दूसरे विश्व युद्ध के दौरान एटमी हमलों की विभीषिका झेल चुका जापान एक बार फिर अपनी रक्षा और परमाणु नीतियों के कारण वैश्विक चर्चा के केंद्र में आ गया है। इस पूरी चर्चा की शुरुआत देश की संसद की बजट समिति की एक बैठक के दौरान हुई, जब प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची से देश में परमाणु हथियारों के प्रवेश को रोकने वाले नियमों को लेकर सीधा सवाल किया गया। इस दौरान प्रधानमंत्री का रुख टालमटोल वाला रहा और उन्होंने परमाणु हथियारों के विरोध को लेकर कोई भी कड़ा या स्पष्ट बयान देने से परहेज किया।
संसद के सत्र के दौरान विपक्षी दलों की तरफ से प्रधानमंत्री के सामने बेहद साफ सवाल रखे गए। विपक्ष जानना चाहता था कि क्या मौजूदा सरकार आने वाले समय में अपने पारंपरिक परमाणु विरोधी रुख पर पूरी तरह कायम रहेगी। इसके अलावा यह भी पूछा गया कि क्या देश में परमाणु हथियारों को अनुमति न देने वाली नीति का हमेशा विरोध किया जाएगा और क्या इस नीति में भविष्य में किसी भी तरह के बदलाव की कोई गुंजाइश या संभावना मौजूद है।
हालांकि इन तीखे सवालों के जवाब में प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची ने केवल इतना कहा कि प्रशासन वर्तमान में भी उन पुराने सिद्धांतों का पूरी तरह से पालन कर रहा है। उन्होंने अपने बयान में यह बिल्कुल साफ नहीं किया कि आने वाले वक्त में इस बेहद संवेदनशील नीतिगत मुद्दे पर किसी प्रकार का फेरबदल किया जाएगा या फिर सरकार अपनी इस स्थिति में कोई बदलाव लाएगी।
गौर करने वाली बात यह है कि जापान ऐतिहासिक रूप से लंबे समय से अपने तीन प्रमुख गैर-परमाणु सिद्धांतों का कड़ाई से पालन करता आया है। इन स्थापित सिद्धांतों के मुताबिक जापान न तो कभी अपने पास परमाणु हथियार रखेगा और न ही इनका खुद उत्पादन करेगा। इसके साथ ही इन नियमों के तहत देश की सीमा के भीतर किसी भी विदेशी या घरेलू परमाणु हथियार को तैनात करने की अनुमति नहीं दी जाती है।
संसद की कार्यवाही के दौरान तोकोमो तमुरा ने सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि परमाणु हथियारों पर टिकी हुई कोई भी सुरक्षा नीति वैश्विक स्तर पर हथियारों की अंधी दौड़ को और अधिक हवा देगी। उन्होंने सदन को याद दिलाया कि जापान पूरी दुनिया में इकलौता ऐसा देश है जिसे इतिहास में हिरोशिमा और नागासाकी पर हुए भीषण परमाणु बम हमलों का दर्द झेलना पड़ा है। ऐसे देश का नैतिक दायित्व बनता है कि वह परमाणु हथियारों के खिलाफ सबसे मजबूत रुख अख्तियार करे। इसके साथ ही उन्होंने देश से संयुक्त राष्ट्र की परमाणु हथियार प्रतिबंध संधि में औपचारिक रूप से शामिल होने की पुरजोर मांग भी रखी।
रक्षा मंत्री के बयानों से गरमाई सियासत
इस पूरे घटनाक्रम के बीच जापान के रक्षा मंत्री शिंनजीरो कोइजूमी के हालिया बयान भी काफी चर्चा का विषय बने हुए हैं। उन्होंने कुछ समय पहले सार्वजनिक रूप से यह बात कही थी कि देश को परमाणु हथियारों से जुड़े इस संवेदनशील मुद्दे पर बिना किसी तरह की रोक-टोक या झिझक के खुलकर खुली चर्चा करनी चाहिए। अपनी इस बात के समर्थन में उन्होंने फ्रांस के परमाणु हथियार कार्यक्रम का उदाहरण देते हुए इस विषय पर राष्ट्रव्यापी बहस छेड़ने की आवश्यकता पर बल दिया।
रक्षा मंत्री के इस तरह के बयानों के बाद से खुद सरकार के भीतर और सत्तारूढ़ राजनीतिक दल के कई वरिष्ठ नेताओं के बीच भी गहरी चिंता देखी जा रही है। मौजूदा समय बेहद संवेदनशील है क्योंकि अगले महीने अगस्त में जापान की दूसरे विश्व युद्ध में हुई हार की बरसी आने वाली है। ऐसे संवेदनशील दौर में देश की दशकों पुरानी परमाणु नीति को लेकर इस तरह की बड़ी बहस उठ खड़ा होना राजनीतिक हलकों में एक बड़ा संकेत माना जा रहा है।
भले ही जापान सरकार की तरफ से अभी तक अपनी आधिकारिक परमाणु नीति में किसी भी तरह के बड़े बदलाव या संशोधन की औपचारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री के इन हालिया बयानों ने कई तरह के गंभीर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं। विश्लेषक यह सोचने पर मजबूर हैं कि क्या आने वाले भविष्य में जापान अपनी इस पारंपरिक नीति को छोड़कर किसी बिल्कुल नई दिशा में विचार करने का मन बना रहा है।




















