उत्तराखंड के नैनीताल के पास स्थित मनोरा पर्वत को आज एक पावन धाम और प्रसिद्ध पर्यटन स्थल के रूप में जाना जाता है, लेकिन कुछ दशक पहले तक इस जगह की पहचान बिल्कुल अलग थी। कुमाऊं मंडल के इस पहाड़ी भूभाग पर एक समय ऐसा घना और डरावना जंगल पसरा था, जहां दिन के उजाले में भी कोई कदम रखने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था। मान्यता है कि जब 1950 के दशक में संत बाबा नीब करौली महाराज ने इस क्षेत्र में अपने चरण रखे, तो इस निर्जन और खौफनाक पहाड़ी का पूरा कायाकल्प हो गया। लगातार होने वाले भूस्खलन का सिलसिला थम गया और एक वीरान कब्रिस्तान देखते ही देखते आस्था के विशाल केंद्र हनुमानगढ़ के रूप में विकसित हो गया।
मनोरा पहाड़ी का अतीत और संक्रामक बीमारियों का दौर
इतिहास के पन्नों में नैनीताल और उसके आसपास के क्षेत्रों का विस्तार से वर्णन मिलता है। ब्रिटिश शासनकाल के दौरान नैनीताल शहर के आसपास मुख्य रूप से तीन इलाके बसे थे, जिन्हें दुर्गापुर, अमृतपुर और कृष्णापुर कहा जाता था। वर्तमान समय में जहां हनुमानगढ़ और खगोलीय वेधशाला परिसर मौजूद है, वह समूचा हिस्सा अमृतपुर के नाम से जाना जाता था। औपनिवेशिक दौर में इस समूचे इलाके में एक भीषण भूस्खलन हुआ था, जिसने पूरी पहाड़ी की बनावट को हिलाकर रख दिया था।
इस भारी तबाही के बाद वहां जंगली झाड़ियों और पेड़ों का ऐसा घना जंगल पनप गया, जिसमें जंगली जानवरों का बसेरा हो गया। उसी कालखंड में जब आसपास की बस्तियों में गंभीर और संक्रामक महामारियां फैलीं, तो जान गंवाने वाले छोटे बच्चों को दफनाने के लिए इसी निर्जन जंगल को चुना गया। समय बीतने के साथ यह स्थान बच्चों के कब्रिस्तान में तब्दील हो गया। स्थानीय लोगों के दिलों में इस जगह को लेकर ऐसा गहरा खौफ बैठ गया कि शाम होते ही लोग इस रास्ते से गुजरने से भी कतराते थे।
प्राकृतिक सौंदर्य से आकर्षित होकर बाबा ने चुनी यह भूमि
जब बाबा नीब करौली महाराज का आगमन कुमाऊं की पहाड़ी वादियों में हुआ, तो मनोरा पर्वत के नैसर्गिक रूप और उसकी शांति ने उन्हें अपनी ओर खींचा। बाबा ने स्थानीय लोगों के मन में बैठे अज्ञात भय को मिटाने और इस वीरान जगह को आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र बनाने का संकल्प लिया। इतिहासकार प्रोफेसर अजय रावत ने अपनी पुस्तक ‘उत्तराखंड का सांस्कृतिक इतिहास’ में इस पूरे घटनाक्रम का प्रामाणिक ब्योरा दर्ज किया है।
पुस्तक के विवरणों के मुताबिक, बाबा नीब करौली महाराज ने मनोरा पर्वत पर सबसे पहले 15 जुलाई 1952 को पवनपुत्र हनुमान जी की एक छोटी प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा कराई। इसके ठीक अगले वर्ष, 16 जून 1953 को उसी स्थल पर हनुमान जी की एक भव्य और विशाल प्रतिमा विधि-विधान से स्थापित की गई। नैनीताल और हल्द्वानी मोटर मार्ग पर स्थित इस पावन धाम को बाद में हनुमानगढ़ नाम से प्रसिद्धि मिली। समय के साथ यहां भगवान शिव और प्रभु श्री राम की सभा के मंदिरों का निर्माण भी कराया गया। हालांकि बाद के दिनों में बाबा का अधिकांश समय भूमियाधार, कैंची और काकड़ीघाट में व्यतीत हुआ, लेकिन हनुमानगढ़ की नींव ने इस पूरे क्षेत्र का भाग्य सदा के लिए बदल दिया।
मूर्ति स्थापना और अतिवृष्टि के बीच चमत्कारिक भंडारा
प्रोफेसर अजय रावत की पुस्तक में बाबा के अनन्य सेवक और स्थानीय निवासी भुवन बिष्ट के संस्मरण का भी उल्लेख है। भुवन बिष्ट ने मंदिर में प्रतिमा प्रतिष्ठापन के समय घटी एक विस्मयकारी घटना को साझा किया था। उनके अनुसार, मंदिर के प्रतिष्ठा समारोह के समापन पर एक विशाल भंडारे का आयोजन तय किया गया था, लेकिन किसी कारणवश इसकी पूर्व तैयारियां पूरी नहीं हो पाई थीं। समारोह में केवल दो दिन का समय शेष था और ठीक उसी समय नैनीताल में मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। भारी अतिवृष्टि के कारण पहाड़ धसकने लगे, जगह-जगह से चट्टानें खिसक कर गिरने लगीं और शहर को जोड़ने वाली सभी मुख्य सड़कें पूरी तरह बंद हो गईं।
मंदिर पहाड़ी की ऊंची धार पर स्थित था और ऐसे बिगड़े मौसम में राशन, सब्जियां और अन्य जरूरी सामान ऊपर पहुंचाना इंसानी तौर पर असंभव जान पड़ रहा था। व्यवस्था में लगे लोग गहरी चिंता में डूब गए। तभी अचानक बारिश कुछ पलों के लिए थम गई। बाबा नीब करौली महाराज ने आयोजकों को आदेश दिया कि वे तुरंत पहाड़ी के नीचे जाएं, क्योंकि वहां एक ट्रक उनका इंतजार कर रहा है। कार्यकर्ता हैरान थे क्योंकि रास्ते बंद थे, फिर भी वे आदेश मानकर नीचे पहुंचे। नीचे सचमुच सूखे राशन, सब्जियों और शुद्ध घी से लदा हुआ एक ट्रक खड़ा मिला, जिसके साथ सहायक भी मौजूद थे। फिसलन भरे और जोखिम भरे पहाड़ी रास्ते पर रेंगते हुए भक्त उस भारी सामान को अपनी पीठ पर लादकर ऊपर मंदिर परिसर तक लाए। जैसे ही अंतिम बोरी मंदिर पहुंची, आकाश से दोबारा तेज बारिश शुरू हो गई।
जब कनस्तरों का पानी बन गया शुद्ध घी
समारोह के दिन मनोरा पर्वत पर प्रसाद ग्रहण करने के लिए श्रद्धालुओं का भारी हुजूम उमड़ पड़ा। दूर-दराज से आए भक्तों की कतारें लंबी होती जा रही थीं। इसी बीच भंडारा बना रहे हलवाइयों के सामने एक गंभीर संकट आ गया कि भोजन तैयार करने का मुख्य साधन शुद्ध घी पूरी तरह समाप्त होने की कगार पर पहुंच गया। भक्तों की बढ़ती भीड़ देखकर प्रबंधकों के हाथ-पांव फूल गए।
घबराए हुए सेवादार सीधे बाबा नीब करौली महाराज के पास पहुंचे और उन्हें घी के अभाव से अवगत कराया। बाबा ने अत्यंत शांत भाव से सहायकों को टिन के कुछ खाली कनस्तरों में सादा पानी भरकर लाने को कहा। जब पानी से भरे कनस्तर उनके सामने रखे गए, तो बाबा ने सहजता से अपनी तर्जनी उंगली से उन्हें स्पर्श कर दिया। उपस्थित लोगों ने देखा कि कनस्तरों का पानी पल भर में शुद्ध घी में परिवर्तित हो गया। उसी सामग्री से हलवाइयों ने पूरा भोजन तैयार किया, पूड़ियां तलीं और हर एक श्रद्धालु को तृप्त होने तक प्रसाद बांटा गया।
भंडारे में उमड़ी बच्चों की भीड़ और रहस्यमयी उपस्थिति
बाबा के जीवन और चमत्कारों पर काम करने वाले शोधकर्ता और वृत्तचित्र निर्माता कुणाल माधव मिश्रा ने भी इस स्थान के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण प्रसंग उजागर किया है। उन्होंने बाबा के अत्यंत निकटवर्ती सहयोगी गुरुदत्त शर्मा से हुई भेंट का उल्लेख किया। गुरुदत्त शर्मा ने बताया था कि स्थानीय मान्यता के अनुसार उस भयानक जंगल से अक्सर मासूम बच्चों के रोने और कराहने की ध्वनियां सुनाई देती थीं, जिससे राहगीर सहम जाते थे।
गुरुदत्त शर्मा ने हनुमानगढ़ में मंदिर स्थापना के दिन आयोजित भंडारे का आंखों देखा विवरण देते हुए बताया कि जब प्रसाद वितरण आरंभ हुआ, तो अचानक हजारों की संख्या में छोटे-छोटे बच्चे वहां पहुंच गए। इतनी बड़ी तादाद में बच्चों का अचानक घने जंगल के बीच आ जाना व्यवस्थापकों के लिए गहरा अचरज बन गया, क्योंकि आसपास कोई बड़ी बस्ती तक नहीं थी। सभी हैरान थे कि आखिर इतने सारे बच्चे कहां से प्रकट हो गए। इस विस्मय को देखकर बाबा नीब करौली महाराज के चेहरे पर एक सौम्य मुस्कान उभरी और उन्होंने वहां मौजूद प्रबंधकों को समझाया कि उस भूमि पर दफन रहे बच्चों की अतृप्त आत्माएं ही इस पावन भंडारे का प्रसाद पाकर तृप्त होने आई हैं। इस अलौकिक घटना के बाद उस पहाड़ी से रोने की आवाजें और नकारात्मक भय सदा के लिए समाप्त हो गया, और वह खौफनाक जंगल आज हर साल लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करने वाला एक पावन तीर्थ बन चुका है।



















