देहरादून की मशहूर राजसेंटेड लीची ने इस बार सात समंदर पार कर इटली के बाजारों में दस्तक दी है। APEDA यानी कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण के सहयोग से देहरादून के उद्यान विभाग ने हाल ही में 1 मीट्रिक टन लीची की पहली खेप इटली रवाना की है। दून घाटी की इस रसीली और खुशबूदार लीची की मांग इतनी बढ़ चुकी है कि रोज़ाना इटली के अलावा अमेरिका और यूरोप के अन्य बाजारों में भी यह पहुंच रही है।
ब्रिटिश काल में लाए गए थे लीची के पौधे
देहरादून में लीची की खेती का इतिहास करीब दो सौ साल पुराना है और इसकी शुरुआत सीधे ब्रिटिश शासनकाल से होती है। 1820 से 1830 के दशक के दौरान अंग्रेज हुक्मरानों और चीनी बागवानों के ज़रिए लीची के पौधे पहली बार दून घाटी में लाए गए। दून घाटी की खास मिट्टी, हिमालय से आने वाली ठंडी हवाएं और यहां की प्राकृतिक भौगोलिक स्थिति ने मिलकर इसे लीची की खेती के लिए एकदम अनुकूल जगह बना दिया।
ब्रिटिश शासनकाल में यहां की लीची की ख्याति इतनी थी कि वायसराय और ब्रिटिश अफसरों के लिए इसे खासतौर पर भेजा जाता था। डालनवाला और राजपुर रोड जैसे इलाके उस दौर में अपने विशाल लीची के बागों के लिए ही जाने जाते थे। सर्किट हाउस राजकीय उद्यान में खड़े राजसेंटेड लीची के पेड़ 1910 में लगाए गए थे, जो आज भी फल दे रहे हैं।
राजसेंटेड, लेट बदाना और कलकतिया: दून की तीन मशहूर किस्में
सर्किट हाउस राजकीय उद्यान के उद्यान प्रभारी दीपक कुकरेती ने बताया कि देहरादून एक समय लीची उत्पादन का बड़ा केंद्र हुआ करता था, लेकिन धीरे-धीरे यहां उत्पादन में गिरावट आती गई। उन्होंने कहा कि देहरादून की मिट्टी और जलवायु लीची की खेती के लिए आज भी बहुत अच्छी मानी जाती है। उन्होंने बताया कि उद्यान में मुख्य रूप से तीन किस्मों का उत्पादन किया जाता है, जिनमें राजसेंटेड, लेट बदाना और कलकतिया लीची शामिल हैं।
दीपक कुकरेती के मुताबिक इन सभी किस्मों में राजसेंटेड लीची सबसे खास और सबसे मशहूर है। इसका नाम ही इसकी पहचान बता देता है। जब यह लीची पूरी तरह पक जाती है, तो इसके गूदे और रस से गुलाब जैसी मनमोहक खुशबू आती है। यही सुगंध इसे बाकी सभी किस्मों से अलग और बेहद खास बनाती है। इसके अलावा कुछ ऐसी किस्में भी हैं जिनमें गुठली होती ही नहीं या बहुत छोटी होती है, ऐसी लीची में गूदा काफी ज्यादा होता है।
देर से पकती है, मिठास और सुगंध में बेजोड़
उत्तराखंड में हिमालय की ठंडी तलहटी में उगाई जाने वाली देहरादून की लीची देर से पकने वाली किस्म है। इसकी बाहरी परत गहरे लाल रंग की होती है। इसकी बनावट मुलायम होती है, गूदा बेहद मीठा और ताजगी से भरा होता है। आकार में बड़ी, गूदे में घनी और बीज में बेहद छोटी यह लीची अपनी प्राकृतिक मिठास और सुगंध के चलते पूरे देश में अलग पहचान रखती है।
दीपक कुकरेती ने यह भी बताया कि देहरादून की लीची की मांग लगातार बढ़ रही है। इसकी वजह यह है कि उत्पादन घटता जा रहा है और मांग बढ़ती जा रही है। दोनों के बीच यही असंतुलन इसकी कीमत और प्रतिष्ठा दोनों को ऊपर ले जा रहा है।
मोदी-मेलोनी की मुलाकात के बाद दून की लीची बनी चर्चा की असली वजह
कुछ महीने पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी की मुलाकात के बाद सोशल मीडिया पर 'मेलोडी' टॉफी खूब चर्चाओं में आई थी। लेकिन देहरादून में अभी असली चर्चा 'मेलोडी' की नहीं, बल्कि मेलोनी के देश इटली पहुंच रही दून की खास लीची की हो रही है। यहां से रोज़ाना सेंटेड लीची इटली, अमेरिका और यूरोप के बाजारों में जा रही है। इससे पहले देहरादून की लीची लंदन भी भेजी जा चुकी थी।













