प्रमुख तकनीकी कंपनियों द्वारा शक्तिशाली मॉडल के विकास की गति को धीमा करने अथवा कुछ समय के लिए रोकने की चर्चा ने अमेरिकी नियामकों के कान खड़े कर दिए हैं। जब प्रतिस्पर्धी फर्में एक साथ बैठकर विकास की गति कम करने की योजना बनाती हैं, तो व्यापारिक नियमों के तहत इसे उत्पादन घटाने का अनुचित समझौता माना जा सकता है। शेरमैन अधिनियम जैसी सख्त प्रतिस्पर्धा रोधी संहिताओं का बुनियादी मकसद यह तय करना है कि बाजार में मुक्त मुकाबला बना रहे, किसी भी स्तर पर कृत्रिम रुकावट न आए और ग्राहकों को बेहतर विकल्प मिलते रहें। ऐसी स्थिति में जानलेवा तकनीकी जोखिमों को टालने का नेक इरादा भी कंपनियों के गले की फांस बनता दिख रहा है, क्योंकि शब्दों का गलत चयन गंभीर कानूनी जांच को न्योता दे सकता है।
कॉरपोरेट भाषा और एंटीट्रस्ट कानूनों की बारीक सीमाएं
व्यापार जगत की प्रतिस्पर्धा अदालतों में किसी कंपनी के फैसले जितने अहम होते हैं, उतनी ही अहमियत इस बात की होती है कि कर्मचारियों ने उन फैसलों को किस शब्दावली में दर्ज किया है। गूगल अपने कर्मचारियों को लंबे समय से यह बाकायदा सिखाता रहा है कि आंतरिक ईमेल या चर्चाओं में ऐसी भाषा कतई न लिखी जाए जिससे गैर-प्रतिस्पर्धी साठगांठ का अंदेशा हो, बल्कि हमेशा इस बात पर जोर दिया जाए कि उठाए जा रहे कदम से ग्राहकों को क्या फायदा पहुंचेगा। जब अग्रणी एआई प्रयोगशालाएं खुले तौर पर 'धीमा करने' अथवा 'अस्थायी ठहराव' जैसे जुमलों का इस्तेमाल करती हैं, तो सुरक्षा शोधकर्ताओं की नजर में भले ही यह समझदारी लगे, मगर सरकारी जांचकर्ताओं को यह सीधे तौर पर व्यापार सीमित करने की साजिश दिखाई देती है। बिना किसी पूर्व सरकारी मंजूरी के सामूहिक रूप से काम रोकने का कोई भी साझा फैसला सीधे-सीधे जांच एजेंसियों को हस्तक्षेप की जमीन मुहैया करा देता है।
गैर-लाभकारी संस्था पब्लिक नॉलेज के विधिक सलाहकार जॉन बर्गमेयर का मानना है कि कंपनियों ने अपनी ही भाषा से खुद को एक तंग कोने में धकेल दिया है। उनके अनुसार प्रतिस्पर्धा कानून में अर्थशास्त्री हमेशा यह जांचते हैं कि क्या संबंधित फर्मों ने बाजार में उत्पाद की आपूर्ति या उत्पादन जानबूझकर कम करने का प्रयास किया है। कंपनियों को काम रोकने अथवा सुस्त करने जैसी बातें करने की बजाय केवल इस बात पर ध्यान केंद्रित रखना चाहिए था कि वे तबाही लाने वाले जोखिमों को रोकने के लिए साझा सुरक्षा मानक तैयार कर रही हैं। यदि नए मॉडल देर से आते, तो उसे उत्पादन में कटौती के बजाय सख्त सुरक्षा मानकों का स्वाभाविक नतीजा बताया जा सकता था।
मेटा का अलग रुख और उत्पाद सुरक्षा की व्यवहार्यता
फेडरल ट्रेड कमीशन के एक बड़े कानूनी मुकदमों से हाल ही में उबरे मेटा के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मार्क जुकरबर्ग ने काम धीमा करने के प्रस्ताव से पूरी तरह दूरी बनाए रखी है। उनका तर्क है कि तकनीकी कंपनियों के पास अपने मॉडलों को अधिक अनुशासित और सुरक्षित बनाने की मजबूत व्यावसायिक वजह पहले से मौजूद है। यदि कोई मॉडल इंसानी मंशा के उलट व्यवहार करता है, जिसे उद्योग की तकनीकी भाषा में 'मिसअलाइनमेंट' कहा जाता है, तो आम उपभोक्ता ऐसे उत्पाद को तुरंत नकार देंगे। जो कंपनियां सुरक्षा और संतुलन पर समय नहीं लगाएंगी, वे प्रतिस्पर्धी बाजार में खुद ब खुद पिछड़ जाएंगी। इसे दो कार निर्माताओं के उस अंतर से समझा जा सकता है जहां एक पक्ष कहे कि हम कुछ समय बेहतर गाड़ियां नहीं बनाएंगे, जबकि दूसरा पक्ष यह कहे कि जब तक हम गाड़ियों को सुरक्षित नहीं बना लेते, तब तक उनकी रफ्तार नहीं बढ़ाएंगे क्योंकि जानलेवा साबित होने वाली गाड़ियां कोई नहीं खरीदेगा।
अमेरिकी न्याय विभाग के एंटीट्रस्ट डिवीजन के पूर्व नीति निदेशक डेविड लॉरेंस ने पेशेवर मंच लिंक्डइन पर लिखा कि विनाशकारी जोखिमों को रोकने वाले समझौते वास्तव में उत्पादन बढ़ाते हैं और बाजार में स्वस्थ मुकाबले को बढ़ावा देते हैं। ऐसे कदमों को कानून के भीतर 'सहायक संयम सिद्धांत' यानी एंसिलरी रिस्ट्रेंट्स डॉक्ट्रिन का कानूनी संरक्षण पहले से प्राप्त है। उनके इस विचार पर एफटीसी के एक अनुभवी वकील ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर इंसानी वजूद ही नहीं बचेगा, तो फिर कोई बाजार या प्रतिस्पर्धा भी बाकी नहीं रहेगी।
गुणवत्ता तय करने का सिंडिकेट और आत्म-नियमन की पुरानी मिसालें
नॉर्ट्रे डेम लॉ स्कूल के प्रोफेसर और न्याय विभाग के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी रोजर अल्फॉर्ड चेतावनी देते हैं कि सुरक्षा उपाय लागू न करने की सामूहिक सहमति उल्टे कंपनियों को 'गुणवत्ता निर्धारण' यानी क्वालिटी फिक्सिंग के संगीन आरोपों के घेरे में ला सकती है। यह वह स्थिति होती है जब कंपनियां आपस में तय कर लेती हैं कि कोई भी अपने उत्पाद की गुणवत्ता में कानून द्वारा अनिवार्य न्यूनतम सीमा से आगे सुधार नहीं करेगा। अल्फॉर्ड ने यूरोप के वाहन उद्योग से जुड़े एक पुराने मामले का उदाहरण दिया जहां कार कंपनियों ने उत्सर्जन घटाने की तकनीक पर साथ काम तो किया, मगर एक-दूसरे से आगे निकलकर पर्यावरण सुरक्षा के अतिरिक्त कदम न उठाने की साठगांठ कर ली। अंततः उस मामले में शामिल कंपनियों पर तकरीबन एक अरब डॉलर का भारी जुर्माना ठोंका गया था।
उद्योगों द्वारा खुद के लिए नियम तय करने की परंपरा हालांकि नई नहीं है। जॉन बर्गमेयर बताते हैं कि अमेरिकी कानून में नेशनल कोऑपरेटिव रिसर्च एंड प्रोडक्शन एक्ट ऑफ 1993 के तहत पहले से ही कंपनियों को मानक तय करने वाले संगठन बनाने की छूट है। इसके लिए कंपनियों को केवल एफटीसी और न्याय विभाग को अग्रिम सूचना देनी होती है ताकि वे भविष्य में प्रतिस्पर्धा रोधी मुकदमों की देनदारियों से खुद को सुरक्षित रख सकें। इसके बावजूद अविश्वास विरोधी मामलों के विशेषज्ञ अक्सर किसी भी विशेष छूट पर गहरी शंका जताते हैं, क्योंकि इससे बड़े खिलाड़ियों का वर्चस्व बढ़ता है और छोटे नए स्टार्टअप्स के लिए बाजार में पांव जमाना नामुमकिन हो जाता है।
राजनीतिक दबाव, अरबों डॉलर की पूंजी और सार्वजनिक निर्गम की होड़
एआई दौड़ में शामिल प्रमुख दावेदारों पर राजनीतिक स्तर से भी तीखी आपत्तियां दर्ज की गई हैं। प्रेसिडेंट्स काउंसिल ऑफ एडवाइजर्स ऑन साइंस एंड टेक्नोलॉजी के सह-अध्यक्ष डेविड सैक्स ने ओपनएआई और एंथ्रोपिक पर आपसी एकाधिकार स्थापित करने का आरोप मढ़ते हुए कानूनी छूट की मांग को चुनावी मौसम का पाखंड और कार्टेल बनाने का बहाना करार दिया। दूसरी तरफ इन प्रयोगशालाओं में काम करने वाले कई कर्मचारी निजी तौर पर यह चिंता जता चुके हैं कि नई तकनीकों को जिस अंधी रफ्तार से बाजार में उतारा जा रहा है, वह सुरक्षा को ताक पर रख सकती है। बर्गमेयर का मानना है कि कई बार कंपनियां बाजार के अत्यधिक दबाव के चलते ऐसी विवशता महसूस करती हैं कि वे अपने आगामी आईपीओ या निवेशकों की नाराजगी के डर से अकेले दम पर रफ्तार घटाने का जोखिम नहीं ले पातीं।
एंथ्रोपिक और ओपनएआई दोनों ने ही आरंभिक सार्वजनिक निर्गम के लिए गोपनीय दस्तावेज दाखिल कर रखे हैं और दोनों कंपनियों का मूल्यांकन एक ट्रिलियन डॉलर के आसपास या उससे ऊपर आंका गया है। एंथ्रोपिक अगले महीने शेयर बाजार में कदम रख सकती है, जबकि ओपनएआई के सीईओ सैम ऑल्टमैन ने सुरक्षा चिंताओं का हवाला देते हुए अपने आईपीओ को 2027 तक टालने की बात कही है। कंपनी के मुख्य वित्तीय अधिकारी ने भी पूर्व में कर्मचारियों से 2027 में सार्वजनिक कंपनी बनने की बात साझा की थी। रैम्प एआई इंडेक्स के आंकड़े दर्शाते हैं कि दोनों कंपनियों के मॉडलों का उपयोग लगभग बराबर स्तर पर है और शीर्ष स्थान के लिए उनके बीच कांटे की टक्कर चल रही है। अल्फॉर्ड के अनुसार कोई भी कंपनी अकेले रफ्तार धीमी करके इस डर में नहीं जीना चाहती कि उसका प्रतिद्वंद्वी पूरी ताकत से आगे निकल जाएगा।
वाशिंगटन के सत्ता गलियारों से तकनीकी रफ्तार को निर्बाध रखने का भारी दबाव बना हुआ है। गति धीमी करने के प्रस्ताव सामने आने पर डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर कहा कि सरकार के पास इन कंपनियों पर भारी आपराधिक और नियामक शक्तियां हैं और जो भी एआई जीतेगा, वही असल में सब कुछ जीतेगा। अमेरिकी रक्षा विभाग के मुख्य प्रौद्योगिकी अधिकारी के खाते से भी इस सुस्ती के विचार के विरोध में लगातार संदेश साझा किए जा रहे हैं। न्याय विभाग का एंटीट्रस्ट डिवीजन भी इन राजनीतिक खींचतानों से अछूता नहीं रहा है, जहां आंतरिक विवादों और नेतृत्व पर लगे आरोपों के बाद प्रशासनिक स्तर पर फेरबदल देखे गए हैं। एफटीसी के चेयरमैन एंड्रयू फर्ग्यूसन ने भी एक सम्मेलन में साफ संकेत दिया कि इस नई तकनीक की अंतिम दिशा डोनाल्ड ट्रंप ही तय करेंगे।
लंबी कानूनी जांच का साया और खुद के नियम बनाने की मजबूरी
यदि संघीय एजेंसियां विकास को धीमा करने के समझौते पर अपनी जांच शुरू करती हैं, तो इसे 'कंडक्ट इन्वेस्टिगेशन' के रूप में देखा जाएगा। किसी विलय की जांच के विपरीत, जिसमें सरकार पर समय सीमा की पाबंदियां होती हैं, आचरण की ऐसी पड़ताल वर्षों तक खिंच सकती है। इसके तहत संबंधित कंपनियों को लाखों पन्नों के आंतरिक दस्तावेज पेश करने पड़ सकते हैं, शीर्ष अधिकारियों को बयानों के लिए घंटों तलब किया जा सकता है और सैकड़ों कर्मचारियों के उपकरणों को कानूनी संरक्षण के तहत जब्त या जांचा जा सकता है, भले ही अंत में सरकार के हाथ कोई ठोस सबूत न लगे। नई सरकारी नियमावली के अभाव और एंटीट्रस्ट छूट मिलने की शून्य संभावनाओं के बीच इन शीर्ष तकनीकी प्रयोगशालाओं को खुद ही संभलकर आगे बढ़ना होगा और साथ ही नियामक मुकदमों के खतरे से भी बचना होगा।

















