संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की एक बैठक के दौरान एक हैरान करने वाला घटनाक्रम सामने आया, जब अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल ने फ्रांस के भाषण के समय बैठक कक्ष से बाहर कदम निकाल लिए। यह नाटकीय वॉकआउट यूक्रेन के मुद्दों पर चर्चा के लिए बुलाई गई बैठक में हुआ, जिसकी पृष्ठभूमि में वाशिंगटन और पेरिस के बीच मानवाधिकारों के रिकॉर्ड को लेकर गहराता विवाद था। अमेरिकी अधिकारियों ने अपने यूरोपीय सहयोगी देश पर दिखावटी और पाखंडी बयानबाजी करने का आरोप लगाया, जिसके बाद यह अप्रत्याशित कदम उठाया गया।
टकराव की शुरुआत और संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख का कार्यकाल
इस पूरे तनाव की एक मुख्य वजह संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख वोल्कर टर्क के अगले चार साल के कार्यकाल को लेकर हुआ मतदान था। अमेरिकी विरोध के बावजूद इस पुनर्नियुक्ति को भारी समर्थन मिला, जिसमें फ्रांस ने भी इसके पक्ष में वोट किया था। इसके तुरंत बाद फ्रांस के जिनेवा स्थित संयुक्त राष्ट्र मिशन ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट के जरिए अमेरिका की आलोचना की और कहा कि अमेरिका अब मानवाधिकारों का प्रकाश स्तंभ नहीं रहा, बल्कि उत्तर कोरिया, निकारागुआ, माली और रूस के साथ अलग-थलग खड़ा है और दुनिया अब उसकी नहीं सुनती है।
अमेरिकी प्रतिनिधियों का कड़ा पलटवार
फ्रांसिसी मिशन की उस टिप्पणी पर अमेरिकी पक्ष की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया दी गई। संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी राजदूत माइक वाल्ट्ज ने एक्स पर लिखा कि फ्रांस दुनिया के सबसे बुरे मानवाधिकार हननकर्ताओं को बचाता है और ऐसे लोगों का समर्थन करता है जो अमेरिका, ब्रिटेन और इजराइल जैसे स्वतंत्र लोकतंत्रों को लगातार उपदेश देते हैं। इसके साथ ही सोमवार की बैठक के दौरान उप अमेरिकी राजदूत डैन नेग्रिया ने फ्रांस पर पूरी तरह बनावटी नैतिक रोष दिखाने का आरोप लगाया और दो टूक कहा कि अमेरिका ने हमेशा अपनी स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाले फ्रांस का साथ दिया है और आपसी सम्मान के तहत उसकी बयानबाजी को सहन किया है, लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। उन्होंने आगे कहा कि जब तक फ्रांस अपनी अपमानजनक भाषा और रवैये में सुधार नहीं लाता, तब तक अमेरिका उसकी राजनीतिक बयानबाजी को नहीं सुनेगा।
व्यापक भू-राजनीतिक और कूटनीतिक तनाव
यह हालिया टकराव केवल एक बयान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनके फ्रांसीसी समकक्ष इमैनुएल मैक्रोन के बीच रिश्तों में आई खटास और व्यापक अमेरिकी-यूरोपीय तनाव भी काम कर रहे हैं। नाटो को लेकर ट्रंप की प्रतिबद्धता पर उठते सवाल, यूरोपीय देशों में अमेरिकी सैनिकों की तैनाती में बदलाव की चर्चाएं और ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप की इच्छा जैसे मुद्दे इन देशों के बीच मतभेद पैदा कर रहे हैं। इसके अलावा ईरान युद्ध के दौरान यूरोपीय देशों द्वारा अमेरिकी मदद न किए जाने से भी ट्रंप नाराज रहे हैं, जबकि मैक्रोन ने यूरोप की सैन्य ताकत और परमाणु सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में कमान संभाली है।
फ्रांसिसी प्रतिक्रिया और संस्थागत संतुलन
इस वॉकआउट और तीखी बयानबाजी के बाद, संयुक्त राष्ट्र में फ्रांस के राजदूत जेरोम बोनाफॉन्ट ने बैठक के अंत में अपनी बारी आने पर वॉकआउट का कोई जिक्र नहीं किया। इसके बजाय उन्होंने उस ऐतिहासिक तथ्य को याद दिलाया कि फ्रांस ने अमेरिका को स्वतंत्रता दिलाने में मदद की थी और हाल ही में अमेरिका की 250वीं वर्षगांठ के जश्न में भी हिस्सा लिया था। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि संयुक्त राष्ट्र की स्थापना का मुख्य उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय शांति, सुरक्षा, मानवाधिकार और विकास के लिए काम करना था, और फ्रांस इसी भावना के साथ इस वैश्विक संस्था के चार्टर को संरक्षित करने के लिए काम करता रहेगा।



















