अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की निर्बाध आपूर्ति को लेकर उपजे गंभीर तनाव और ऊर्जा संकट के बीच समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा एक बड़ा सवाल बन चुकी है। होर्मुज जलडमरूमध्य और लाल सागर जैसे रणनीतिक गलियारों में व्यापारिक जहाजों की आवाजाही पर मंडराते जोखिम ने दुनिया भर में पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर दबाव बढ़ा दिया है। इस भू-राजनीतिक उथल-पुथल का सीधा असर वैश्विक आर्थिक गतिविधियों पर पड़ रहा है। ऐसे दौर में समुद्री आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित रखने और होर्मुज पर निर्भरता घटाने के इरादे से अमेरिका ने अफ्रीकी महाद्वीप के एक खास तटीय देश की ओर रुख किया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस कूटनीतिक बदलाव के तहत इरिट्रिया के साथ रणनीतिक रिश्ते सुधारने की प्रक्रिया तेज कर दी है।
प्रतिबंधों के दौर से रणनीतिक साझेदारी तक का सफर
अतीत में अमेरिका ने इरिट्रिया पर मानवाधिकार उल्लंघनों का हवाला देते हुए कई कड़े आर्थिक और कूटनीतिक प्रतिबंध थोप रखे थे। वर्षों तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग रहे इस छोटे से देश को अब वाशिंगटन एक महत्वपूर्ण साझीदार के रूप में देख रहा है। ऊर्जा सुरक्षा की तात्कालिक प्राथमिकताओं के आगे पुरानी असहमतियों को पीछे छोड़ते हुए ट्रंप प्रशासन ने इरिट्रिया के साथ नए सिरे से कूटनीतिक रिश्ते शुरू किए हैं और उस पर लगी सभी पाबंदियों को हटाने का निर्णय लिया है।
वाशिंगटन की इस पहल का प्राथमिक आधार इरिट्रिया की विशिष्ट भौगोलिक स्थिति है। इथियोपिया के टिग्रे संघर्ष में इरिट्रिया की भूमिका और वहां दर्ज मानवाधिकार हनन के मामलों को लेकर अमेरिका ने 2021 में सख्त पाबंदियां लागू की थीं। हालांकि कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति को सुरक्षित रखने की जरूरत सामने आने पर मानवाधिकार के मुद्दों को किनारे रखकर व्यावहारिक कूटनीति अपनाई गई है।
हॉर्न ऑफ अफ्रीका का रणनीतिक महत्व और बाब अल-मंडेब
पूर्वी अफ्रीका के हॉर्न ऑफ अफ्रीका क्षेत्र में स्थित इरिट्रिया भौगोलिक दृष्टि से वैश्विक समुद्री व्यापार के मुहाने पर बसा है। लाल सागर अफ्रीका महाद्वीप और अरब प्रायद्वीप के बीच पानी की एक बेहद संकरी पट्टी के रूप में फैला हुआ है। इसके दक्षिणी सिरे पर बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य मौजूद है, जिसे लाल सागर का दक्षिणी प्रवेश द्वार भी कहा जाता है। यूरोप, पश्चिम एशिया और शेष एशिया के बीच संपर्क साधने वाले जहाजों और सऊदी अरब की राजधानी रियाद से निकलने वाले तेल टैंकरों के लिए यह जलमार्ग जीवनरेखा के समान है।
बाब अल-मंडेब के संकरे जलमार्ग की भौगोलिक स्थिति सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील है। इस समुद्री रास्ते के एक छोर पर यमन की सीमा लगती है, जहां से हूती लड़ाके नियमित रूप से मालवाहक पोतों और तेल टैंकरों को निशाना बनाते रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ अफ्रीकी तट पर इरिट्रिया का भूभाग मौजूद है। अमेरिका का नया सुरक्षा खाका यह है कि जहाजों के यातायात को यमन के किनारे से हटाकर इरिट्रिया के तटीय जलक्षेत्र के करीब मोड़ दिया जाए, जिससे हूती हमलों की आशंका को सीमित किया जा सके।
यह रणनीति किसी खतरनाक संकरे रास्ते पर जोखिम भरे किनारे को छोड़कर सुरक्षित फुटपाथ पर चलने जैसी है। इस व्यवस्था के अंतर्गत इरिट्रिया अपने तटीय क्षेत्र से समुद्री गतिविधियों पर चौबीसों घंटे निगरानी रख सकता है और किसी भी संभावित खतरे की स्थिति में व्यापारिक जहाजों को समय रहते सतर्क कर सकता है।
ऊर्जा ढांचे की बहाली और 5 अरब डॉलर का विशेष कोष
जलमार्गों की सुरक्षा के साथ-साथ अमेरिका संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में ऊर्जा तंत्र को नए सिरे से खड़ा करने की दिशा में भी कदम उठा रहा है। ट्रंप प्रशासन करीब 5 अरब डॉलर यानी लगभग 41 हजार करोड़ रुपये का एक विशेष फंड स्थापित करने की तैयारी में जुटा है। इस पूंजी का मुख्य उद्देश्य युद्ध और संघर्ष के कारण क्षतिग्रस्त हुए बुनियादी ऊर्जा ढांचे का पुनर्निर्माण करना है।
इस वित्तीय योजना के तहत सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात यानी UAE जैसे सहयोगी देशों को उनकी तेल पाइपलाइनों तथा तेल रिफाइनरियों की मरम्मत व क्षमता विस्तार के लिए संसाधन उपलब्ध कराए जाएंगे। अमेरिका की दीर्घकालिक योजना स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर अपनी अत्यधिक निर्भरता को खत्म करने की है। यदि कोई एक संकरा समुद्री मार्ग संघर्ष या नाकेबंदी के कारण अवरुद्ध हो जाए, तो वैकल्पिक गलियारों के जरिए तेल का प्रवाह जारी रहे और दुनिया किसी बड़े तेल संकट की चपेट में न आए।
यमन से निकटता और इरिट्रिया की अंदरूनी चुनौतियां
रणनीतिक दस्तावेजों में यह योजना जितनी प्रभावी नजर आती है, वास्तविक धरातल पर इसे लागू करने में कई जटिल चुनौतियां मौजूद हैं। समुद्र के सबसे संकरे बिंदु पर यमन और इरिट्रिया के बीच की दूरी 30 किलोमीटर से भी कम है। दोनों तटों के बीच इतना कम फासला होने के कारण यमन की तरफ से दागी जाने वाली मिसाइलों या ड्रोनों का खतरा पूरी तरह समाप्त नहीं होता, बल्कि केवल कुछ हद तक घटता है।
इसके अलावा इरिट्रिया की आंतरिक राजनीतिक संरचना और उसका ऐतिहासिक परिदृश्य भी इस योजना के क्रियान्वयन में पेचीदगियां पैदा करता है। इथियोपिया के साथ 30 साल तक चले लंबे स्वतंत्रता संग्राम के पश्चात 1993 में इरिट्रिया एक स्वतंत्र संप्रभु राष्ट्र के रूप में अस्तित्व में आया था। आजादी के बाद से ही देश की सत्ता इसायस अफवर्की के हाथों में है, जिन्हें दुनिया के सबसे सख्त और निरंकुश शासकों में गिना जाता है।
इथियोपिया के साथ ऐतिहासिक टकराव और सीमा विवाद
पड़ोसी देश इथियोपिया के साथ इरिट्रिया के द्विपक्षीय संबंध दशकों से भारी तनाव और अविश्वास के साए में रहे हैं। 1998 में दोनों देशों के बीच सीमा विवाद को लेकर भीषण सैन्य टकराव हुआ था, जिसने पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर दिया था। इसके बाद 2018 में इथियोपिया के प्रधानमंत्री अबी अहमद ने इरिट्रिया के साथ एक ऐतिहासिक शांति समझौता किया, जिसके लिए उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
शांति समझौते के बाद बने नए समीकरणों के तहत दोनों देशों ने मिलकर 2020 से 2022 के दौरान टिग्रे क्षेत्र में सैन्य अभियान चलाया, जिसमें भारी जान-माल का नुकसान हुआ और हजारों लोगों की जानें गईं। इस तरह के संवेदनशील ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और क्षेत्रीय तनावों के बीच लाल सागर में इरिट्रिया को एक भरोसेमंद सुरक्षा साझेदार बनाना अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की एक जटिल परीक्षा साबित हो सकता है।



















