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उत्तर कोरियाई तानाशाह किम जोंग उन क्यों नहीं देंगे डोनाल्ड ट्रंप की कूटनीति को भावदुनिया
18 अग॰ 2026, 7:24 pm (2 घंटे पहले)· 1

उत्तर कोरियाई तानाशाह किम जोंग उन क्यों नहीं देंगे डोनाल्ड ट्रंप की कूटनीति को भाव

डोनाल्ड ट्रंप के तमाम कूटनीतिक प्रयासों और दांव-पेंच के बावजूद उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग उन इस बार उनकी बातों में आने वाले नहीं हैं। पिछले कुछ वर्षों में बदले भू-राजनीतिक समीकरण और सैन्य सुदृढ़ीकरण ने किम को पूरी तरह से आत्मनिर्भर बना दिया है।

अमेरिकी राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर से भव्य कूटनीति और खुद को एक कुशल समझौते का मसीहा साबित करने की कोशिशें तेज हो चुकी हैं। इस बार इन تمام रणनीतिक चालों का केंद्र उत्तर कोरियाई नेतृत्व को लुभाना है। अमेरिकी प्रशासन की इन कोशिशों ने दक्षिण कोरिया जैसे करीबी सहयोगी को एक अजीब स्थिति में ला खड़ा किया है, जिसे लेकर भू-राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इससे क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन प्रभावित हो सकता है। हालांकि, उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग उन इतने सरल नहीं हैं कि वे अमेरिकी राष्ट्रपति के इन दिखावे वाले प्रस्तावों के झांसे में आ जाएं। ऐसे पांच मुख्य आधार हैं जो अमेरिका के इस पूरे diplomatic एजेंडे को विफल करने के लिए पर्याप्त हैं।

परमाणु और मिसाइल शक्ति का अभूतपूर्व विस्तार

वर्ष 2019 में जब हनोई शिखर सम्मेलन बिना किसी ठोस नतीजे के समाप्त हुआ था, उस समय उत्तर कोरिया अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के दबाव से जूझ रहा था। लेकिन पिछले पांच से छह वर्षों के दौरान प्योंगयांग ने बातचीत के पारंपरिक रास्तों को दरकिनार कर पूरी तरह से अपनी सैन्य मारक क्षमता बढ़ाने पर फोकस किया। आज उत्तर कोरिया के शस्त्रागार में ऐसी अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलें और उन्नत परमाणु हथियार मौजूद हैं जो सीधे मुख्य अमेरिकी भूभाग को निशाना बना सकते हैं। जब किम के पास एक मजबूत और अचूक निवारक शक्ति पहले से ही तैयार है, तो वे किसी भी अमेरिकी समझौते के आगे झुकने का जोखिम क्यों उठाएंगे?

रूस के साथ गठजोड़ से मिला युद्ध का व्यावहारिक अनुभव

किम जोंग उन की स्थिति मजबूत होने के पीछे सबसे बड़ा उत्प्रेरक रूस और यूक्रेन के बीच जारी सैन्य संघर्ष रहा है। उत्तर कोरिया ने न केवल मास्को को भारी मात्रा में गोला-बारूद और मिसाइलें उपलब्ध कराईं, बल्कि अपने हजारों सैनिकों को भी युद्ध के मैदान में उतारा। इस कदम से प्योंगयांग को दो बड़े सामरिक लाभ मिले। पहला यह कि उसकी सेना को आधुनिक युद्ध लड़ने का प्रत्यक्ष अनुभव हासिल हुआ, जो दशकों से उसके पास नहीं था। दूसरा, इसके प्रतिफल के रूप में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने उत्तर कोरिया को उन्नत सैन्य तकनीक, उपग्रह संचालन प्रणाली और आधुनिक मिसाइल प्रणालियों से लैस किया है। इस नए रणनीतिक गठबंधन ने किम को किसी भी बाहरी दबाव से पूरी तरह बेपरवाह बना दिया है।

बीजिंग के साथ संबंधों में आई मजबूती

एक समय ऐसा था जब उत्तर कोरिया के लगातार मिसाइल परीक्षणों के कारण उसका सबसे बड़ा सहयोगी चीन भी नाराज हो गया था और दोनों देशों के रिश्तों में दूरियां आ गई थीं। हालांकि, मौजूदा वैश्विक परिदृश्य में चीन और उत्तर कोरिया के आपसी संबंध फिर से अत्यंत मजबूत और सहज हो चुके हैं। बीजिंग भली-भांति समझता है कि वैश्विक मंच पर अमेरिका और उसके सहयोगियों को उलझाने के लिए उत्तर कोरिया उसका सबसे अहम रणनीतिक साझीदार है। जब किम के पीछे चीन जैसी वैश्विक महाशक्ति का खुला समर्थन हो और रूस जैसा शक्तिशाली देश साथ खड़ा हो, तो अमेरिकी नेतृत्व के किसी भी लालच या धमकी का कोई असर नहीं होना स्वाभाविक है।

कड़े आर्थिक प्रतिबंधों के बावजूद पटरी पर लौटती अर्थव्यवस्था

संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका ने उत्तर कोरिया की आर्थिक रीढ़ तोड़ने के लिए दुनिया के सबसे कठोर वित्तीय प्रतिबंध लगा रखे हैं। वर्ष 2019 में किम का कूटनीति की ओर झुकाव मुख्य रूप से इन्हीं पाबंदियों से राहत पाने की जिद पर आधारित था। हालांकि, अब हालात बदल चुके हैं। तमाम प्रतिबंधों के बावजूद उत्तर कोरियाई अर्थव्यवस्था में धीरे-धीरे स्थिरता और सुधार देखा जा रहा है। रूस के साथ हुए रक्षा समझौतों, बीजिंग से मिलने वाली गोपनीय सहायता और साइबर गतिविधियों के माध्यम से होने वाली आय ने प्योंगयांग के वित्तीय संकट को काफी हद तक कम कर दिया है। जब देश की अर्थव्यवस्था अमेरिकी मेहरबानी के बिना ही चल रही है, तो किम के पास किसी भी अमेरिकी समझौते के लिए लालायित होने की कोई वजह नहीं बचती।

खोखले वादों और भ्रामक कूटनीति का कड़वा अनुभव

किम जोंग उन अपने पिछले राजनीतिक अनुभवों से यह अच्छी तरह समझ चुके हैं कि अमेरिकी नेतृत्व की कूटनीति अक्सर केवल सुर्खियों में बने रहने और दिखावे तक ही सीमित होती है। अमेरिकी राजनीति का यह पुराना तरीका रहा है कि वह बड़े-बड़े दावे करता है, जैसे हाल ही में संयुक्त सैन्य अभ्यासों को सीमित करने या रोकने की घोषणा करना, लेकिन धरातल पर कूटनीतिक नीतियां पूर्ववत बनी रहती हैं। किम ने यह करीब से देखा है कि किस तरह वाशिंगटन अपने ही बयानों से मुकर जाता है या उसके सुरक्षा संस्थान अपनी सैन्य गतिविधियां जारी रखते हैं। इस खोखलेपन को उत्तर कोरियाई नेतृत्व बहुत गहराई से भांप चुका है, इसलिए वह किसी भी दिखावटी वार्ता प्रक्रिया में अपना वक्त गंवाने के पक्ष में बिल्कुल नहीं है।

उत्तर कोरियाई मॉडल से दुनिया को मिला कड़ा संदेश

उत्तर कोरिया के इस पूरे घटनाक्रम और उसके नेतृत्व के मजबूत होने के पीछे एक गहरा भू-राजनीतिक सबक निहित है जिसे वैश्विक स्तर पर कई देश अब शिद्दत से महसूस कर रहे हैं। उत्तर कोरिया ने वर्ष 2003 में परमाणु अप्रसार संधि से खुद को अलग कर लिया था और युद्धस्तर पर अपने परमाणु हथियारों का विकास किया था। आज इसका परिणाम यह है कि अमेरिका जैसा महाशक्तिशाली देश भी उत्तर कोरिया पर प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई तो दूर, दबाव बनाने से भी बचता नजर आता है। इसके विपरीत, उन देशों की स्थिति का आकलन किया जा सकता जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय समझौतों पर भरोसा किया और अपने रणनीतिक कार्यक्रमों को सीमित रखा।

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सवाल-जवाब

किम जोंग उन इस बार डोनाल्ड ट्रंप के प्रस्तावों को क्यों नजरअंदाज कर रहे हैं?
पिछले कुछ वर्षों में उत्तर कोरिया की सैन्य शक्ति, रूस के साथ मजबूत गठबंधन और चीन के समर्थन ने किम जोंग उन को पूरी तरह से आत्मनिर्भर बना दिया है।
रूस-यूक्रेन युद्ध से उत्तर कोरिया को क्या फायदा हुआ है?
उत्तर कोरिया को आधुनिक युद्ध लड़ने का प्रत्यक्ष अनुभव मिला है और बदले में रूस से उन्नत सैन्य तकनीक तथा मिसाइल टेक्नोलॉजी प्राप्त हुई है।
2019 के हनोई सम्मेलन के बाद उत्तर कोरिया की आर्थिक स्थिति में क्या बदलाव आया है?
कड़े अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बावजूद रूस के साथ समझौतों और अन्य माध्यमों से उत्तर कोरियाई अर्थव्यवस्था में सुधार देखा गया है।
उत्तर कोरिया ने परमाणु अप्रसार संधि (NPT) से कब खुद को अलग किया था?
उत्तर कोरिया ने 2003 में परमाणु अप्रसार संधि (NPT) से खुद को अलग कर लिया था और तेजी से अपने परमाणु हथियार विकसित किए।
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टिप्पणियाँ 4

Yuki Tanaka@yuki-tanaka·5 मिनट पहले

यह विश्लेषण सही है कि प्योंगयांग अब अमेरिका के किसी भी लुभावने प्रस्ताव के झांसे में नहीं आएगा। हनोई शिखर सम्मेलन के बाद के वर्षों में उत्तर कोरिया ने जिस तरह रूस के साथ सैन्य गठजोड़ को गहरा किया है और बीजिंग के साथ रिश्तों को मजबूत बनाया है, उससे उसका रणनीतिक पलड़ा बहुत भारी हो चुका है। मॉस्को से मिली आधुनिक तकनीक और यूक्रेनी मोर्चे पर मिले युद्ध के व्यावहारिक अनुभव ने किम जोंग उन को पूरी तरह से आत्मनिर्भर और आश्वस्त कर दिया है। आने वाले समय में अमेरिकी कूटनीति के ये सारे प्रयास क्षेत्र में केवल तनाव बढ़ाने का ही काम करेंगे।

Rohan Verma@rohan-verma·5 मिनट पहले

यह स्पष्ट है कि उत्तर कोरिया के सैन्य सुदृढ़ीकरण और मास्को-बीजिंग धुरी के साथ उसके नए सामरिक समीकरणों ने वाशिंगटन के हर कूटनीतिक दबाव को बेअसर कर दिया है। हनोई शिखर सम्मेलन के बाद से प्योंगयांग ने जिस तरह अपनी मारक क्षमता बढ़ाई है, उससे यह साफ है कि आने वाले दिनों में अमेरिका की कोई भी कूटनीतिक चाल कोरियाई प्रायद्वीप में सुरक्षा संतुलन को और अधिक जटिल बनाएगी, जिससे क्षेत्रीय स्थिरता पर गंभीर संकट मंडराता रहेगा।

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 घंटे पहले

यह भू-राजनीतिक विश्लेषण स्पष्ट करता है कि प्योंगयांग की बढ़ती सैन्य क्षमता और मास्को-बीजिंग धुरी से उसका कूटनीतिक पलड़ा कितना भारी हो चुका है। आपराधिक और सामरिक साक्ष्यों के मद्देनज़र, यदि अमेरिका इस क्षेत्र में अपनी रणनीति नहीं बदलता है, तो कोरियाई प्रायद्वीप में हथियारों की अवैध तस्करी, प्रॉक्सी वॉर नेटवर्क और संगठিত वैश्विक अपराधों के नए और खतरनाक रास्ते खुल सकते हैं, जो क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा साबित होंगे।

Arjun Mehta@arjun-mehta·1 घंटे पहले

यह स्पष्ट है कि रूस-यूक्रेन संघर्ष के बीच उत्तर कोरियाई सैनिकों की सीधी भागीदारी ने वैश्विक सुरक्षा समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया है। मास्को और बीजिंग के साथ प्योंगयांग का यह नया सुरक्षा घेरा केवल अमेरिकी कूटनीति को ही निष्प्रभावी नहीं करता, बल्कि दक्षिण कोरिया और जापान जैसे देशों को अपनी रक्षा नीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए भी मजबूर कर रहा है। यदि वाशिंगटन इस बदलते भू-राजनीतिक यथार्थ को नहीं समझता, तो पूर्वी एशिया में परमाणु अप्रसार के तमाम वैश्विक प्रयास और क्षेत्रीय स्थिरता पूरी तरह ध्वस्त हो सकती है।

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