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ईरान संघर्ष की आग से दुनिया भर में शिक्षा पर संकट, करोड़ों बच्चों का भविष्य दांव परदुनिया
17 अग॰ 2026, 9:08 pm (28 दिन पहले)· 2

ईरान संघर्ष की आग से दुनिया भर में शिक्षा पर संकट, करोड़ों बच्चों का भविष्य दांव पर

ईरान में जारी युद्ध और उसके परिणामस्वरूप वैश्विक स्तर पर बढ़ी ईंधन व परिवहन की लागत से गरीब देशों में बच्चों की पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित हो रही है। इस आर्थिक दबाव के चलते लाखों बच्चों के स्कूल छूटने और बाल श्रम के दलदल में फंसने का गंभीर खतरा पैदा हो गया है।

ईरान में चल रहे युद्ध का दायरा अब केवल रणक्षेत्र तक ही सीमित नहीं रहा है, बल्कि इसके दूरगामी परिणाम दुनिया भर के गरीब देशों की शिक्षा व्यवस्था पर भारी पड़ने लगे हैं। आसमान छूते ईंधन के दाम, परिवहन के बढ़ते खर्च, बेकाबू महंगाई और सरकारी खजाने पर बढ़ते दबाव ने मिलकर बच्चों के स्कूली जीवन को संकट में डाल दिया है। इस स्थिति की सबसे बड़ी मार उन परिवारों पर पड़ रही है जो पहले से ही आर्थिक तंगी के साए में जीवन व्यतीत कर रहे हैं और किसी तरह अपनी गुजर-बसर कर रहे हैं।

कंबोडिया और वियतनाम के बच्चों का संघर्ष

कंबोडिया की टोनले साप झील के पास रहने वाली 13 वर्षीय सौ स्रेयनिच इस व्यापक संकट का एक जीवंत उदाहरण हैं। वह बड़ी होकर शिक्षिका बनने का सपना देखती हैं, लेकिन उनकी यह राह आसान नहीं है क्योंकि उनकी शिक्षा में कई साल की देरी हो चुकी है। उन्होंने अपनी उम्र के दसवें साल में पहली बार स्कूल की दहलीज लांघी थी। उनकी मां ने सुरक्षा कारणों से उन्हें शुरू में स्कूल भेजने से परहेज किया था क्योंकि नाव से स्कूल पहुंचने के सफर में हादसे का अंदेशा रहता था। अब महंगे ईंधन ने इस परिवार की मुश्किलें और अधिक बढ़ा दी हैं। मछली पकड़ने के जरिए आजीविका चलाने वाले इस परिवार के लिए अब उन गहरे जल क्षेत्रों तक पहुंचना आर्थिक रूप से असंभव हो गया है जहां मछलियां प्रचुर मात्रा में मिलती हैं। ऐसी भीषण आर्थिक तंगी के दौर में स्रेयनिच को अपनी पढ़ाई बीच में छोड़कर अपने माता-पिता का हाथ बंटाने के लिए काम पर विवश होना पड़ता है।

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इसी तरह वियतनाम में रहने वाली 16 वर्षीय ली और उनकी 13 वर्षीय बहन न्हीं के परिवार को भी महंगे डीजल की मार झेलनी पड़ी। उनके पिता मछली पकड़ने का काम करते थे, लेकिन ईंधन के दाम बढ़ने के कारण नाव स्वामियों के लिए समुद्र में उतरना आर्थिक रूप से घाटे का सौदा बन गया। इसके परिणामस्वरूप परिवार के पास अपने नौ बच्चों के भरण-पोषण और पठन-पाठन के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन नहीं बचे। हालात से मजबूर होकर दोनों बहनों ने अपनी पढ़ाई छोड़ दी और हनोई के एक रेस्तरां में नौकरी करने लगीं। वहां उन्हें अत्यधिक गर्म सतहों, खतरनाक तेज उपकरणों और भारी-भरकम सामान उठाने जैसे गंभीर व्यावसायिक जोखिमों का सामना करना पड़ा। इनमें से 13 वर्षीय न्हीं का काम करना बाल श्रम से जुड़े कानूनों के तहत पूरी तरह अवैध भी था। हालांकि, बाद में Blue Dragon Children's Foundation के सक्रिय हस्तक्षेप की बदौलत ही दोनों बहनें दोबारा विधिवत स्कूल लौट पाने में सफल हो पाईं।

वैश्विक स्तर पर गहराता गरीबी का संकट

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष की एक रिपोर्ट के मुताबिक यदि वर्तमान युद्ध जनित हालात और आर्थिक दबाव इसी प्रकार जारी रहे, तो चालू वर्ष के अंत तक लगभग 2.34 करोड़ अतिरिक्त बच्चे अत्यधिक गरीबी के गर्त में जा सकते हैं। इस गंभीर स्थिति से प्रभावित होने वाले बच्चों में करीब 80 प्रतिशत हिस्सेदारी अकेले अफ्रीका और एशिया महाद्वीप के गरीब देशों में रहने वाले बच्चों की होगी। जब परिवारों की आय घटती है और गरीबी बढ़ती है, तो उसका सबसे पहला और गहरा आघात बच्चों की शिक्षा पर ही पड़ता है।

वर्तमान समय में कम आय वाले परिवारों के समक्ष भोजन, ईंधन, मकान के किराए और बिजली बिल के साथ-साथ अपने बच्चों की स्कूल की पढ़ाई को निरंतर जारी रखना एक बहुत बड़ी चुनौती बन गया है। इस विषय के जानकारों का कहना है कि जैसे-जैसे आर्थिक संकट और अधिक गहराता जाएगा, कई परिवार कुछ ही बच्चों को स्कूल में बनाए रखने और बाकी बच्चों को किसी काम में झोंककर आय का जरिया बनाने जैसे बेहद कठिन और अवांछनीय निर्णय लेने के लिए मजबूर हो सकते हैं।

शिक्षा तंत्र का बढ़ता खर्च और प्रशासनिक दबाव

महंगे ईंधन का प्रतिकूल प्रभाव केवल छात्रों के किसी तरह विद्यालय तक पहुंच पाने तक ही सीमित नहीं है। इसके कारण शिक्षकों और विभिन्न शैक्षणिक सहायता कर्मियों का दूरदराज के इलाकों तक आवागमन करना, स्कूलों तक जरूरी अध्ययन सामग्री पहुंचाना और कक्षाओं के सुचारू संचालन के लिए आवश्यक संसाधनों की खरीद करना भी बहुत महंगा हो गया है। टोनले साप जैसे भौगोलिक दृष्टि से कठिन इलाकों में यह समस्या और भी विकराल रूप ले लेती है क्योंकि वहां अधिकांश साजो-सामान केवल नावों के माध्यम से ही पहुंचाया जा सकता है।

स्थानीय शिक्षा क्षेत्र के कार्यकर्ताओं का कहना है कि इन क्षेत्रों में बिजली तथा अन्य तमाम बुनियादी जनसुविधाओं का खर्च भी कई गुना तक बढ़ चुका है। इसके उलट, सरकारों को ईंधन, खाद्य पदार्थों और विभिन्न प्रकार की सब्सिडी पर अपनी तिजोरी से अत्यधिक धन खर्च करना पड़ रहा है। इस स्थिति के चलते शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे अतिमहत्वपूर्ण सामाजिक क्षेत्रों के लिए सरकारों द्वारा आवंटित किए जाने वाले बजट पर भारी वित्तीय दबाव पड़ सकता है।

लड़कियों की शिक्षा और बाल विवाह का बढ़ता जोखिम

दक्षिण एशिया के क्षेत्रों में इस गंभीर आर्थिक संकट का दुष्प्रभाव विशेष रूप से बालिकाओं के जीवन पर अत्यधिक गंभीर हो सकता है। जानकारों का मानना है कि जब परिवार भारी आर्थिक दबाव से गुजरते हैं, तो कई गरीब परिवार अपनी सीमित आय के चलते बेटों की पढ़ाई को प्राथमिकता देते हैं और बेटियों की शिक्षा को नजरअंदाज कर देते हैं। ऐसे माहौल में लड़कियों के स्कूल से नाम कटवाने और बाल विवाह जैसी कुप्रथा के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी होने का बड़ा खतरा उत्पन्न हो गया है। संयुक्त राष्ट्र बाल कोष के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया भर में बाल विवाह का शिकार होने वाली कुल लड़कियों में से लगभग 45 प्रतिशत हिस्सेदारी केवल दक्षिण एशिया से आती है।

स्कूली मध्याह्न भोजन कार्यक्रम पर मंडराता खतरा

पूरी दुनिया में 46.6 करोड़ से भी अधिक ऐसे बच्चे हैं जिन्हें उनके विद्यालयों में प्रतिदिन कम से कम एक समय का भोजन अवश्य प्राप्त होता है। यह पौष्टिक भोजन बच्चों को स्कूल से जोड़े रखने में बहुत बड़ी भूमिका निभाता है, साथ ही उनके शारीरिक पोषण, बौद्धिक विकास, सीखने की क्षमता और कक्षा में एकाग्रता बनाए रखने में भी अत्यंत मददगार साबित होता है। परंतु वर्तमान युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव के कारण उर्वरकों और परिवहन की लागत में भारी वृद्धि होने से इन महत्वपूर्ण स्कूल भोजन कार्यक्रमों के सुचारू संचालन पर भी गंभीर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।

विशेष तौर पर पश्चिम और मध्य अफ्रीका के वे देश इस संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं जो अपनी खाद्य आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर दूसरे देशों से आयात पर ही निर्भर हैं। उत्तरी नाइजीरिया के स्थानीय स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और सहायता कर्मियों के अनुसार वहां के बच्चों में कुकुपोषण की समस्या एक बार फिर से तेजी से बढ़ती हुई साफ तौर पर दिखाई दे रही है।

सवाल-जवाब

ईरान युद्ध का दुनिया भर के बच्चों की शिक्षा पर क्या असर पड़ रहा है?
युद्ध के कारण महंगे ईंधन, परिवहन लागत और महंगाई बढ़ने से गरीब देशों के परिवारों पर आर्थिक बोझ बढ़ गया है, जिससे बच्चों के स्कूल छूटने का खतरा पैदा हो गया है।
यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार साल के अंत तक कितने बच्चे गरीबी में जा सकते हैं?
यूनिसेफ की रिपोर्ट के मुताबिक यदि युद्ध का असर जारी रहा तो साल के अंत तक 2.34 करोड़ तक अतिरिक्त बच्चे गरीबी में जा सकते हैं।
कंबोडिया की सौ स्रेयनिच की पढ़ाई में देरी क्यों हुई थी?
नाव से स्कूल जाते समय हादसे के डर से उनकी मां ने उन्हें स्कूल भेजने में देरी की थी, और अब आर्थिक तंगी के कारण उन्हें पढ़ाई छोड़कर काम करना पड़ता है।
वियतनाम की बहनों ली और न्हीं को स्कूल क्यों छोड़ना पड़ा था?
पिता के मछली पकड़ने के काम पर महंगे डीजल का असर पड़ने के बाद परिवार के पास पैसे नहीं बचे, जिसके कारण दोनों बहनों को हनोई के एक रेस्तरां में काम करने जाना पड़ा।
किन देशों में लड़कियों की शिक्षा पर सबसे ज्यादा असर पड़ने की आशंका है?
दक्षिण एशिया में आर्थिक संकट के चलते गरीब परिवारों द्वारा बेटों की पढ़ाई को प्राथमिकता दिए जाने से लड़कियों के स्कूल छोड़ने और बाल विवाह का खतरा बढ़ गया है।
दुनिया भर में कितने बच्चों को स्कूल में भोजन प्राप्त होता है?
दुनिया भर में 46.6 करोड़ से अधिक बच्चों को स्कूल में कम से कम एक भोजन प्राप्त होता है, जो उनके पोषण और पढ़ाई में मदद करता है।
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टिप्पणियाँ 5

Sophie Laurent@sophie-laurent·27 दिन पहले

ईरान संघर्ष के कारण वैश्विक ईंधन संकट और परिवहन लागत बढ़ने से एशिया और अफ्रीका के विकासशील देशों में शिक्षा व्यवस्था बुरी तरह चरमरा रही है। इसके प्रत्यक्ष परिणाम स्वरूप लाखों बच्चे अत्यधिक गरीबी में धकेले जा रहे हैं, जिससे बाल श्रम में वृद्धि और स्कूली शिक्षा का व्यापक नुकसान तय माना जा रहा है।

Rohan Verma@rohan-verma·27 दिन पहले

ईरान संघर्ष के कारण वैश्विक स्तर पर बढ़ी ईंधन और परिवहन की लागत ने विकासशील देशों के गरीब परिवारों को बुरी तरह प्रभावित किया है। इस आर्थिक संकट से बच्चों की पढ़ाई छूटने और उनके बाल श्रम में धकेले जाने का गंभीर खतरा पैदा हो गया है, जिससे आने वाले समय में सामाजिक असमानता और गहरी हो सकती है।

Yuki Tanaka@yuki-tanaka·27 दिन पहले

रोहन वर्मा के इस विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, भू-राजनीतिक उथल-पुथल और ऊर्जा बाजार की अस्थिरता अब केवल कूटनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एशियाई देशों की जमीनी अर्थव्यवस्था और बाल विकास को सीधे तौर पर आघात पहुँचा रही है। महंगे ईंधन और परिवहन के कारण उपजी इस नई गरीबी से विशेष रूप से कंबोडिया और वियतनाम जैसे देशों में स्कूली व्यवस्था चरमरा रही है। यदि इस आर्थिक दबाव को तुरंत नहीं रोका गया, तो यह संकट एशिया की पूरी एक पीढ़ी को अनपढ़ और बाल श्रम के दुष्चक्र में धकेल सकता है, जिससे क्षेत्रीय स्थिरता और मानव पूंजी को दीर्घकालिक क्षति पहुँचेगी।

Li Wei@li-wei·27 दिन पहले

ईरान संघर्ष से उपजा यह ऊर्जा संकट केवल कंबोडिया और वियतनाम तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एशियाई अर्थव्यवस्थाओं की आपूर्ति श्रृंखलाओं को बाधित कर रहा है। वैश्विक ईंधन की कीमतें बढ़ने से विकासशील देशों के वित्तीय संसाधनों पर जो दबाव पड़ा है, वह आने वाले महीनों में बाल श्रम और स्कूल छोड़ने की दरों को एशिया और अफ्रीका में और अधिक विस्फोटक बना सकता है। यदि यह स्थिति नियंत्रित नहीं हुई, तो यह दीर्घकालिक मानवीय और आर्थिक संकट का रूप ले लेगी।

Ayesha Siddiqui@ayesha-siddiqui·27 दिन पहले

ईरान संघर्ष के कारण पैदा हुए इस वैश्विक ईंधन संकट का सीधा असर दक्षिण एशिया की कमजोर अर्थव्यवस्थाओं पर भी पड़ रहा है। राजकोषीय घाटा बढ़ने से सरकारों के लिए सामाजिक सुरक्षा और शिक्षा बजट को बचाए रखना असंभव सा होता जा रहा है। यदि नीति निर्माताओं ने तुरंत हस्तक्षेप कर ईंधन सब्सिडी या प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता के उपाय नहीं किए, तो यह आर्थिक दबाव हमारे क्षेत्र में भी बाल श्रम और स्कूल छोड़ने की दर में अभूतपूर्व उछाल लाएगा।

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