पिथौरागढ़ जिले में भारत और चीन के बीच सीमांत व्यापार दोबारा बहाल होने से इस वर्ष ऐतिहासिक जौलजीबी मेले की पुरानी रंगत फिर से लौटने की उम्मीद है। दोनों देशों के बीच बनी सहमति के बाद व्यापारिक गतिविधियां शुरू हो चुकी हैं, जिससे हिमालयी क्षेत्र के बाजारों में उत्साह का माहौल है। भारतीय व्यापारियों के तीन दल तिब्बत स्थित तकलाकोट मंडी के लिए रवाना भी हो चुके हैं। ये दल वहां से ऐसे दुर्लभ उत्पाद लेकर लौटेंगे, जो इस पारंपरिक सीमांत मेले की मुख्य पहचान रहे हैं।
लिपुलेख दर्रे से व्यापार का इतिहास और छह वर्षों का विराम
भारत और चीन के बीच वर्ष 1992 से रणनीतिक लिपुलेख दर्रे के जरिए सीमांत व्यापार का संचालन होता आ रहा था। हालांकि वर्ष 2020 में चीन की तरफ से इस मार्ग पर व्यापारिक आवाजाही पूरी तरह रोक दी गई थी। इस पाबंदी के चलते छह वर्षों तक सीमांत कारोबार ठप पड़ा रहा। अब दोनों देशों के बीच हुए समझौते के बाद यह मार्ग फिर से खुल गया है। भारतीय व्यापारी तिब्बत से ऐसे सामान लाते हैं, जिसकी हिमालयी भूभाग में रहने वाले स्थानीय निवासियों को दैनिक जीवन में अत्यधिक आवश्यकता रहती है, साथ ही इनमें कई ऐसी अनूठी वस्तुएं भी शामिल होती हैं जो अन्य सामान्य बाजारों में उपलब्ध नहीं होती हैं।
काली और गोरी नदी के संगम पर 14 नवंबर से सजेगा मेला
पिथौरागढ़ में काली और गोरी नदी के पावन संगम स्थल पर 14 नवंबर से ऐतिहासिक जौलजीबी मेला शुरू होने जा रहा है। अतीत में यह आयोजन भारत, नेपाल और तिब्बत के बीच एक साझा अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक केंद्र हुआ करता था। समय बीतने के साथ मेले की रूपरेखा में कई बदलाव आए हैं। मौजूदा दौर में तिब्बत के व्यापारी अब सीधे इस मेले में दुकान लगाने नहीं आते, लेकिन भारत और नेपाल के व्यापारी नियमित रूप से यहां अपनी भागीदारी दर्ज कराते हैं। स्वरूप बदलने के बावजूद इस मेले का मुख्य आकर्षण सदैव तिब्बत से आने वाली विशेष वस्तुएं ही रही हैं।
छिरबी, कंबल और पारंपरिक सामान की बाजार में मांग
भारतीय व्यापारी तकलाकोट मंडी से विशेष रूप से साभर के जूते, ऊनी वस्त्र, गर्म जैकेट, छिरबी, पारंपरिक कंबल और चुरू जैसे उत्पाद भारत लाते हैं। मेले के दौरान इन सामग्रियों की मांग सबसे अधिक देखी जाती है। स्थानीय व्यापारी गजेंद्र सिंह का कहना है कि व्यापार पर लगी रोक के कारण पिछले 6 वर्षों से तिब्बती सामान जौलजीबी मेले तक नहीं पहुंच पा रहा था। कुछ व्यापारी पूर्ववर्ती वर्षों में नेपाल के वैकल्पिक रास्ते से सीमित मात्रा में सामान लाए थे, लेकिन ढुलाई लागत अधिक होने से कीमतें बढ़ गईं और खरीदार नहीं मिले। अब नियमित व्यापारिक मार्ग खुल जाने से यह तय है कि मेले में ग्राहकों को उनकी जरूरत का प्रामाणिक सामान उचित दामों पर मिल सकेगा।





















