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गुलाब जैसी खुशबू वाली दून की राजसेंटेड लीची पहुंची इटली, 1820 से चला आ रहा है यह शानदार सफरउत्तराखंड
2 घंटे पहले· 2

गुलाब जैसी खुशबू वाली दून की राजसेंटेड लीची पहुंची इटली, 1820 से चला आ रहा है यह शानदार सफर

देहरादून के उद्यान विभाग ने APEDA के सहयोग से हाल ही में 1 मीट्रिक टन राजसेंटेड लीची की पहली खेप इटली भेजी है। दून घाटी में लीची की जड़ें 1820-1830 के दशक तक जाती हैं, जब ब्रिटिश अधिकारी इसे यहां लाए थे।

Arshdeep AhluwaliaArshdeep AhluwaliaNorth India Correspondent 3 मिनट पढ़ें AI के लिए
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देहरादून की मशहूर राजसेंटेड लीची ने इस बार सात समंदर पार कर इटली के बाजारों में दस्तक दी है। APEDA यानी कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण के सहयोग से देहरादून के उद्यान विभाग ने हाल ही में 1 मीट्रिक टन लीची की पहली खेप इटली रवाना की है। दून घाटी की इस रसीली और खुशबूदार लीची की मांग इतनी बढ़ चुकी है कि रोज़ाना इटली के अलावा अमेरिका और यूरोप के अन्य बाजारों में भी यह पहुंच रही है।

ब्रिटिश काल में लाए गए थे लीची के पौधे

देहरादून में लीची की खेती का इतिहास करीब दो सौ साल पुराना है और इसकी शुरुआत सीधे ब्रिटिश शासनकाल से होती है। 1820 से 1830 के दशक के दौरान अंग्रेज हुक्मरानों और चीनी बागवानों के ज़रिए लीची के पौधे पहली बार दून घाटी में लाए गए। दून घाटी की खास मिट्टी, हिमालय से आने वाली ठंडी हवाएं और यहां की प्राकृतिक भौगोलिक स्थिति ने मिलकर इसे लीची की खेती के लिए एकदम अनुकूल जगह बना दिया।

ब्रिटिश शासनकाल में यहां की लीची की ख्याति इतनी थी कि वायसराय और ब्रिटिश अफसरों के लिए इसे खासतौर पर भेजा जाता था। डालनवाला और राजपुर रोड जैसे इलाके उस दौर में अपने विशाल लीची के बागों के लिए ही जाने जाते थे। सर्किट हाउस राजकीय उद्यान में खड़े राजसेंटेड लीची के पेड़ 1910 में लगाए गए थे, जो आज भी फल दे रहे हैं।

राजसेंटेड, लेट बदाना और कलकतिया: दून की तीन मशहूर किस्में

सर्किट हाउस राजकीय उद्यान के उद्यान प्रभारी दीपक कुकरेती ने बताया कि देहरादून एक समय लीची उत्पादन का बड़ा केंद्र हुआ करता था, लेकिन धीरे-धीरे यहां उत्पादन में गिरावट आती गई। उन्होंने कहा कि देहरादून की मिट्टी और जलवायु लीची की खेती के लिए आज भी बहुत अच्छी मानी जाती है। उन्होंने बताया कि उद्यान में मुख्य रूप से तीन किस्मों का उत्पादन किया जाता है, जिनमें राजसेंटेड, लेट बदाना और कलकतिया लीची शामिल हैं।

दीपक कुकरेती के मुताबिक इन सभी किस्मों में राजसेंटेड लीची सबसे खास और सबसे मशहूर है। इसका नाम ही इसकी पहचान बता देता है। जब यह लीची पूरी तरह पक जाती है, तो इसके गूदे और रस से गुलाब जैसी मनमोहक खुशबू आती है। यही सुगंध इसे बाकी सभी किस्मों से अलग और बेहद खास बनाती है। इसके अलावा कुछ ऐसी किस्में भी हैं जिनमें गुठली होती ही नहीं या बहुत छोटी होती है, ऐसी लीची में गूदा काफी ज्यादा होता है।

देर से पकती है, मिठास और सुगंध में बेजोड़

उत्तराखंड में हिमालय की ठंडी तलहटी में उगाई जाने वाली देहरादून की लीची देर से पकने वाली किस्म है। इसकी बाहरी परत गहरे लाल रंग की होती है। इसकी बनावट मुलायम होती है, गूदा बेहद मीठा और ताजगी से भरा होता है। आकार में बड़ी, गूदे में घनी और बीज में बेहद छोटी यह लीची अपनी प्राकृतिक मिठास और सुगंध के चलते पूरे देश में अलग पहचान रखती है।

दीपक कुकरेती ने यह भी बताया कि देहरादून की लीची की मांग लगातार बढ़ रही है। इसकी वजह यह है कि उत्पादन घटता जा रहा है और मांग बढ़ती जा रही है। दोनों के बीच यही असंतुलन इसकी कीमत और प्रतिष्ठा दोनों को ऊपर ले जा रहा है।

मोदी-मेलोनी की मुलाकात के बाद दून की लीची बनी चर्चा की असली वजह

कुछ महीने पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी की मुलाकात के बाद सोशल मीडिया पर 'मेलोडी' टॉफी खूब चर्चाओं में आई थी। लेकिन देहरादून में अभी असली चर्चा 'मेलोडी' की नहीं, बल्कि मेलोनी के देश इटली पहुंच रही दून की खास लीची की हो रही है। यहां से रोज़ाना सेंटेड लीची इटली, अमेरिका और यूरोप के बाजारों में जा रही है। इससे पहले देहरादून की लीची लंदन भी भेजी जा चुकी थी।

इसका आप पर असर

आप पर क्या असर:

  • भारत में: देहरादून की लीची का अंतरराष्ट्रीय निर्यात बढ़ने से घरेलू बाजार में इसकी उपलब्धता सीमित हो सकती है और कीमतें और ऊपर जा सकती हैं।
  • उत्तराखंड में: इटली, अमेरिका और यूरोप जैसे बड़े बाजारों तक पहुंच मिलने से देहरादून के बागवानों और लीची उत्पादकों की आमदनी बढ़ने के मौके खुल रहे हैं।

सवाल-जवाब

देहरादून की लीची इटली कैसे पहुंची?
APEDA यानी कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण के सहयोग से देहरादून के उद्यान विभाग ने हाल ही में 1 मीट्रिक टन लीची की पहली खेप इटली भेजी है।
देहरादून में लीची कब और कैसे आई?
1820 से 1830 के दशक में अंग्रेज हुक्मरानों और चीनी बागवानों के ज़रिए लीची के पौधे दून घाटी में लाए गए थे।
राजसेंटेड लीची क्या है और यह इतनी खास क्यों है?
राजसेंटेड देहरादून की सबसे मशहूर लीची किस्म है, जो पूरी तरह पकने पर गुलाब जैसी सुगंध देती है।
देहरादून में लीची की कौन-सी किस्में उगाई जाती हैं?
देहरादून में मुख्य रूप से राजसेंटेड, लेट बदाना और कलकतिया तीन किस्मों की लीची उगाई जाती है।
सर्किट हाउस राजकीय उद्यान में राजसेंटेड लीची के पेड़ कब से हैं?
सर्किट हाउस राजकीय उद्यान में राजसेंटेड लीची के पेड़ 1910 में लगाए गए थे।
देहरादून की लीची और किन देशों में भेजी जाती है?
इटली के अलावा यहां से रोज़ाना अमेरिका और यूरोप के बाजारों में भी लीची भेजी जाती है, और इससे पहले लंदन भी भेजी जा चुकी है।
देहरादून की लीची की मांग क्यों बढ़ रही है?
उत्पादन लगातार घटने और मांग बढ़ने के कारण देहरादून की लीची की कीमत और लोकप्रियता दोनों में इजाफा हो रहा है।
Arshdeep Ahluwalia
लेखक के बारे मेंArshdeep AhluwaliaNorth India Correspondent Chandigarh
विशेषज्ञताRegional News, Punjab News, Haryana News, Himachal Pradesh News, Uttarakhand News, Politics, Governance, Infrastructure, Agriculture, Social Issues, Breaking News

Arshdeep Ahluwalia is a Regional Correspondent covering Punjab, Haryana, Himachal Pradesh, and Uttarakhand. He reports on breaking news, regional politics, social issues, infrastructure, and cultural developments across North India.

Arshdeep Ahluwalia is a Regional Correspondent specializing in news coverage across Punjab, Haryana, Himachal Pradesh, and Uttarakhand. He reports on breaking regional developments, politics, governance, law and order, infrastructure projects, agriculture, weather impacts, and cultural events across North India. With a strong focus on ground reporting and factual storytelling, Arshdeep delivers timely updates and in-depth coverage of issues affecting local communities and state-level policies. His reporting highlights regional governance, public welfare initiatives, economic developments, and social change, providing readers with a clear and reliable understanding of events shaping North India.

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