संगीतकार ओपी नय्यर और हिंदी सिनेमा के दिग्गज कलाकार किशोर कुमार से जुड़ा एक बेहद दिलचस्प वाकया साल 1958 का है। उस दौर में रिलीज हुई संगीतमय फिल्म 'रागिनी' में किशोर कुमार मुख्य अभिनेता की भूमिका निभा रहे थे। अभिनय पर अधिक ध्यान देने के कारण उस समय तक गायकी के क्षेत्र में उनकी पहचान बहुत बड़ी नहीं बनी थी। वे मुख्य रूप से स्वयं अपने लिए या फिर देव आनंद के लिए ही पार्श्वगायन करते थे। इस फिल्म के निर्माण की जिम्मेदारी उनके बड़े भाई और अभिनेता अशोक कुमार संभाल रहे थे, जो फिल्म में एक महत्वपूर्ण किरदार में भी नजर आए थे।
1958 में फिल्म रागिनी के संगीत का माहौल
फिल्म 'रागिनी' के गीतों की तैयारी के समय संगीत जगत के कई बड़े नाम इस परियोजना से जुड़े। ओपी नय्यर ने आशा भोसले और गीता दत्त जैसी सुप्रसिद्ध गायिकाओं के साथ किशोर कुमार को भी कुछ गाने गाने का अवसर प्रदान किया। इसके अलावा भारतीय शास्त्रीय संगीत के महारथी उस्ताद अमीर खान ने भी इस फिल्म के लिए एक विशेष गीत को अपनी आवाज दी थी। उस समय संगीत निर्देशक प्लेबैक गायक के रूप में किशोर कुमार को बहुत ज्यादा गंभीरता से नहीं लेते थे। इसके बावजूद, फिल्म के नायक होने के नाते उनसे कई गीतों में गायकी कराने की योजना बनाई गई थी।
क्लासिकल रचना मन मोरा बावरा और उपजा असमंजस
समस्या तब उत्पन्न हुई जब संगीतकार ओपी नय्यर ने फिल्म के लिए एक जटिल और कठिन शास्त्रीय संगीत पर आधारित रचना तैयार की। इस गीत के बोल थे 'मन मोरा बावरा निस दिन गाए'। ओपी नय्यर ने इस गीत के रियाज के लिए किशोर कुमार को स्टूडियो बुलाया। लगातार अभ्यास और कई रिहर्सल के बाद भी किशोर कुमार उस मुकाम तक नहीं पहुंच पा रहे थे, जिसकी मांग वह कठिन बंदिश कर रही थी। ओपी नय्यर गाने में जिस बारीकी और परफेक्शन की उम्मीद कर रहे थे, वह निकलकर नहीं आ पा रही थी। इस स्थिति ने संगीतकार को एक बड़े धर्मसंकट में डाल दिया। क्योंकि किशोर कुमार फिल्म के मुख्य हीरो थे और उनके सगे भाई अशोक कुमार निर्माता थे, इसलिए ओपी नय्यर सीधे तौर पर उन्हें मना भी नहीं कर पा रहे थे।
मन्ना डे की सलाह और मोहम्मद रफी का प्रवेश
रिहर्सल के लंबे दौर के बाद भी जब बात नहीं बनी, तो रिकॉर्डिंग का काम बीच में ही रुक गया और ओपी नय्यर काफी परेशान रहने लगे। इसी उधेड़बुन के दौरान उनकी मुलाकात गायक मन्ना डे से हुई। जब ओपी नय्यर ने अपनी इस उलझन का जिक्र किया, तो मन्ना डे ने उन्हें तुरंत मोहम्मद रफी से यह गाना गवाने का सुझाव दिया। शुरुआत में ओपी नय्यर को यह डर सता रहा था कि यदि वे किसी दूसरे गायक को लाते हैं, तो किशोर कुमार के साथ उनके संबंध खराब हो सकते हैं। काफी सोच विचार के बाद उन्होंने निर्माता अशोक कुमार से सीधी बात की। अशोक कुमार ने संगीत की मांग को समझते हुए मोहम्मद रफी को बुलाने की सहर्ष सहमति दे दी।
एक ही टेक में रचा गया नया इतिहास
काफी उथल-पुथल और विचार-विमर्श के बाद आखिरकार मोहम्मद रफी को रिकॉर्डिंग स्टूडियो आमंत्रित किया गया। मोहम्मद रफी ने बिना किसी हिचकिचाहट के पर्दे पर किशोर कुमार के लिए पार्श्वगायन की चुनौती को स्वीकार किया। जब रिकॉर्डिंग शुरू हुई, तो मोहम्मद रफी ने अपनी अद्भुत गायकी का परिचय देते हुए पूरे कठिन गीत 'मन मोरा बावरा निस दिन गाए मिलन का' को केवल एक ही टेक में सफलतापूर्वक रिकॉर्ड कर दिया। जब यह गाना तैयार होकर दर्शकों और संगीत प्रेमियों के बीच पहुंचा, तो हर कोई मोहम्मद रफी की सुरीली आवाज और ओपी नय्यर के बेहतरीन संगीत संयोजन की तारीफ करते नहीं थका।


















