उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में हो रही वर्षा का प्रभाव अब मैदानी और निचले इलाकों में बहने वाली नदियों पर स्पष्ट रूप से दिखने लगा है। प्रसिद्ध तीर्थ नगरी ऋषिकेश में गंगा नदी का स्वरूप इन दिनों पूरी तरह बदला हुआ नजर आ रहा है। आमतौर पर साफ, निर्मल और नीले या हल्के हरे रंग में दिखने वाली गंगा का जल अब मटमैले और भूरे रंग में तब्दील हो चुका है। तटों पर आने वाले श्रद्धालु और पर्यटक नदी के इस बदले रूप को देखकर हैरान हैं, क्योंकि दूर से ही पानी का यह परिवर्तन साफ नजर आता है।
पहाड़ों से बहकर आ रही मिट्टी और गाद
पर्वतीय इलाकों में जब मूसलाधार बारिश होती है, तो तेज बहाव के साथ ढलानों से मिट्टी, बारीक रेत और गाद बहकर नीचे आने लगती है। यह मटमैला पानी प्राकृतिक नालों और छोटी-बड़ी सहायक धाराओं के माध्यम से मुख्य नदी में शामिल होता है। ऋषिकेश तक पहुंचते-पहुंचते कई पहाड़ी धाराएं गंगा के मुख्य प्रवाह में मिलती हैं। लगातार हो रही वर्षा के कारण जल में अवसाद और मिट्टी की मात्रा अत्यधिक बढ़ जाती है, जिससे नदी का प्राकृतिक रंग छिप जाता है और पानी मटमैला दिखाई देने लगता है। मानसून के दौरान यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया मानी जाती है।
ऋषिकेश के घाटों पर पर्यटकों का अनुभव
गंगा किनारे पहुंचे पर्यटकों और श्रद्धालुओं के लिए यह बदलाव काफी प्रत्यक्ष है। ऋषिकेश घूमने आई पर्यटक वर्षा के अनुसार, सामान्य दिनों में गंगा का जल बहुत साफ और पारदर्शी दिखाई देता है, परंतु इन दिनों घाटों के समीप पानी पूरी तरह मटमैला नजर आ रहा है। उन्होंने बताया कि नदी में स्नान करते समय शरीर पर रेत और मिट्टी के कण चिपक रहे हैं। पहाड़ों से उतरने वाला पानी अपने साथ जो गाद लेकर आ रहा है, वह तटों के आसपास भी जमा हो रही है।
जलस्तर और बहाव की गति में तेजी
बारिश के इस मौसम में केवल पानी का रंग ही नहीं बदला है, बल्कि गंगा के जलस्तर और बहाव की गति में भी तेजी दर्ज की जा रही है। ऊपरी इलाकों से आने वाली अतिरिक्त जलराशि के कारण नदी का प्रवाह अधिक तीव्र हो गया है। मानसूनी अवधि में पर्वतीय नदियों में मिट्टी का मिलना और बहाव का बढ़ना सामान्य घटना है, जो बारिश के थमने और मौसम साफ होने के साथ धीरे-धीरे स्वतः ठीक हो जाती है।



















