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भारत और चीन के बीच व्यापार फिर शुरू होने से उत्तराखंड के जौलजीबी मेले में 6 साल बाद दिखेगा तिब्बती सामानउत्तराखंड
9 अक्तू॰ 2026, 7:04 pm (2 घंटे पहले)· 0

भारत और चीन के बीच व्यापार फिर शुरू होने से उत्तराखंड के जौलजीबी मेले में 6 साल बाद दिखेगा तिब्बती सामान

पिथौरागढ़ में लिपुलेख दर्रे से सीमा व्यापार बहाल होने के बाद तकलाकोट मंडी के पारंपरिक उत्पादों की जौलजीबी मेले में वापसी होगी। छह वर्षों के गतिरोध के बाद तीन दल तिब्बत रवाना हो चुके हैं।

पिथौरागढ़ जिले में भारत और चीन के बीच सीमांत व्यापार दोबारा बहाल होने से इस वर्ष ऐतिहासिक जौलजीबी मेले की पुरानी रंगत फिर से लौटने की उम्मीद है। दोनों देशों के बीच बनी सहमति के बाद व्यापारिक गतिविधियां शुरू हो चुकी हैं, जिससे हिमालयी क्षेत्र के बाजारों में उत्साह का माहौल है। भारतीय व्यापारियों के तीन दल तिब्बत स्थित तकलाकोट मंडी के लिए रवाना भी हो चुके हैं। ये दल वहां से ऐसे दुर्लभ उत्पाद लेकर लौटेंगे, जो इस पारंपरिक सीमांत मेले की मुख्य पहचान रहे हैं।

लिपुलेख दर्रे से व्यापार का इतिहास और छह वर्षों का विराम

भारत और चीन के बीच वर्ष 1992 से रणनीतिक लिपुलेख दर्रे के जरिए सीमांत व्यापार का संचालन होता आ रहा था। हालांकि वर्ष 2020 में चीन की तरफ से इस मार्ग पर व्यापारिक आवाजाही पूरी तरह रोक दी गई थी। इस पाबंदी के चलते छह वर्षों तक सीमांत कारोबार ठप पड़ा रहा। अब दोनों देशों के बीच हुए समझौते के बाद यह मार्ग फिर से खुल गया है। भारतीय व्यापारी तिब्बत से ऐसे सामान लाते हैं, जिसकी हिमालयी भूभाग में रहने वाले स्थानीय निवासियों को दैनिक जीवन में अत्यधिक आवश्यकता रहती है, साथ ही इनमें कई ऐसी अनूठी वस्तुएं भी शामिल होती हैं जो अन्य सामान्य बाजारों में उपलब्ध नहीं होती हैं।

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काली और गोरी नदी के संगम पर 14 नवंबर से सजेगा मेला

पिथौरागढ़ में काली और गोरी नदी के पावन संगम स्थल पर 14 नवंबर से ऐतिहासिक जौलजीबी मेला शुरू होने जा रहा है। अतीत में यह आयोजन भारत, नेपाल और तिब्बत के बीच एक साझा अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक केंद्र हुआ करता था। समय बीतने के साथ मेले की रूपरेखा में कई बदलाव आए हैं। मौजूदा दौर में तिब्बत के व्यापारी अब सीधे इस मेले में दुकान लगाने नहीं आते, लेकिन भारत और नेपाल के व्यापारी नियमित रूप से यहां अपनी भागीदारी दर्ज कराते हैं। स्वरूप बदलने के बावजूद इस मेले का मुख्य आकर्षण सदैव तिब्बत से आने वाली विशेष वस्तुएं ही रही हैं।

छिरबी, कंबल और पारंपरिक सामान की बाजार में मांग

भारतीय व्यापारी तकलाकोट मंडी से विशेष रूप से साभर के जूते, ऊनी वस्त्र, गर्म जैकेट, छिरबी, पारंपरिक कंबल और चुरू जैसे उत्पाद भारत लाते हैं। मेले के दौरान इन सामग्रियों की मांग सबसे अधिक देखी जाती है। स्थानीय व्यापारी गजेंद्र सिंह का कहना है कि व्यापार पर लगी रोक के कारण पिछले 6 वर्षों से तिब्बती सामान जौलजीबी मेले तक नहीं पहुंच पा रहा था। कुछ व्यापारी पूर्ववर्ती वर्षों में नेपाल के वैकल्पिक रास्ते से सीमित मात्रा में सामान लाए थे, लेकिन ढुलाई लागत अधिक होने से कीमतें बढ़ गईं और खरीदार नहीं मिले। अब नियमित व्यापारिक मार्ग खुल जाने से यह तय है कि मेले में ग्राहकों को उनकी जरूरत का प्रामाणिक सामान उचित दामों पर मिल सकेगा।

सवाल-जवाब

जौलजीबी मेला कब और कहां आयोजित किया जाएगा?
जौलजीबी मेला 14 नवंबर से पिथौरागढ़ में काली और गोरी नदी के संगम पर शुरू होगा।
भारत और चीन के बीच यह सीमा व्यापार किस मार्ग से होता है?
यह व्यापारिक आवाजाही लिपुलेख दर्रे के जरिए तिब्बत की तकलाकोट मंडी तक होती है।
भारत-चीन सीमा व्यापार कब से बंद था?
साल 2020 में चीन द्वारा रोक लगाए जाने के बाद से यह व्यापार बीते 6 सालों से बंद था।
व्यापारी तिब्बत की तकलाकोट मंडी से कौन-सा सामान लाते हैं?
व्यापारी वहां से साभर के जूते, ऊनी कपड़े, जैकेट, छिरबी, कंबल और चुरू जैसे खास उत्पाद लाते हैं।
क्या वर्तमान में तिब्बत के व्यापारी जौलजीबी मेले में आते हैं?
नहीं, वर्तमान में तिब्बत के व्यापारी सीधे मेले में नहीं आते, लेकिन भारत और नेपाल के व्यापारी इसमें शामिल होते हैं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·56 मिनट पहले

छह साल बाद तकलाकोट मंडी से सामान आना वाकई बड़ी राहत है, इस बार जौलजीबी मेले की रौनक ही अलग होगी।

Karan Malhotra@karan-malhotra·56 मिनट पहले

रोहन भाई, बिल्कुल सही कहा। पिछली बार जब मैं वहाँ गया था, तो मेले में वो तिब्बती सामान न होने सूनापन साफ दिख रहा था, इस बार असली रौनक लौटेगी।

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