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एस जयशंकर बोले- भारत के तेल न खरीदने से नहीं थमेगी रूस-यूक्रेन जंग, बातचीत ही एकमात्र रास्तादुनिया
4 सित॰ 2026, 11:51 pm (10 दिन पहले)· 2

एस जयशंकर बोले- भारत के तेल न खरीदने से नहीं थमेगी रूस-यूक्रेन जंग, बातचीत ही एकमात्र रास्ता

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने पोलैंड में स्पष्ट किया कि रूस से तेल की खरीद रोकने से युद्ध समाप्त नहीं होगा। उन्होंने कहा कि 1.4 अरब नागरिकों की ऊर्जा जरूरतें पूरी करना देश की प्राथमिकता है और संकट का समाधान केवल कूटनीति तथा बातचीत से ही संभव है।

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने पोलैंड के दौरे के दौरान दो टूक शब्दों में कहा कि भारत के रूस से तेल न खरीदने मात्र से रूस और यूक्रेन के बीच चल रहा संघर्ष नहीं रुकने वाला है। उन्होंने भारत के ऊर्जा आयात का बचाव करते हुए कहा कि देश की 1.41 अरब (1.4 बिलियन) आबादी की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करना सरकार की नैतिक और व्यावहारिक जिम्मेदारी है। मौजूदा वैश्विक हालातों में देश के लिए कच्चे तेल की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करना एक बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य बना हुआ है।

विदेश मंत्री ने विस्तार से समझाते हुए कहा कि रूस और यूक्रेन के बीच का यह संघर्ष अब अपने पांचवें वर्ष में प्रवेश कर चुका है और यह इस बात से खत्म नहीं होगा कि कोई देश तेल, एल्युमिना, उर्वरक (फर्टिलाइजर), धातु या खनिजों की खरीद पर रोक लगाता है या उन्हें खरीदना जारी रखता है। यह युद्ध तभी थमेगा जब कूटनीति को अपनाया जाएगा, आपसी बातचीत होगी और सार्थक समझौते की दिशा में कदम बढ़ाए जाएंगे। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस गंभीर समस्या की असल जड़ को ठीक से पहचानने की आवश्यकता है, क्योंकि मूल मुद्दा एक सशस्त्र संघर्ष है और इसका समाधान व्यापारिक प्रतिबंधों में नहीं बल्कि केवल टेबल पर बैठकर होने वाली चर्चा में छिपा है।

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रूस और यूक्रेन दोनों पक्षों के संपर्क में है भारत

एस जयशंकर ने जानकारी दी कि भारत इस संकट के समाधान के लिए यूक्रेनी पक्ष और रूसी पक्ष दोनों के साथ निरंतर संवाद बनाए हुए है। उन्होंने बताया कि वह स्वयं कुछ समय पहले मॉस्को के दौरे पर गए थे, जबकि प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन कुछ ही दिन पहले बिश्केक में मिले थे, जिसके तुरंत बाद वह कीव भी गए थे। रूसी अधिकारियों के साथ-साथ यूक्रेनी पक्ष के साथ हमारी काफी डिटेल में बातचीत हुई है। भारत लगातार यह आकलन कर रहा है कि क्या ऐसे कोई व्यावहारिक विचार और सुझाव मौजूद हैं जिन्हें आगे चलकर विकसित किया जा सके, ताकि युद्ध की विभीषिका को कम करने या इस अंतहीन लड़ाई को समाप्त करने में कुछ मदद मिल सके।

कूटनीति और बातचीत पर देना होगा जोर

पोलैंड के उप प्रधानमंत्री राडोस्लाव सिकोरस्की के साथ उच्च स्तरीय द्विपक्षीय विचार-विमर्श के बाद अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए विदेश मंत्री ने कहा कि उन्होंने और उप प्रधानमंत्री ने कई प्रमुख वैश्विक और क्षेत्रीय मुद्दों पर गहराई से चर्चा की। इनमें सबसे अहम विषय यूक्रेन का वर्तमान संघर्ष है जो अब अपने पांचवें साल में दाखिल हो चुका है। उन्होंने कहा कि उनका यह दौरा सीधे कीव से होकर यहां तक पहुंचा है और भारत का यह अटूट विश्वास है कि किसी भी ऐसे संघर्ष का अंत युद्ध को और बढ़ावा देकर नहीं बल्कि उसे पूरी तरह से समाप्त करने के मार्ग पर चलकर ही हो सकता है।

उन्होंने आगे रेखांकित किया कि इस प्रकार के युद्धों में अंततः कोई भी पक्ष विजयी नहीं होता। संघर्ष का प्रत्येक नया दिन अपने साथ अधिक मौतें, भारी तबाही, सभी पक्षों के लिए असहनीय नुकसान और संपूर्ण विश्व के लिए भारी आर्थिक व मानवीय कीमत लेकर आता है। इस गहरी चिंता को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी हाल ही में वैश्विक मंचों पर सबके सामने खुलकर जाहिर किया था। यही कारण है कि भारत के सभी प्रयास आपसी बातचीत और कूटनीतिक वार्ताओं को मजबूती देने पर पूरी तरह केंद्रित हैं। हर देश को अपनी क्षमता और सबसे प्रभावी तरीकों का उपयोग करते हुए इस लड़ाई को खत्म कराने की दिशा में अन्य राष्ट्रों के प्रयासों का समर्थन करना चाहिए।

पश्चिम एशिया के हालात और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला

अपनी चर्चा के अन्य प्रमुख पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए एस जयशंकर ने बताया कि बैठक के दौरान खाड़ी क्षेत्र में जारी तनाव, पश्चिमी एशिया के ताजा हालात और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में हो रहे भू-राजनीतिक घटनाक्रमों पर भी विस्तार से विचार-विमर्श किया गया। आज संपूर्ण विश्व समुदाय केवल विभिन्न मोर्चों पर चल रहे युद्धों का ही सामना नहीं कर रहा है, बल्कि खाद्यान्न, ईंधन और उर्वरकों की उपलब्धता को लेकर भी गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है।

उन्होंने आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती को एक अलग लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण अतिरिक्त चिंता का विषय बताया। एक राजनीतिक लोकतंत्र, बाजार आधारित अर्थव्यवस्था और खुली सोसायटी के रूप में भारत और पोलैंड मिलकर कई महत्वपूर्ण वैश्विक बहसों और नीतियों की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र और अन्य बहुपक्षीय मंचों पर साथ मिलकर काम करने की दोनों देशों की लंबी परंपरा इसी आपसी तालमेल का एक सशक्त प्रमाण है। उन्होंने अपनी बात समाप्त करते हुए कहा कि इन सभी आयामों को लेकर आज की उनकी तमाम बैठकें और बातचीत बेहद उत्पादक और सकारात्मक रहीं।

सवाल-जवाब

एस जयशंकर ने पोलैंड में रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर क्या मुख्य बात कही?
उन्होंने कहा कि भारत के तेल न खरीदने से यह युद्ध नहीं रुकेगा और इसका समाधान व्यापार प्रतिबंधों की बजाय केवल कूटनीति तथा बातचीत से ही निकल सकता है।
भारत रूस से तेल क्यों खरीद रहा है?
भारत सरकार की यह जिम्मेदारी है कि वह देश की 1.4 अरब आबादी की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करे, जिसके लिए संकट के समय भी आपूर्ति बनाए रखना जरूरी है।
रूस-यूक्रेन युद्ध वर्तमान में कितने वर्षों से चल रहा है?
विदेश मंत्री के अनुसार यह युद्ध अब अपने पांचवें वर्ष में पहुंच चुका है।
पोलैंड में एस जयशंकर ने किस नेता के साथ उच्च स्तरीय बैठक की?
उन्होंने पोलैंड के उप प्रधानमंत्री राडोस्लाव सिकोरस्की के साथ उच्च स्तरीय द्विपक्षीय विचार-विमर्श किया।
भारत वर्तमान में इस युद्ध को रोकने के लिए क्या प्रयास कर रहा है?
भारत रूसी और यूक्रेनी दोनों पक्षों के लगातार संपर्क में है और लड़ाई को कम करने या खत्म करने वाले व्यावहारिक सुझावों पर विचार कर रहा है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Carlos Mendoza@carlos-mendoza·9 दिन पहले

विदेश मंत्री एस जयशंकर का यह बयान अमेरिकी नीति निर्माताओं के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि वाशिंगटन द्वारा लगाए गए व्यापारिक प्रतिबंध और तेल खरीद पर दबाव ग्लोबल साउथ की ऊर्जा सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं कर सकते। अमेरिका और पश्चिमी देशों को अब यह समझना होगा कि भारत जैसे विशाल लोकतंत्र अपनी 1.4 अरब आबादी के आर्थिक हितों से समझौता किए बिना कूटनीतिक संतुलन साध रहे हैं। आगे चलकर वाशिंगटन को रूस के साथ व्यापारिक रिश्तों और नई दिल्ली के स्वतंत्र रणनीतिक रुख के बीच एक व्यावहारिक सामंजस्य बिठाना होगा।

Sophie Laurent@sophie-laurent·10 दिन पहले

एस जयशंकर की यह टिप्पणी यूरोपीय राजधानियों में रणनीतिक स्वायत्तता की बहस को नया आयाम देती है। यूरोपीय संघ के प्रतिबंधों के दबाव के बीच, भारत का यह रुख स्पष्ट करता है कि वैश्विक दक्षिण की अपनी ऊर्जा प्राथमिकताएं हैं। पोलैंड जैसे पूर्वी यूरोपीय देशों के साथ इस मुद्दे पर खुला संवाद यह संकेत देता है कि यूरोप और एशिया के बीच भू-राजनीतिक दृष्टिकोण में अंतर होने के बावजूद कूटनीतिक संपर्क बनाए रखना वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में अनिवार्य हो गया है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·10 दिन पहले

सोफी लॉरेंट के इस विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, यह समझना आवश्यक है कि भारत का यह रुख न केवल ऊर्जा सुरक्षा तक सीमित है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय कानून, संप्रभुता और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं की स्थिरता से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। विदेश मंत्री ने जिस प्रकार स्पष्ट किया कि युद्ध का अंत व्यापारिक प्रतिबंधों से नहीं बल्कि कूटनीतिक संवाद से होगा, वह वर्तमान भू-राजनीतिक परिदृश्य में कानून-व्यवस्था और वैश्विक सुरक्षा के लिहाज से एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। आने वाले समय में, रूस और यूक्रेन दोनों पक्षों के साथ भारत का यह निरंतर संपर्क यह तय करेगा कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति इस संघर्ष को समाप्त करने में कितनी प्रभावी सिद्ध होती है।

Ayesha Siddiqui@ayesha-siddiqui·10 दिन पहले

एस जयशंकर की यह टिप्पणी भारत की कूटनीतिक स्वायत्तता और व्यावहारिक विदेश नीति को स्पष्ट रूप से दर्शाती है। 1.41 अरब नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के दबाव को दरकिनार करना यह साबित करता है कि नई दिल्ली राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखती है। रूस और यूक्रेन दोनों के साथ संपर्क बनाए रखना और युद्ध का समाधान केवल कूटनीति से होने पर जोर देना, दक्षिण एशिया से बाहर भी भारत के बढ़ते कूटनीतिक प्रभाव का संकेत है।

Omar AL Mansoori@omar-mansoori·10 दिन पहले

जयशंकर का यह रुख उस पश्चिमी दबाव को खारिज करता है जो ऊर्जा बाजारों को भू-राजनीतिक हथियार बनाता है। भारत की यह नीति कि ऊर्जा आयात केवल आर्थिक आवश्यकता है, वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) के उन देशों के लिए एक मिसाल है जो प्रतिबंधों के इस चक्रव्यूह में पिस रहे हैं। ऊर्जा सुरक्षा और तटस्थ कूटनीति का यह संतुलन यह तय करता है कि भविष्य के वैश्विक समझौतों में नई दिल्ली की भूमिका अपरिहार्य होगी।

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