में तैयार माल को मुख्यधारा के खरीदारों से जोड़ दिया है।
इन केंद्रों पर जैविक दालें, पहाड़ी मसाले, औषधीय शहद, पारंपरिक नमकीन और हस्तशिल्प सीधे उपभोक्ताओं के लिए उपलब्ध कराए जाते हैं। उत्तराखंड आने वाले पर्यटक और गुणवत्तापूर्ण खानपान की तलाश में जुटे लोग इन उत्पादों को हाथों-हाथ खरीद रहे हैं। स्थानीय स्तर पर उत्पादित वस्तुओं की मांग अब महानगरों और विदेशी बाजारों से भी आ रही है, जिससे पारंपरिक पर्वतीय खानपान और ग्रामीण कारीगरी को नया मुकाम हासिल हुआ है।
हनुमानगढ़ी में बीस से अधिक वस्तुओं का संग्रह
नैनीताल के प्रसिद्ध हनुमानगढ़ी क्षेत्र में संचालित बिक्री केंद्र इस ग्रामीण उद्यमशीलता का जीता-जागता उदाहरण पेश कर रहा है। इस केंद्र का संचालन करने वाली निर्मला जोशी के साथ कई महिला स्वयं सहायता समूह सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं। यह पूरा ढांचा भीमताल ब्लॉक के सहयोग से स्थापित किया गया है, जहां प्रतिदिन सैकड़ों ग्राहक खरीदारी के लिए पहुंचते हैं।
निर्मला जोशी के मुताबिक महिलाओं की भागीदारी केवल उत्पादन तक सीमित नहीं है। उन्होंने कहा, "महिलाएं उत्पाद तैयार करने से लेकर उन्हें बाजार तक पहुंचाने की प्रक्रिया में भागीदारी कर रही हैं।"
इस केंद्र पर उपलब्ध सामग्री की सूची काफी विस्तृत है, जिसमें बीस से अधिक अलग-अलग वस्तुएं शामिल हैं
- पारंपरिक आटा: मंडुवे का पौष्टिक आटा और स्वास्थ्यवर्धक रागी का आटा।
- विशेष चावल व दालें: औषधीय गुणों से भरपूर लाल चावल, सुपाच्य झिंगुरा चावल और स्थानीय रूप से उपजाई गई मिश्रित दालें।
- प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ: पहाड़ी फलों से तैयार जैम, पारंपरिक घर का बना अचार और मंडुवे से बनी नमकीन।
- शहद और सांस्कृतिक कला: जंगलों से एकत्रित शुद्ध प्राकृतिक शहद और उत्तराखंड की पारंपरिक लोककला ऐपन से सजे सजावटी सामान।
गाँव में रहते हुए महिलाओं को मिली आर्थिक सुरक्षा
उत्तराखंड के पर्वतीय भूगोल में महिलाओं पर घर के कामकाज के साथ खेती और मवेशियों की देखभाल का भारी दबाव रहता है। पहले वे पारंपरिक अनाज और खाद्य पदार्थ तैयार तो करती थीं, लेकिन उन्हें बेचने के लिए शहर की मंडियों तक जाना उनके लिए बेहद कठिन और खर्चीला साबित होता था। इस कारण उनकी बनाई चीजें स्थानीय स्तर पर ही औने-पौने दामों में सिमट जाती थीं।
अब स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। स्वयं सहायता समूहों ने महिलाओं को गांव में ही प्रसंस्करण और पैकेजिंग की सुविधा दे दी है। महिलाएं अपने दैनिक घरेलू दायित्वों को निभाते हुए खाली समय में उत्पादन कार्य करती हैं। समूह से जुड़ने के कारण उनके पास कच्चा माल जुटाने और बने हुए सामान को सुरक्षित केंद्रों तक भेजने की सामूहिक ताकत आ गई है। इससे उन्हें अपने पैतृक गांव को छोड़े बिना नियमित आमदनी का पक्का जरिया मिल गया है, जो पहाड़ से होने वाले पलायन को रोकने में भी मददगार साबित हो रहा है।
प्रशासनिक तंत्र और वित्तीय रियायतों का मजबूत संबल
इस पूरी पहल को टिकाऊ और व्यापक बनाने के पीछे शासन की कल्याणकारी रणनीतियों का बड़ा योगदान है। ग्रामीण विकास विभाग और शहरी विकास विभाग मिलकर जमीनी स्तर पर महिलाओं को संगठित करने का अभियान चला रहे हैं। प्रशासन न केवल समूहों के गठन में सहायता करता है, बल्कि उद्यम को खड़ा करने के लिए आवश्यक शुरुआती पूंजी की व्यवस्था भी सुनिश्चित करता है।
नैनीताल के एडीएम विवेक राय ने सरकारी पहलों के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए कहा, "इन योजनाओं का उद्देश्य महिलाओं को सशक्त बनाना, उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर करना और स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराना है।"
प्रशासन की ओर से महिलाओं को दिए जाने वाले वित्तीय लाभों में कई प्रमुख पहलू शामिल हैं
- आरंभिक बीज पूंजी: नए समूह को कामकाज शुरू करने और कच्चा माल खरीदने के लिए शुरुआती वित्तीय अनुदान दिया जाता है।
- सुलभ ऋण व्यवस्था: उत्पादन को बड़े पैमाने पर ले जाने के लिए बैंकों के माध्यम से रियायती ब्याज दरों पर कर्ज उपलब्ध कराया जाता है।
- शून्य ब्याज प्रावधान: कई विशेष कल्याणकारी योजनाओं में महिलाओं को बिना किसी ब्याज के ऋण प्रदान किया जाता है, जिससे उनके ऊपर कर्ज चुकाने का भारी वित्तीय दबाव नहीं पड़ता।
- तकनीकी प्रशिक्षण: खाद्य प्रसंस्करण, स्वच्छता मानकों और सुंदर पैकेजिंग के लिए समय-समय पर कार्यशालाओं का आयोजन किया जाता है।
पर्वतीय खानपान को वैश्विक पटल पर नई पहचान
हिलांस नेटवर्क की यह कामयाबी केवल महिलाओं की आमदनी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड की विलुप्त होती कृषि धरोहर के संरक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम है। रासायनिक उर्वरकों से मुक्त मंडुवा और झिंगुरा जैसे मोटे अनाज आज पूरे विश्व में सुपरफूड के रूप में स्वीकार किए जा रहे हैं। जब शहरी और विदेशी उपभोक्ता इन जैविक उत्पादों को खरीदते हैं, तो इसका सीधा लाभ पहाड़ के छोटे किसानों और उत्पादक महिलाओं की जेब तक पहुंचता है।
यह मंच ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान का अहसास करा रहा है। कभी घर के खर्चों के लिए पूरी तरह दूसरों पर निर्भर रहने वाली महिलाएं आज अपने बच्चों की पढ़ाई और परिवार की बेहतर चिकित्सा व्यवस्था का खर्च खुद उठा रही हैं। नैनीताल का यह सफल मॉडल यह साबित करता है कि स्थानीय संसाधनों और पारंपरिक कौशल को यदि संगठित बाजार का साथ मिल जाए, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव लाया जा सकता है।



















