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कन्या पूजन में किस उम्र की बच्ची को खिलाना चाहिए भोजन, जानें क्या कहता है शास्त्रउत्तराखंड
16 अक्तू॰ 2026, 4:39 pm (47 मिनट पहले)· 0

कन्या पूजन में किस उम्र की बच्ची को खिलाना चाहिए भोजन, जानें क्या कहता है शास्त्र

ऋषिकेश के ज्योतिषी अखिलेश पांडेय के अनुसार नवरात्रि की अष्टमी और नवमी पर दो से दस साल तक की कन्याओं का पूजन किया जाता है। हर उम्र की कन्या का अलग नाम, धार्मिक महत्व और फल बताया गया है।

ऋषिकेश में नवरात्रि के पावन अवसर पर मां दुर्गा की आराधना के साथ कन्या पूजन का विशेष विधान है। लोग आमतौर पर अष्टमी और नवमी के पवित्र दिनों में कन्याओं को अपने घर आमंत्रित करते हैं। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि छोटी बच्चियों में देवी का रूप मानकर उनकी पूजा करने से मां दुर्गा का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है, लेकिन बहुत से लोग यह नहीं जानते कि किस आयु वर्ग की कन्याओं को भोजन कराना सबसे उपयुक्त माना जाता है।

विभिन्न आयु की कन्याओं के अलग नाम और स्वरूप

ऋषिकेश के ज्योतिषी अखिलेश पांडेय के अनुसार शास्त्रों में स्पष्ट रूप से दो वर्ष से लेकर दस वर्ष तक की आयु की कन्याओं को कन्या पूजन के लिए योग्य माना गया है। जीवन के इन अलग-अलग पड़ावों पर हर उम्र की बच्ची का एक विशिष्ट नाम और विशेष महत्व होता है। दो वर्ष की आयु वाली कन्या को कुमारी कहा जाता है, जबकि तीन वर्ष की बच्ची को त्रिमूर्ति माना गया है। चार वर्ष की कन्या को कल्याणी के रूप में पूजा जाता है और पांच वर्ष की बच्ची रोहिणी का स्वरूप होती है। इसके अलावा छह वर्ष की कन्या को कालिका और सात वर्ष की बच्ची को चंडिका के रूप में सम्मान दिया जाता है।

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बड़ी आयु वर्ग की कन्याओं का महत्व और पूजा विधि

जैसे-जैसे आयु बढ़ती है, कन्याओं के स्वरूप भी बदलते जाते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार आठ वर्ष की कन्या को शाम्भवी, नौ वर्ष की बच्ची को दुर्गा और दस वर्ष की आयु पूरी करने वाली कन्या को सुभद्रा के रूप में पूजा जाता है। इन सभी उम्र की बालिकाओं को साक्षात मां दुर्गा का स्वरूप मानकर उनका सत्कार किया जाता है। अष्टमी या नवमी के दिन इन कन्याओं को घर बुलाकर उनकी आरती उतारी जाती है, उनके चरण धोए जाते हैं और उनसे आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है।

प्रसाद और बटुक भैरव पूजन की परंपरा

ऐसी मान्यता है कि इन बालिकाओं की विधि-विधान से पूजा करने पर घर-परिवार में सुख-समृद्धि का वास होता है और मां की कृपा हमेशा बनी रहती है। पूजन के उपरांत कन्याओं को पूरी, हलवा और काले चने का प्रसाद खिलाया जाता है। इसके पश्चात श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और आर्थिक सामर्थ्य के अनुसार उन्हें दक्षिणा, फल, मिठाइयां या अन्य उपहार भेंट करते हैं। ज्योतिषी अखिलेश पांडेय यह भी बताते हैं कि नौ कन्याओं के साथ एक बालक को भोजन कराना भी आवश्यक माना गया है, जिसे बटुक भैरव का प्रतीक माना जाता है। इस बालक की भी आरती की जाती है, चरण धोए जाते हैं और आशीर्वाद लेकर प्रसाद खिलाया जाता है। इन सभी को भोजन कराने के बाद ही व्रत रखने वाले लोग अपना उपवास खोलते हैं।

सवाल-जवाब

कन्या पूजन के लिए किस उम्र की कन्याओं को योग्य माना गया है?
शास्त्रों के अनुसार दो वर्ष से लेकर दस वर्ष तक की आयु की कन्याओं को कन्या पूजन के योग्य बताया गया है।
दो वर्ष और तीन वर्ष की कन्या को किस नाम से जाना जाता है?
दो वर्ष की कन्या को कुमारी और तीन वर्ष की कन्या को त्रिमूर्ति कहा जाता है।
आठ वर्ष और नौ वर्ष की कन्या का क्या स्वरूप माना गया है?
आठ वर्ष की कन्या को शाम्भवी और नौ वर्ष की कन्या को दुर्गा के स्वरूप में पूजा जाता है।
कन्या पूजन के दौरान क्या प्रसाद खिलाया जाता है?
कन्याओं को पूरी, हलवा और चने का प्रसाद खिलाया जाता है।
कन्याओं के साथ कितने बालकों को भोजन कराया जाता है?
नौ कन्याओं के साथ एक बालक को भोजन कराया जाता है जिसे बटुक भैरव का प्रतीक माना जाता है।
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