चीन ने हाल ही में दक्षिण प्रशांत महासागर में एक बैलिस्टिक मिसाइल का सफल परीक्षण किया है, जिसने वैश्विक सुरक्षा और कूटनीति के गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। इस सैन्य गतिविधि को महज एक सामान्य अभ्यास के रूप में नहीं देखा जा रहा है, क्योंकि यह परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम एक उन्नत मिसाइल सिस्टम का परीक्षण था। इस कदम की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक आलोचना हो रही है, और विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे का सबसे बड़ा रणनीतिक मकसद अमेरिका को अपनी ताकत का प्रदर्शन दिखाना है। यह घटनाक्रम आने वाले समय में दक्षिण प्रशांत क्षेत्र की भू-राजनीतिक स्थिति को काफी हद तक प्रभावित कर सकता है।
समुद्री सीमा में हुआ परीक्षण
चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) ने सोमवार के दिन दक्षिण प्रशांत महासागर के अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र को अपना लक्ष्य बनाया। खबरों के अनुसार, यह बैलिस्टिक मिसाइल एक परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बी (न्यूक्लियर सबमरीन) के जरिए दागी गई थी। चीन ने करीब दो साल पहले भी इसी तरह के अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में परीक्षण किया था, लेकिन इस बार की परिस्थितियां भिन्न हैं। प्रशांत क्षेत्र के छोटे द्वीपीय देश लंबे समय से विश्व की बड़ी शक्तियों से अपील कर रहे हैं कि वे उनके समुद्री इलाके को सैन्य प्रतिस्पर्धा या युद्ध का अखाड़ा न बनाएं।
अमेरिका और वैश्विक संतुलन पर नजर
कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस के वरिष्ठ फेलो और न्यूक्लियर पॉलिसी एक्सपर्ट टोंग झाओ के मुताबिक, इस परीक्षण का मूल संदेश चीन की बढ़ती सैन्य ताकत और उसकी विकसित होती परमाणु क्षमता को रेखांकित करना है। विशेषज्ञों का मानना है कि चीन दुनिया को यह जताना चाहता है कि उसकी परमाणु हमले की क्षमता अब केवल जमीन तक सीमित नहीं है, बल्कि वह जमीन, समुद्र और हवा तीनों मोर्चों पर हमला करने में सक्षम है। इसे सैन्य शब्दावली में 'न्यूक्लियर ट्रायड' कहा जाता है। न्यूक्लियर ट्रायड वह क्षमता है जिसके तहत एक देश के पास जमीन से, पनडुब्बी के जरिए समुद्र से और विमानों के जरिए हवा से परमाणु हमला करने का विकल्प मौजूद होता है।
सेकेंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी का महत्व
ऑस्ट्रेलिया के क्रॉफर्ड स्कूल ऑफ पब्लिक पॉलिसी के शोधकर्ता डोमिनिक मेघर के अनुसार, इस परीक्षण के जरिए चीन ने अपनी 'सेकेंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी' का प्रदर्शन भी किया है। इसका मतलब है कि यदि किसी देश पर पहले परमाणु हमला कर दिया जाए, तब भी उसके पास पलटवार करने की पूरी ताकत सुरक्षित रहे। समुद्र के भीतर छिपी पनडुब्बियों का पता लगाना अत्यंत कठिन होता है, इसलिए यह क्षमता रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।
चीन की दलील और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का आकलन
चीन के आधिकारिक रुख के अनुसार, यह उनकी वार्षिक सैन्य कवायद का एक सामान्य हिस्सा था और भविष्य में भी ऐसी कार्रवाई की जा सकती है। हालांकि, नेशनल ब्यूरो ऑफ एशियन रिसर्च के विशेषज्ञ के. ट्रिस्टन टैंग का कहना है कि इसे एक अकेली घटना मानकर अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि यह चीन की लंबी अवधि वाली सैन्य रणनीति का अभिन्न अंग है। इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ (IISS) की एक रिपोर्ट के अनुसार, चीन पिछले 5 सालों से अमेरिका की तुलना में कहीं अधिक तेजी से न्यूक्लियर सबमरीन के निर्माण पर काम कर रहा है, जिससे उसकी समुद्री सैन्य ताकत लगातार बढ़ रही है।
प्रशांत देशों के पुराने जख्म
दक्षिण प्रशांत क्षेत्र न केवल सामरिक महत्व का है, बल्कि यह खनिज संपदा और मछली उत्पादन के लिए भी जाना जाता है। इस क्षेत्र के द्वीपीय देशों के लिए परमाणु गतिविधियों का अनुभव काफी दर्दनाक रहा है। अतीत में अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस द्वारा किए गए परमाणु परीक्षणों ने वहां के स्थानीय लोगों को पर्यावरण प्रदूषण, कैंसर और जन्मजात विकारों जैसी गंभीर समस्याओं का शिकार बनाया है। स्थानीय आबादी के लिए इन परीक्षणों का असर आज भी पीढ़ियों में देखा जा सकता है, जिससे वहां परमाणु गतिविधियों को लेकर विशेष संवेदनशीलता है।
रारोटोंगा संधि और विवाद
जिस स्थान पर यह मिसाइल गिरी, वह साउथ पैसिफिक न्यूक्लियर फ्री जोन के अंतर्गत आता है। यह क्षेत्र 1986 की रारोटोंगा संधि के तहत परमाणु मुक्त घोषित किया गया था। चीन ने 1987 में इस संधि के प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए थे, जिसमें उसने इस क्षेत्र में परमाणु परीक्षण न करने और संधि में शामिल देशों को परमाणु धमकी न देने का वादा किया था। इसी कारण इस परीक्षण पर कई देशों ने गंभीर सवाल उठाए हैं। सोलोमन द्वीप के प्रधानमंत्री मैथ्यू वेले ने स्पष्ट कहा कि चीन भले ही उनका मित्र देश हो, लेकिन ऐसी गतिविधियां मित्रता के अनुकूल नहीं हैं और इससे प्रशांत क्षेत्र में चिंता का माहौल है।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया और क्षेत्रीय प्रभाव
ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और जापान ने इस परीक्षण के दौरान पर्याप्त सूचना न दिए जाने पर नाराजगी जताई है। ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीज ने इसे 'उकसाने वाली कार्रवाई' करार दिया और कहा कि इतनी कम जानकारी के साथ मिसाइल दागना क्षेत्रीय स्थिरता के लिए हानिकारक है। दूसरी ओर, चीन का रक्षा मंत्रालय दावा कर रहा है कि उन्होंने संबंधित देशों को पहले ही सूचित कर दिया था और वे पूरी पारदर्शिता बरत रहे हैं। हालांकि, हेग कोड ऑफ कंडक्ट जैसे अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के अनुसार बैलिस्टिक मिसाइल परीक्षण से कम से कम 24 घंटे पहले सूचना दी जानी चाहिए, लेकिन यह कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है।
मिसाइल की तकनीकी जानकारी और भविष्य
इस परीक्षण में इस्तेमाल की गई मिसाइल को लेकर अलग-अलग दावे हैं। ताइवान की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद का मानना है कि यह JL-2 पनडुब्बी आधारित बैलिस्टिक मिसाइल थी, जबकि चीन की सरकारी मीडिया का दावा है कि यह अधिक शक्तिशाली JL-3 मिसाइल थी। विशेषज्ञ शाओ योंगलिन के मुताबिक, JL-3 इतनी लंबी दूरी तक मार कर सकती है कि वह पश्चिमी प्रशांत से ही पूर्वी प्रशांत के लक्ष्यों को भेदने में सक्षम है। यह परीक्षण न केवल सैन्य और कूटनीतिक बहस का विषय बन गया है, बल्कि प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा को लेकर भी नई चुनौतियां खड़ी कर रहा है।











