बागेश्वर जिले के छाती गांव के रहने वाले गिरीश पांडे ने स्वरोजगार की एक अनूठी और प्रेरणादायक मिसाल कायम की है। महानगरों में लगभग 15 साल तक नौकरी करने के बाद उन्होंने अपने गांव लौटने का साहसिक फैसला किया और वहीं पर अपना काम शुरू किया। पिछले 10 वर्षों से वह गांव में ही एक भोजनालय का संचालन कर रहे हैं। इस भोजनालय के जरिए वह न सिर्फ लोगों को कुमाऊं के पारंपरिक और लजीज पहाड़ी व्यंजनों का स्वाद चखा रहे हैं, बल्कि अपने परिवार के साथ-साथ स्थानीय युवाओं के लिए भी आजीविका के नए द्वार खोल रहे हैं।
शहर की चमक-धमक छोड़कर थामा गांव का दामन
गिरीश पांडे का दृढ़ विश्वास है कि यदि इंसान के भीतर सच्ची लगन और कड़ी मेहनत करने का जज्बा हो, तो पहाड़ों में रहकर भी रोजगार के बेहतरीन अवसर पैदा किए जा सकते हैं। इसी दूरगामी सोच के साथ उन्होंने बड़े शहरों की आरामदायक और दौड़भाग भरी नौकरी को अलविदा कह दिया और अपने गृहग्राम में वापसी की। उनके इस भोजनालय में कुमाऊं की पारंपरिक खानपान शैली को विशेष महत्व दिया जाता है। जो भी लोग पहाड़ी भोजन के शौकीन हैं, वे यहां आकर प्रामाणिक स्थानीय जायके का आनंद लेते हैं। उनका मुख्य उद्देश्य इन पारंपरिक व्यंजनों को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाना और महानगरों की तरफ भागने के बजाय अपने गांव में ही रहकर सम्मानजनक आजीविका कमाना है।
किफायती दामों पर परोसी जा रही पारंपरिक थाली
अपने इस भोजनालय में गिरीश पांडे ग्राहकों को बहुत ही किफायती कीमत पर भोजन उपलब्ध कराते हैं, जहां 80 रुपये और 100 रुपये की थाली के विकल्प मिलते हैं। मात्र 100 रुपये वाली विशेष थाली में ग्राहकों को गरमागरम रोटी, ताजी सब्जी, स्वादिष्ट भांग की चटनी, सलाद, चावल, झोली, दाल और प्रसिद्ध भट्ट के डुबके परोसे जाते हैं। पहाड़ के इन तमाम पारंपरिक व्यंजनों को एक ही थाली में परोसने की यह पहल वाकई सराहनीय है। इस अनोखे प्रयास से जहां एक तरफ क्षेत्रीय खानपान को व्यापक बढ़ावा मिल रहा है, वहीं दूसरी तरफ आम लोगों को बहुत ही कम दरों पर भरपेट और पौष्टिक भोजन मिल जाता है.
पहाड़ी संस्कृति को सहेजने का सराहनीय प्रयास
कुमाऊं क्षेत्र के खानपान में भांग की चटनी, झोली और भट्ट के डुबके जैसे व्यंजनों का एक खास और ऐतिहासिक महत्व माना जाता है। ये तमाम व्यंजन पहाड़ की समृद्ध पारंपरिक पाक कला और वहां की स्थानीय खाद्य संस्कृति की असली पहचान हैं। यही वजह है कि गिरीश पांडे का यह भोजनालय केवल उनकी आजीविका चलाने का एक जरिया भर नहीं है, बल्कि यह क्षेत्रीय संस्कृति और खानपान को जीवित रखने की एक छोटी लेकिन बेहद जरूरी कोशिश भी है। इस पूरे व्यवसाय के साथ उनका पूरा परिवार भी पूरी निष्ठा से जुड़ा हुआ है। भोजनालय के रोजाना के कामकाज में उनकी पत्नी और उनके दोनों बच्चे भी उनका पूरा सहयोग करते हैं। इसके अलावा उन्होंने अपने यहां दो स्थानीय लोगों को भी रोजगार दिया है। इस तरह उनका यह कारोबार न सिर्फ उनके परिवार के भरण-पोषण का मुख्य आधार बना है, बल्कि अन्य लोगों के लिए भी आजीविका का एक मजबूत साधन साबित हुआ है।
पलायन के दौर में ग्रामीण युवाओं के लिए बने प्रेरणा
आज के समय में पहाड़ी क्षेत्रों में रोजगार के बेहद सीमित अवसर होने के कारण बड़ी संख्या में ग्रामीण युवा अपना घर-गांव छोड़कर बड़े शहरों में पलायन करने को मजबूर हैं। ऐसे दौर में गिरीश पांडे की यह पहल समाज को एक बहुत बड़ा संदेश देती है। यह इस बात का प्रमाण है कि यदि स्थानीय संसाधनों का सही इस्तेमाल किया जाए, पारंपरिक खानपान को सहेजा जाए और कड़ी मेहनत की जाए, तो महानगरों में भटकने के बजाय अपने ही गांव में बेहतरीन रोजगार खड़ा किया जा सकता है।



















