पहाड़ी अंचल उत्तराखंड की समृद्ध लोक विरासत में हुड़का केवल एक वाद्य यंत्र नहीं, बल्कि भक्ति और अध्यात्म का सशक्त माध्यम माना जाता है। डमरू सदृश बनावट वाला यह पारंपरिक वाद्य देवों के देव भगवान शिव से गहराई से जुड़ा है। लोक मान्यता के अनुसार, हुड़के की गंभीर और गूंजती थाप महादेव को अत्यंत प्रिय है। इसी वजह से हिमालयी क्षेत्रों में आयोजित होने वाले पौराणिक देव-आह्वान अनुष्ठान यानी जागर और पारंपरिक गाथाओं के गायन में इसकी उपस्थिति अनिवार्य मानी जाती है। जब जगरिया इसकी थाप पर सुर छेड़ते हैं, तो समूचा परिवेश एक अलौकिक ऊर्जा और भक्ति रस से सराबोर हो उठता है।
नदी किनारे की लकड़ियों और विशेष कारीगरी से होता है निर्माण
इस अनूठे वाद्य यंत्र को तैयार करने की विधि सदियों पुरानी शिल्प कला का सुंदर उदाहरण है। उत्तराखंड के लोक कलाकार राम चरण जुयाल इस पारंपरिक वाद्य के निर्माण और इसके आध्यात्मिक महत्व से लंबे समय से जुड़े रहे हैं। वे बताते हैं कि हुड़के का केंद्रीय खोखला ढांचा नदी तटों पर उगने वाले पेड़ों की मजबूत लकड़ियों को तराश कर बनाया जाता है। शीशम, अखरोट, खमीण और तुन जैसी टिकाऊ लकड़ियों को कुशल कारीगर काटकर डमरू का स्वरूप देते हैं। स्थानीय बोली में लकड़ी के इस खोखले मुख्य भाग को नाई या नाली कहा जाता है।
लकड़ी का यह मूल ढांचा तैयार होने के बाद इसके दोनों खुले मुहानों पर चमड़ा मढ़ने की प्रक्रिया शुरू होती है। इसके लिए बकरी अथवा हिरण की मुलायम किंतु मजबूत खाल का उपयोग किया जाता है। कई बार इसे पेट के आमाशय की पतली झिल्ली से भी सुसज्जित किया जाता है, ताकि आघात करने पर स्वर में अपेक्षित लोच और गहराई पैदा हो सके।
सूत की डोरियों से स्वर नियंत्रण और वादन शैली
हुड़के से निकलने वाली अनूठी ध्वनि का वास्तविक रहस्य इसके कसाव और बजाने के विशेष तरीके में छिपा है। दोनों सिरों पर मढ़ी गई खाल को ढांचे पर साधने के लिए सूत अथवा मूंज की मजबूत रस्सियों का जटिल जाल बुना जाता है। इन डोरियों को आपस में इस तरह कसा जाता है कि चोट पड़ते ही सही सुर उत्पन्न हो सके।
वादन के समय कलाकार इसे मजबूत रस्सी के सहारे अपने कंधे पर लटका लेता है। इसका वादन दोनों हाथों के अद्भुत समन्वय पर निर्भर करता है। वादक एक हाथ से सूत की डोरियों को दबाकर और ढीला छोड़कर ध्वनि की पिच तथा गूंज को नियंत्रित करता है, जबकि दूसरे हाथ में पकड़ी गई छोटी लकड़ी की डांडी, जिसे स्थानीय भाषा में कोनी कहा जाता है, उससे खाल पर सधी हुई थाप दी जाती है। रस्सियों पर पड़ने वाले इस खिंचाव और ढीलेपन के तालमेल से एक सम्मोहक और भारी ध्वनि गूंजती है।
गीत और जागर दोनों विधाओं में समान सहभागिता
पहाड़ों में गायन परंपरा को मुख्यतः दो श्रेणियों में देखा जाता है, जिनमें एक जागर शैली है और दूसरी लोकगीत शैली। सामान्य गीतों में जहां ढोलक की प्रधानता रहती है और जागर अनुष्ठानों में ढोल-दमाऊ की गूंज सुनाई देती है, वहीं हुड़के की विशेषता यह है कि यह दोनों ही विधाओं में समान रूप से बजाया जाता है। डमरू परिवार का अंग होने के कारण इसका सीधा आध्यात्मिक नाता भोलेनाथ से जोड़ा जाता है। यही कारण है कि आज भी उत्तराखंड के लोक जीवन, शिव उपासना और सांस्कृतिक अनुष्ठानों में हुड़के का स्थान अद्वितीय बना हुआ है।



















