दशहरा की रात से उत्तरी खंड गंगनहर की वार्षिक रखरखाव बंदी शुरू होते ही हरिद्वार के प्रमुख गंगा घाटों पर जल का संकट पैदा हो गया है। उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग द्वारा नहर का प्रवाह रोके जाने के बाद पवित्र हर की पैड़ी के ब्रह्मकुंड सहित कई प्रमुख घाटों पर गंगा की धारा पूरी तरह सूख चुकी है। देश और विदेश से पिंडदान, तर्पण, अस्थि विसर्जन और मुंडन जैसे आवश्यक धार्मिक अनुष्ठान संपन्न करने पहुंचे हजारों तीर्थयात्रियों को इस स्थिति के कारण भारी निराशा का सामना करना पड़ रहा है। बहते हुए पवित्र गंगाजल के स्थान पर घाटों पर केवल रुका हुआ और मटमैला पानी दिखाई दे रहा है, जिससे धार्मिक परंपराओं को निभाना अत्यंत कठिन हो गया है।
ऐतिहासिक समझौता और न्यूनतम जल प्रवाह का नियम
गंगनहर की वार्षिक बंदी के दौरान भी हर की पैड़ी पर जल आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए एक शताब्दी पुराना ऐतिहासिक समझौता मौजूद है। इस समझौते के प्रावधानों के तहत गंगनहर का रखरखाव कार्य चलने के दौरान भी हर की पैड़ी की मुख्यधारा में कम से कम 1000 क्यूसेक जल का निरंतर और अविरल प्रवाह बनाए रखना अनिवार्य किया गया था। हालांकि, स्थानीय तीर्थ पुरोहितों का आरोप है कि सिंचाई विभाग की लापरवाही के कारण इस निर्धारित मानक का खुलेआम उल्लंघन किया जा रहा है।
गंगा सभा से जुड़े पुरोहित पंडित कौशल सिखोला का कहना है कि प्रशासन और सिंचाई विभाग की इस अनदेखी के चलते हर वर्ष श्रद्धालुओं को ऐसी ही विकट परिस्थिति से जूझना पड़ता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गंगा का जल स्वतंत्र और प्रवाही होना आवश्यक है, क्योंकि स्थिर या जमा हुए पानी में किए गए धार्मिक कर्मकांड शास्त्र सम्मत नहीं माने जाते।
1914 का आंदोलन और अंग्रेजों की योजना का विरोध
इस पूरे विवाद की जड़ें वर्ष 1914 के उस ऐतिहासिक दौर से जुड़ी हुई हैं, जब तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत ने हर की पैड़ी पर बांध बनाकर गंगा की प्राकृतिक धारा को पूरी तरह रोकने की योजना बनाई थी। उस समय हरिद्वार के तीर्थ पुरोहितों का कोई औपचारिक या पंजीकृत संगठन नहीं था, फिर भी पंडा समाज और स्थानीय पुरोहितों ने एकजुट होकर अंग्रेजों की इस मंशा का कड़ा विरोध शुरू कर दिया। पुरोहितों का स्पष्ट तर्क था कि बहती गंगा धारा के बिना सनातन परंपरा के अनुसार कोई भी धार्मिक कार्य या अस्थि प्रवाह संभव नहीं हो सकता।
अंग्रेज अधिकारी अपनी योजना पर अड़े रहे और कई महीनों तक बातचीत बेनतीजा रही। गतिरोध को समाप्त करने और इस जनआंदोलन को दिशा देने के लिए बनारस से महामना पंडित मदन मोहन मालवीय को हरिद्वार आमंत्रित किया गया। उनके आगमन के बाद इस विरोध प्रदर्शन ने एक व्यापक राष्ट्रीय रूप धारण कर लिया।
दो साल लंबा संघर्ष और 1916 का ब्रिटिश समझौता
पंडित मदन मोहन मालवीय के नेतृत्व में यह आंदोलन वर्ष 1914 से 1916 तक लगभग दो वर्षों तक लगातार चला। इस दौरान देशभर के विभिन्न रजवाड़ों, राजा-महाराजाओं और सनातन धर्म के अनुयायियों ने इस आंदोलन को अपना भरपूर नैतिक और वित्तीय समर्थन प्रदान किया। बढ़ते जनदबाव और व्यापक विरोध के आगे आखिरकार ब्रिटिश सरकार को झुकने पर मजबूर होना पड़ा।
तत्कालीन वरिष्ठ ब्रिटिश प्रशासनिक अधिकारी सर जेम्स मेस्टन ने तीर्थ पुरोहितों के प्रतिनिधियों के साथ वार्ता की और एक आधिकारिक समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते में यह स्पष्ट गारंटी दी गई थी कि गंगनहर की वार्षिक मरम्मत या बंदी के दौरान भी हर की पैड़ी पर जल का स्तर कम से कम दो फीट हमेशा बना रहेगा और 1000 क्यूसेक पानी अनवरत बहता रहेगा।
गंगा सभा का गठन और वर्तमान की अवहेलना
हर की पैड़ी की संपूर्ण व्यवस्था, स्वच्छता और धार्मिक मर्यादाओं की देखरेख के उद्देश्य से पंडित मदन मोहन मालवीय ने वर्ष 1916 में गंगा सभा नामक संस्था की स्थापना की थी। तब से लेकर आज तक गंगा सभा घाटों की देखरेख और श्रद्धालुओं की सुविधाओं का ध्यान रखती आ रही है।
हालांकि, वर्तमान परिस्थितियों पर चिंता जताते हुए पंडित कौशल सिखोला ने आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग अक्सर इस ऐतिहासिक दस्तावेज और समझौते का उल्लंघन करता है। हर वर्ष गंगनहर बंदी के दौरान घाटों पर पानी घटा दिया जाता है, जिससे देश-दुनिया से आने वाले श्रद्धालुओं को भारी असुविधा होती है। पुरोहितों ने मांग की है कि अंग्रेजों के समय तय की गई व्यवस्था का कड़ाई से पालन कराया जाए ताकि हर की पैड़ी की पवित्र धारा कभी न सूखे।



















