वाशिंगटन डीसी में एक जियोपॉलिटिकल परिचर्चा के दौरान अमेरिकी सीनेटर स्टीव डेन्स ने जो किया, वो किसी लंबे राजनयिक भाषण से कहीं ज़्यादा बोल गया। उन्होंने बस अपना स्मार्टफोन हाथ में उठाया और एशिया के दो सबसे बड़े देशों के बारे में अमेरिका की सोच बेहद आसान शब्दों में सामने रख दी। यह छोटा सा इशारा चीन और भारत के प्रति दुनिया के बदलते नज़रिये का सबसे सरल और सटीक आईना बन गया।
वो फोन जिसने सब कह दिया
सीनेटर डेन्स ने बताया कि जब भी वे चीन जाते हैं, तो यह स्मार्टफोन उनके साथ बीजिंग नहीं जाता। वे इसे वाशिंगटन डीसी में अपनी डेस्क पर ही छोड़ देते हैं।
“जब मैं चीन की यात्रा पर जाता हूं तो यह फोन मेरे साथ बीजिंग नहीं जाता। इसे मैं वाशिंगटन डीसी में अपनी डेस्क पर ही छोड़ देता हूं।”
लेकिन जब बात भारत की आई तो सीनेटर का लहजा और भाव दोनों बदल गए। उन्होंने मुस्कुराते हुए बताया कि नई दिल्ली हो या भारत का कोई भी कोना, यह फोन हमेशा उनकी जेब में होता है।
“इसके ठीक उलट, जब मैं नई दिल्ली या भारत के किसी भी हिस्से की यात्रा पर जाता हूं तो यह फोन हमेशा मेरी जेब में, मेरे साथ होता है। मैं इसे आराम से लेकर घूमता हूं।”
सुनने में यह भले ही एक साधारण बात लगे, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की भाषा में यह बेहद भारी बयान है। इस 'स्मार्टफोन डिप्लोमेसी' ने पलभर में वो बात कह दी जो कोई लंबा-चौड़ा दस्तावेज़ भी शायद न कह पाता।
चीन में फोन ले जाने से क्यों डरते हैं अमेरिकी नेता?
यह सवाल लाज़मी है कि दुनिया के सबसे ताकतवर देश के एक वरिष्ठ सीनेटर को बीजिंग में अपने फोन की इतनी फिक्र क्यों सताती है। इसका जवाब चीन की बदनाम साइबर जासूसी प्रणाली में छिपा है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, चीन में कदम रखते ही वहां की सरकारी एजेंसियां और नेटवर्क विदेशी VIP, मंत्रियों तथा वरिष्ठ अधिकारियों के डिजिटल फुटप्रिंट पर गहरी नज़र रखने लगते हैं। मालवेयर, पेगासस जैसे स्पाइवेयर और सरकारी हैकर्स की मदद से किसी भी फोन में मौजूद संवेदनशील डेटा, ईमेल और गोपनीय कूटनीतिक बातचीत पलभर में हाथ लग सकती है। इसीलिए अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियां अपने नेताओं को हमेशा यही सलाह देती हैं कि चीन दौरे पर 'बर्नर फोन' यानी एक अस्थायी डिवाइस साथ ले जाएं, या फिर अपने असली निजी और सरकारी फोन को वाशिंगटन के किसी सुरक्षित लॉकर में बंद करके जाएं।
भारत बना 'मजबूत और भरोसेमंद दोस्त'
सीनेटर डेन्स ने साफ किया कि भारत में फोन साथ ले जाना और चीन में उसे पीछे छोड़ना महज एक निजी आदत नहीं है। यह इस बात का जीता-जागता उदाहरण है कि भारत अमेरिका का किस कदर भरोसेमंद सहयोगी बन चुका है। उनके मुताबिक, भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहां कानून का शासन है और जो अंतरराष्ट्रीय नियमों का सम्मान करता है।
अमेरिका को पूरा यकीन है कि भारत कभी भी राजनयिक मर्यादाओं को किनारे करके इस तरह की साइबर जासूसी को बढ़ावा नहीं देगा। पिछले कुछ वर्षों में भारत और अमेरिका के संबंध रणनीतिक, सैन्य और तकनीकी हर मोर्चे पर जिस तेज़ी से मज़बूत हुए हैं, सीनेटर डेन्स का यह बयान उसी गहरे भरोसे की पुष्टि करता है।
चीन से नाता तोड़ना भी नहीं है आसान
इसके बावजूद सीनेटर डेन्स ने यह भी स्वीकार किया कि चीन के साथ रिश्ते चाहे जितने जटिल हों, उन्हें पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता।
“मैंने चीन की कई यात्राएं की हैं। यह एक बेहद महत्वपूर्ण रिश्ता है और यह इतना बड़ा है कि इसे पूरी तरह से खत्म नहीं होने दिया जा सकता।”
यह बयान उस उलझन की तस्वीर है जो अमेरिका ने खुद अपने हाथों से बनाई है। 70 और 80 के दशक में अमेरिका ने सोवियत संघ को कमज़ोर करने और सस्ती मज़दूरी का फायदा उठाने के लिए चीन को दुनिया का मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने में पूरी मदद की। अमेरिकी कंपनियों ने मुनाफे के लिए अपनी फैक्ट्रियां चीन में शिफ्ट कर लीं और आज इसका नतीजा यह है कि दुनिया के करीब 30% मैन्युफैक्चरिंग पर अकेले चीन का कब्जा है।
700 अरब डॉलर का कर्ज और दुर्लभ खनिजों पर दबदबा
यह निर्भरता यहीं तक सीमित नहीं है। चीन के पास अमेरिका का 700 अरब डॉलर से भी अधिक का कर्ज है। इसके अलावा, आधुनिक तकनीक, स्मार्टफोन और सैन्य उपकरण बनाने के लिए ज़रूरी रेयर अर्थ एलिमेंट्स के वैश्विक बाज़ार पर 70% से भी अधिक नियंत्रण चीन के पास है। ये वही आर्थिक और रणनीतिक मजबूरियां हैं जिनकी वजह से अमेरिका कूटनीतिक मंचों पर चीन को चुनौती तो देता है, लेकिन उससे पूरी तरह किनारा नहीं कर सकता।
एक तरफ चीन के साथ गहरी आर्थिक उलझन है और दूसरी तरफ उस पर भरोसे की पूरी कमी। इन दोनों के बीच भारत तेज़ी से वो साझेदार बनता जा रहा है जिस पर बिना झिझक यकीन किया जा सके। सीनेटर स्टीव डेन्स का वह स्मार्टफोन वाला इशारा इसी बड़े सच को सबसे आसान शब्दों में बयां कर गया।













