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उत्तराखंड में रक्षाबंधन पर महिलाओं को मुफ्त सफर का ऐलान, लेकिन ओखलकांडा में बसें न चलने से योजना बेअसरउत्तराखंड
26 अग॰ 2026, 5:22 pm (1 घंटे पहले)· 3

उत्तराखंड में रक्षाबंधन पर महिलाओं को मुफ्त सफर का ऐलान, लेकिन ओखलकांडा में बसें न चलने से योजना बेअसर

उत्तराखंड सरकार ने रक्षाबंधन पर रोडवेज बसों में 28 और 29 अगस्त को महिलाओं के लिए मुफ्त यात्रा की घोषणा की है, लेकिन नैनीताल जिले के ओखलकांडा ब्लॉक में बस सेवा न होने से यह तोहफा अधूरा साबित हो रहा है।

रक्षाबंधन के पावन अवसर पर उत्तराखंड सरकार ने राज्य भर की महिलाओं के लिए एक विशेष राहत योजना की घोषणा की है। इस फैसले के तहत आगामी 28 और 29 अगस्त को प्रदेश भर की महिलाएं उत्तराखंड परिवहन निगम की रोडवेज बसों में बिना कोई किराया दिए यात्रा कर सकती हैं। शासन का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि बहनें अपने भाइयों के घर पहुंचकर आसानी से राखी बांध सकें और उन पर किसी तरह का आर्थिक बोझ न पड़े। राज्य के मैदानी जिलों और शहरी इलाकों में इस सरकारी कदम का व्यापक स्वागत किया जा रहा है। इसके विपरीत, नैनीताल जिले के बेहद दूरस्थ और दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र ओखलकांडा में यह घोषणा धरातल पर प्रभावहीन नजर आ रही है, क्योंकि वहां परिवहन नेटवर्क की बुनियादी सुविधाएं ही मौजूद नहीं हैं।

ओखलकांडा में जमीनी हकीकत और बुनियादी सुविधाओं का अभाव

पहाड़ी क्षेत्र ओखलकांडा के निवासियों का कहना है कि जब इलाके में सरकारी परिवहन निगम की गाड़ियां चलती ही नहीं हैं, तब ऐसी घोषणाओं का उनके लिए कोई व्यावहारिक अर्थ नहीं रह जाता। इस ब्लॉक के अंतर्गत आने वाली लगभग 75 ग्राम पंचायतों की महिलाओं के सामने यह यक्ष प्रश्न खड़ा हो गया है कि वे किस प्रकार इस योजना का लाभ उठाएं। दशकों से इस क्षेत्र में नियमित सार्वजनिक बस नेटवर्क पूरी तरह ठप पड़ा हुआ है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि जब उनके गांवों तक रोडवेज की एक भी बस नहीं पहुंचती, तो दो दिनों की मुफ्त यात्रा योजना केवल कागजों तक ही सीमित रह जाती है।

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मुख्य सड़क तक पैदल सफर और निजी वाहनों का आर्थिक बोझ

ओखलकांडा ब्लॉक के ग्रामीण अंचलों की भौगोलिक संरचना अत्यंत कठिन और चुनौतीपूर्ण है। गांवों से मुख्य मार्ग तक पहुंचने की राह अपने आप में किसी परीक्षा से कम नहीं होती। महिलाओं को अपने घरों से निकलकर पक्की सड़क तक पहुंचने के लिए लगभग 5 से 6 किलोमीटर की तीखी चढ़ाई और उतराई पैदल ही पार करनी पड़ती है। कठिन और पथरीले रास्तों पर घंटों पैदल चलने के बाद जब वे पसीने से लथपथ होकर सड़क पर पहुंचती हैं, तब भी उन्हें वहां कोई सरकारी बस उपलब्ध नहीं मिलती।

त्योहार के दौरान मायके या रिश्तेदारों के घर जाने के लिए महिलाओं के पास निजी वाहनों, जैसे मैक्स, जीप या स्थानीय टैक्सियों के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता। पर्व के समय में निजी वाहन चालक और ऑपरेटर यात्रियों से मनमाना किराया वसूलते हैं। ऐसी स्थिति में सरकारी स्तर पर दी जाने वाली मुफ्त बस सुविधा का लाभ मिलना तो दूर, ग्रामीण महिलाओं को अपनी जेब से भारी रकम खर्च करनी पड़ती है, जिससे त्यौहार के बजट पर बुरा असर पड़ता है।

स्थानीय महिलाओं का दर्द और दैनिक चुनौतियां

क्षेत्र की बदहाल परिवहन व्यवस्था पर अपना अनुभव साझा करते हुए स्थानीय निवासी दीपा देवी ने बताया कि पक्की सड़क तक पहुंचने के लिए उन्हें कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। लेकिन सड़क पर पहुंचने के बाद रोडवेज बस का न मिलना उनकी परेशानियों को और बढ़ा देता है। मजबूरी में उन्हें महंगे दामों पर निजी गाड़ियों का टिकट खरीदना पड़ता है। उन्होंने कहा, “हमें तो याद भी नहीं कि आखिरी बार यहां रोडवेज बस कब देखी थी; 10-15 साल हो गए होंगे।” लगातार बढ़ती महंगाई के बीच गरीब परिवारों के लिए इस तरह का भारी किराया चुका पाना बहुत कठिन हो जाता है।

वहीं ओखलकांडा की एक अन्य ग्रामीण महिला खश्टी देवी ने बताया कि चाहे रक्षाबंधन का त्यौहार हो, बाजार से खरीदारी करनी हो या फिर चिकित्सा सहायता के लिए हल्द्वानी शहर जाना हो, बस की सुविधा न होने से पूरा क्षेत्र परेशान रहता है। उन्होंने स्पष्ट किया, “हमारे इलाके में बस की कोई सुविधा नहीं है।” महिलाओं को निजी टैक्सियों में अत्यधिक भीड़ के बीच यात्रा करनी पड़ती है या फिर पूरी गाड़ी बुकिंग कराकर भारी भरकम रकम चुकानी पड़ती है। त्यौहार के मौके पर पूरा किराया अपनी जेब से देने के कारण सरकारी योजनाओं का वास्तविक लाभ उन तक नहीं पहुंच पाता।

मैदानी और पहाड़ी क्षेत्रों के बीच परिवहन की असमानता

उत्तराखंड सरकार की यह पहल नीतिगत रूप से सराहनीय मानी जा रही है, लेकिन इसने मैदानी और पर्वतीय क्षेत्रों के बीच मौजूद विकास और सुविधाओं के अंतर को उजागर कर दिया है। देहरादून, हरिद्वार और हल्द्वानी जैसे मैदानी शहरों में महिलाएं वातानुकूलित और सामान्य रोडवेज बसों के जरिए मुफ्त और आरामदायक यात्रा का आनंद ले रही हैं। दूसरी ओर, ओखलकांडा जैसे दूरदराज के पहाड़ी इलाकों में रहने वाली महिलाएं त्योहारों के दिन भी डग्गामार और निजी वाहनों में धक्के खाने को विवश हैं। यह स्थिति यह गंभीर सवाल खड़ा करती है कि क्या राज्य के दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले नागरिकों को समान रूप से सार्वजनिक परिवहन की बुनियादी सुविधाएं मिल पा रही हैं या नहीं।

प्रशासनिक अनदेखी और जनप्रतिनिधियों से शिकायतें

सामाजिक कार्यकर्ता भूपाल बरगली ने इलाके की सार्वजनिक समस्याओं और प्रशासनिक उदासीनता पर चिंता व्यक्त की है। उनके अनुसार, ओखलकांडा ब्लॉक हल्द्वानी शहर से लगभग 100 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और इसके अंतर्गत 70 से 75 गांव आते हैं। इस पूरे क्षेत्र में सरकारी रोडवेज बस सेवा बंद हुए कई साल बीत चुके हैं, जिसके कारण पूरी आबादी निजी टैक्सी चालकों पर निर्भर हो चुकी है। जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा, “चुनाव जीतने के बाद हमारे जनप्रतिनिधि खुद गांवों में नहीं रहते, वे शहरों में जाकर बस गए हैं।”

स्थानीय नेतृत्व के शहरों में बस जाने के कारण पहाड़ियों की इन मूलभूत समस्याओं को उठाने वाला कोई नहीं बचा है। भूपाल बरगली ने सरकार द्वारा रक्षाबंधन पर 28 और 29 अगस्त को दो दिवसीय मुफ्त बस सेवा शुरू करने के फैसले का स्वागत तो किया, लेकिन साथ ही यह पुरजोर मांग भी रखी कि ओखलकांडा के सभी 75 गांवों को रोडवेज नेटवर्क से स्थायी रूप से जोड़ा जाना चाहिए ताकि जनता को वास्तविक राहत मिल सके।

नियमित बस सेवा की मांग और भावी उम्मीदें

रक्षाबंधन का पर्व केवल एक परंपरा नहीं बल्कि भाई-बहन के पवित्र रिश्ते और भरोसे का प्रतीक है। पर्वतीय क्षेत्रों की कठिन परिस्थितियों, दुर्गम रास्तों और संसाधनों की कमी के बावजूद बहनें हर साल अपने भाइयों तक पहुंचने का प्रयास करती हैं। सरकार की मुफ्त बस योजना संवेदनशील प्रयास है, किंतु इसका असली उद्देश्य तभी पूरा होगा जब इसे राज्य के हर अंतिम गांव तक पहुंचाया जाए। ओखलकांडा की महिलाओं की राज्य सरकार से एकमात्र स्पष्ट मांग है कि उनके क्षेत्र में नियमित आधार पर सरकारी बसों का संचालन शुरू किया जाए, ताकि जनकल्याणकारी योजनाओं का असर विज्ञापनों और कागजों से निकलकर आम नागरिकों के दैनिक जीवन और यात्रा में दिखाई दे सके।

सवाल-जवाब

रक्षाबंधन पर उत्तराखंड सरकार ने महिलाओं के लिए क्या ऐलान किया है?
उत्तराखंड सरकार ने 28 और 29 अगस्त को प्रदेश की सभी महिलाओं के लिए उत्तराखंड परिवहन निगम की रोडवेज बसों में मुफ्त यात्रा की सुविधा देने की घोषणा की है।
नैनीताल के ओखलकांडा ब्लॉक में मुफ्त बस योजना का लाभ क्यों नहीं मिल रहा है?
ओखलकांडा ब्लॉक के 75 गांवों वाले क्षेत्र में सरकारी रोडवेज बस सेवा पिछले कई सालों से पूरी तरह बंद है, जिसके कारण वहां की महिलाएं मुफ्त योजना का फायदा उठाने से वंचित हैं।
मुख्य सड़क तक पहुंचने के लिए ओखलकांडा की महिलाओं को कितना पैदल चलना पड़ता है?
गांवों से मुख्य पक्की सड़क तक पहुंचने के लिए महिलाओं को लगभग 5 से 6 किलोमीटर तक की चढ़ाई और उतराई पैदल तय करनी पड़ती है।
ओखलकांडा क्षेत्र हल्द्वानी से कितनी दूरी पर स्थित है?
ओखलकांडा ब्लॉक हल्द्वानी शहर से लगभग 100 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
ओखलकांडा के स्थानीय ग्रामीणों की मुख्य मांग क्या है?
स्थानीय ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की मांग है कि ओखलकांडा की सभी 75 ग्राम पंचायतों को नियमित सरकारी रोडवेज बस सेवा से स्थायी रूप से जोड़ा जाए।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 घंटे पहले

यह प्रशासनिक विफलता का गंभीर मामला है जहाँ नीतिगत घोषणा और जमीनी हकीकत के बीच भारी खाई है। ओखलकांडा की 75 ग्राम पंचायतों में दशकों से सार्वजनिक परिवहन का ठप रहना और पर्व पर महिलाओं को निजी वाहनों के मनमाने किराए का सामना करना गंभीर व्यवस्थागत चूक है। यदि जिला प्रशासन पर्व के विशेष अवसरों पर वैकल्पिक परिवहन या शटल सेवा की व्यवस्था नहीं करता है, तो ऐसी कल्याणकारी योजनाएं दूरदराज के नागरिकों के लिए मात्र छलावा बनकर रह जाती हैं।

Rohan Verma@rohan-verma·1 घंटे पहले

करन मल्होत्रा की यह रिपोर्ट पर्वतीय क्षेत्रों में नीति निर्माण और धरातल की व्यवस्था के बीच की गहरी खाई को बेनकाब करती है। नैनीताल के ओखलकांडा जैसी दूरदराज की 75 ग्राम पंचायतों में दशकों से रोडवेज बसों का संचालन न होना और पर्व के समय मुफ्त यात्रा के दावों का खोखला साबित होना सीधे तौर पर प्रशासनिक संवेदनहीनता को दर्शाता है। यदि शासन स्तर से पर्व विशेष पर वैकल्पिक शटल सेवाओं या विशेष बसों का प्रबंध नहीं किया जाता, तो ऐसी लोकलुभावन घोषणाएं दुर्गम इलाकों की महिलाओं के लिए केवल छलावा बनकर रह जाती हैं, जिससे शासन की प्राथमिकता पर सवाल उठना लाजिमी है।

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