उत्तराखंड के पहाड़ी अंचलों में आजीविका के अवसरों की हमेशा से कमी रही है, जिसके कारण बड़ी संख्या में युवा अपने घरों को छोड़कर मैदानी इलाकों का रुख करते हैं। ऐसे माहौल में बागेश्वर जिले के झोपड़ा गांव से एक ऐसी कहानी सामने आई है जो आत्मनिर्भरता की राह दिखाती है। गांव के निवासी प्रेम सिंह पिछले करीब 10 वर्षों से बकरी पालन करके अपने पूरे परिवार का खर्च सफलता से चला रहे हैं। बाहर रहकर नौकरी करने के बजाय उन्होंने अपनी मिट्टी में ही स्वरोजगार की जड़ें जमाने का फैसला किया और आज वह ग्रामीण अर्थशास्त्र के लिए एक मिसाल बन चुके हैं।
वाहनों की परिचालकी छोड़ गांव में शुरू की अपनी राह
बकरी पालन को अपनी कमाई का जरिया बनाने से पहले प्रेम सिंह कई सालों तक यात्री वाहनों में परिचालक के तौर पर काम करते थे। इस नौकरी के दौरान उनका अधिकांश समय अपने घर और परिवार से दूर सड़कों पर ही बीतता था। समय बीतने के साथ उन्होंने महसूस किया कि अपनों से दूर रहकर काम करने के बजाय गांव में रहकर ही आजीविका का कोई टिकाऊ साधन खोजना बेहतर होगा। परिवार के साथ वक्त बिताने और गांव की आबोहवा में रहने के इसी संकल्प ने उन्हें बकरी पालन का काम शुरू करने के लिए प्रेरित किया।
शुरुआत में छोटे स्तर पर बकरियां खरीदकर काम शुरू करने वाले प्रेम सिंह ने धीरे-धीरे अपने पशुधन को बढ़ाया। आज बकरी पालन ही उनकी आय का मुख्य जरिया बन चुका है। वह बकरियों का पालन करते हैं और परिवार की वित्तीय जरूरतों के अनुसार उन्हें बाजार में बेचकर आमदनी हासिल करते हैं। उनका कहना है कि इस काम से उनके परिवार का गुजारा बेहद अच्छी तरह से चल रहा है और उन्हें अब काम के सिलसिले में घर से बाहर जाने की कोई जरूरत महसूस नहीं होती।
दुर्गम रास्तों और बदलते मौसम के बीच कड़ी मेहनत
पहाड़ों में बकरी पालन को जितना आसान समझा जाता है, धरातल पर यह उतना ही चुनौतीपूर्ण काम है। बकरियों के स्वास्थ्य का ध्यान रखने से लेकर उनके खाने-पीने का समय तय करना एक जिम्मेदारी भरा काम है। पर्वतीय भूगोल की कठिन परिस्थितियों के कारण पशुपालकों को बकरियों को चराने के लिए कई किलोमीटर दूर तक पैदल जाना पड़ता है। इस दौरान हर एक बकरी पर लगातार नजर रखनी होती है ताकि वे ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर भटक न जाएं या किसी हादसे का शिकार न हों।
इसके अलावा मौसम का मिजाज बदलने पर पशुओं को ठंड, बारिश या तेज धूप से बचाना भी एक बड़ी परीक्षा होती है। यदि कोई बकरी बीमार पड़ जाए तो उसके तुरंत इलाज और देखभाल का इंतजाम करना पड़ता है। पशुओं के स्वास्थ्य में थोड़ी सी भी लापरवाही सीधे तौर पर आय को प्रभावित कर सकती है। इसलिए इस व्यवसाय में शारीरिक मेहनत के साथ-साथ अत्यधिक धैर्य, समय और चौकसी की जरूरत होती है।
पहाड़ की अर्थव्यवस्था और पलायन रोकने में पशुपालन की भूमिका
प्रेम सिंह की यह सफलता उन तमाम ग्रामीण युवाओं के लिए एक दिशा-निर्देश है जो अपने गांव में रहकर ही रोजगार तलाशना चाहते हैं। पहाड़ी राज्यों में सीमित संसाधनों और कम खेती योग्य भूमि के बीच पशुपालन हमेशा से ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा सहारा रहा है। बकरी पालन जैसे कम लागत वाले स्वरोजगार के अवसरों से न केवल स्थानीय स्तर पर आय पैदा होती है, बल्कि यह गांवों से होने वाले जबरन पलायन को रोकने में भी बेहद कारगर साबित हो सकता है।
हालांकि, विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों का मानना है कि इस तरह के पारंपरिक व्यवसायों को और अधिक बढ़ावा देने के लिए सरकारी स्तर पर सुविधाएं मिलना बेहद जरूरी है। गांवों में पशु स्वास्थ्य सेवाओं की आसान उपलब्धता, गुणवत्तापूर्ण चारे का प्रबंध और पशुपालकों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने के लिए संगठित बाजार की व्यवस्था होना आवश्यक है। अगर प्रेम सिंह जैसी मेहनत और सही नीतियां एक साथ मिल जाएं, तो पहाड़ में मौजूद संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल कर ग्रामीण जीवन को खुशहाल बनाया जा सकता है।
















