धर्मनगरी हरिद्वार में चंडी चौक के पास ऊपरी गंग नहर पर बने 172 साल पुराने ऐतिहासिक ललिता राव पुल (ललतारव पुल) की सुरक्षा को लेकर उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग ने बड़े कदम उठाए हैं। पौने दो सौ साल पुरानी इस ब्रिटिश कालीन वास्तुकला को जर्जर होने से बचाने और किसी भी तरह की अनहोनी को रोकने के लिए विभाग ने पुल के मुहाने पर चेतावनी बोर्ड लगाकर भारी वाहनों की आवाजाही को पूरी तरह बंद कर दिया है। वर्तमान में इस ऐतिहासिक मेहराबदार पुल से केवल हल्की गाड़ियों जैसे कार, ऑटो रिक्शा, मोटरसाइकिल और पैदल यात्रियों को ही सावधानी के साथ गुजरने दिया जा रहा है।
जर्जर स्थिति और यातायात नियंत्रण के कड़े कदम
लगातार कई दशकों तक भारी वाहनों के दबाव और मौसम की मार झेलने के कारण यह प्राचीन ढांचा अपनी उम्र के तकाजे से कमजोर हो चुका है। हरिद्वार शहर में प्रवेश के मुख्य मार्ग पर स्थित होने के कारण इस पुल पर रोजाना हजारों वाहनों का लोड पड़ता था। ऊपरी गंग नहर और उसके तटबंधों की देखरेख का जिम्मा उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग के पास है, जिसने पुल की आंतरिक संरचना में आई कमजोरी को देखते हुए कड़े सुरक्षा उपाय लागू किए हैं।
सिंचाई विभाग ने सुरक्षा व्यवस्था को पुख्ता करते हुए पुल के प्रवेश द्वार पर स्पष्ट चेतावनी साइन बोर्ड लगाए हैं। इसके तहत भारी ट्रकों, बसों और व्यावसायिक मालवाहक वाहनों के प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है। स्थानीय निवासियों और श्रद्धालुओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए छोटे वाहनों, दुपहिया गाड़ियों और पैदल यात्रियों के लिए मार्ग खुला रखा गया है, ताकि यातायात भी बाधित न हो और धरोहर पर भी अत्यधिक भार न पड़े।
ऊपरी गंग नहर का इतिहास और 1854 की निर्माण यात्रा
ललिता राव पुल का इतिहास 19वीं सदी में तैयार की गई ऊपरी गंग नहर महापरियोजना से जुड़ा हुआ है। ब्रिटिश शासनकाल के दौरान वर्ष 1842 में तत्कालीन इंजीनियर सर प्रोबी थॉमस कॉटले ने हरिद्वार से कानपुर देहात तक के विस्तृत कृषि क्षेत्रों में सिंचाई व्यवस्था सुचारू करने के लिए इस नहर का खाका तैयार किया था। करीब 12 वर्षों की कड़ी और अनवरत मेहनत के बाद सन 1854 में यह नहर पूरी तरह बनकर तैयार हुई थी।
नहर के निर्माण के बाद सन 1854 में तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी ने इसका औपचारिक उद्घाटन किया था। इस विशाल नहर परियोजना के तहत नहर के दोनों छोरों और शहर के संपर्क रास्तों को जोड़ने के लिए कई ऐतिहासिक मेहराबदार पुलों का निर्माण कराया गया था। इन्हीं में से एक चंडी चौक से हरिद्वार शहर के भीतर जाने वाला ललिता राव पुल था। इसे चूने, सुर्खी और पक्की लाल ईंटों के बेजोड़ पारंपरिक गारे से बनाया गया था, जिसकी विशेष मेहराबदार बनावट ने इसे 172 वर्षों तक मजबूती से टिकाए रखा।
समानांतर नए पुल का निर्माण और पुराने ढांचे को सुरक्षा कवच
समय के साथ हरिद्वार में वाहनों की संख्या और व्यावसायिक गतिविधियों में कई गुना बढ़ोतरी हुई। इस वजह से 1854 में बने इस एकल पुल पर क्षमता से अधिक भार पड़ने लगा था। प्राचीन धरोहर को कंक्रीट के आधुनिक दौर में टूटने से बचाने के लिए सरकार ने कुछ साल पहले इसके ठीक समानांतर एक नए कंक्रीट पुल का निर्माण कराया था।
नए वैकल्पिक पुल के शुरू होने से शहर में आने वाले भारी वाहनों को एक सुगम और चौड़ा रास्ता मिल गया। इस नए निर्माण ने 172 साल पुरानी ऐतिहासिक धरोहर पर पड़ने वाले भारी यातायात के दबाव को काफी हद तक कम कर दिया। समानांतर पुल ने पुराने ढांचे को एक मजबूत सुरक्षा कवच प्रदान किया, जिससे इसकी उम्र और उपयोगिता दोनों बढ़ सकीं।
मां ललिता देवी मंदिर से जुड़ा नामकरण का रोचक इतिहास
हरिद्वार के आम बोलचाल में भले ही इस पुल को 'ललतारव' कहा जाता हो, लेकिन इसका वास्तविक और पौराणिक नाम 'ललिता राव पुल' है। गुरुकुल कांगड़ी समविश्वविद्यालय हरिद्वार के पुरातत्व संग्रहालय के क्यूरेटर मनोज कुमार के अनुसार, इस पुल के नाम का सीधा संबंध पास ही स्थित एक प्राचीन पावन मंदिर से है।
क्यूरेटर मनोज कुमार बताते हैं कि चंडी चौक की तरफ से इस पुल को पार करके शहर में दाखिल होते ही पोस्ट ऑफिस के बराबर से पहाड़ के किनारे जाने वाले रास्ते पर करीब 200 मीटर आगे बाईं ओर मां ललिता देवी का प्राचीन मंदिर स्थापित है। इसी पावन मंदिर के नाम पर इस ऐतिहासिक पुल का नाम ललिता राव पुल पड़ा था, जिसे समय के साथ स्थानीय भाषा में ललतारव कहा जाने लगा।
पारंपरिक इंजीनियरिंग की मिसाल और भविष्य का संरक्षण
इतिहासकारों और पुरातत्व विशेषज्ञों के मुताबिक चूना और सुर्खी के गारे से बना यह 172 साल पुराना ढांचा ब्रिटिश कालीन वास्तुकला और तकनीकी कौशल का एक हैरतअंगेज नमूना है। आज के आधुनिक आरसीसी पुलों के सामने यह प्राचीन पुल अपनी अनूठी पारंपरिक निर्माण सामग्री की बदौलत आज भी सीना ताने खड़ा है।
हालांकि पुरातत्व विशेषज्ञ मनोज कुमार का कहना है कि लंबे समय तक भारी वजन सहन करने से इसकी आंतरिक बनावट अब कमजोर हो गई है। इसलिए इस धरोहर पर भारी वाहनों का प्रतिबंध लगाया जाना एक बेहद जरूरी और स्वागत योग्य कदम है। उन्होंने अपील की है कि शहरवासियों और हरिद्वार आने वाले पर्यटकों को भी सतर्कता बरतते हुए इस अमूल्य धरोहर के संरक्षण में सहयोग देना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी भारत के इस तकनीकी इतिहास को देख सकें।




















