अमेरिका और चीन के बीच चल रही AI की होड़ की तमाम चर्चाओं के बीच, हाल ही में बीजिंग में दुनिया के टॉप आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस रिसर्चर्स के एक जमावड़े ने एक असहज सच्चाई की ओर इशारा किया, जो दोनों देशों की सरहदों से परे थी। दोनों तरफ सबसे ताकतवर सिस्टम बना रहे लोग इस बात को लेकर सचमुच चिंतित हैं कि यह सब किस दिशा में जा रहा है, और कई का मानना है कि दोनों प्रतिद्वंद्वी अब सुरक्षा को हार-जीत का मुकाबला मानकर नहीं चल सकते।
यह सम्मेलन बीजिंग एकेडमी ऑफ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने आयोजित किया था। इसमें इस क्षेत्र के कुछ सबसे पेचीदा सवालों पर बात हुई, जैसे रिकर्सिव सेल्फ-इम्प्रूवमेंट यानी यह विचार कि मॉडल खुद अपना कोड दोबारा लिख सकते हैं और बिना किसी सीमा के आगे बढ़ते रह सकते हैं, से लेकर ह्यूमनॉइड रोबोट तक। इसमें कंप्यूटिंग की कुछ दिग्गज हस्तियां भी शामिल हुईं, जिनमें पब्लिक-की क्रिप्टोग्राफी के सह-आविष्कारक व्हिटफील्ड डिफी और एंड्रयू बार्टो शामिल थे। बार्टो को रीइन्फोर्समेंट लर्निंग पर उनके बुनियादी काम के लिए रिच सटन के साथ ट्यूरिंग अवॉर्ड मिला था।
सबसे बड़ा संदेश
हर तकनीकी बहस से ऊपर एक ही नतीजा बार-बार सामने आता रहा, कि अमेरिका और चीन को AI की अपनी कड़वी होड़ को किनारे रख देना चाहिए। फ्रंटियर AI से जुड़े साइबर सुरक्षा और सिस्टम-स्तर के खतरे इतने गंभीर हैं कि उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, और तेजी से बेहतर हो रहे एजेंटिक मॉडल जल्द ही भारी अफरा-तफरी मचा सकते हैं, बशर्ते दुनिया की AI महाशक्तियां मिलकर काम करने का रास्ता न निकालें। MIT के कंप्यूटर वैज्ञानिक स्टीफन कैस्पर, जिन्होंने वीडियो के जरिए सम्मेलन को संबोधित किया, ने कहा, "AI एक वैश्विक तकनीक है, जिसके फायदे भी वैश्विक हैं, नुकसान भी वैश्विक हैं, और नई क्षमताओं का आखिरकार फैल जाना इसकी एक पक्की प्रवृत्ति है।"
वॉशिंगटन का सख्त रुख
अब तक अमेरिका ने चीन की AI प्रगति को आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा, दोनों के लिए खतरा माना है। वॉशिंगटन ने चीन की ताकतवर AI की राह रोकने के लिए एडवांस चिप और चिप बनाने वाले उपकरणों पर कड़ी पाबंदियां लगाई हैं। हाल ही में अमेरिकी सरकार ने एंथ्रोपिक को निर्देश दिया कि वह विदेशी नागरिकों को अपने सबसे ताकतवर मॉडल मिथॉस और फेबल 5 तक पहुंचने से रोके। इसकी वजह राष्ट्रीय सुरक्षा बताई गई। जवाब में एंथ्रोपिक ने सभी के लिए यह पहुंच बंद कर दी। जिस एक कंपनी को लेकर खास चिंता थी, वह चीन से कथित संबंध रखने वाली एक दक्षिण कोरियाई टेलीकॉम दिग्गज थी।
सहयोग क्यों जरूरी हो सकता है
लेकिन बीजिंग के इस जमावड़े ने एक अलग तर्क को मजबूती दी, कि अगर AI को बहुत तेजी और लापरवाही से बनाया गया तो दोनों देशों को नुकसान होगा। जैसे-जैसे ये सिस्टम और ताकतवर, और एजेंटिक तथा रोजमर्रा की जिंदगी में रचे-बसे होते जाएंगे, वैसे-वैसे यह खतरा भी बढ़ता जाएगा कि इन्हें साइबर हथियार बना दिया जाए या ये किसी भयानक तरीके से नाकाम हो जाएं। चूंकि सबसे एडवांस मॉडल बनाने की जिम्मेदारी इन्हीं दो दबदबे वाली AI ताकतों पर है, इसलिए साथ मिलकर काम करना अब आदर्शवाद कम और जरूरत ज्यादा लगने लगा है।
कैस्पर ने एक रिसर्च का हवाला दिया, जिससे पता चलता है कि AI के खतरों पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग से होने वाले फायदे, ऐसे सहयोग से पैदा होने वाले किसी भी राष्ट्रीय सुरक्षा जोखिम से कहीं ज्यादा हैं। उन्होंने इस हालात की तुलना शीत युद्ध से की, जब अमेरिका और सोवियत संघ एक-दूसरे से ज्यादा हथियार जमा करने की कोशिश के बावजूद परमाणु खतरों से निपटने के लिए साथ काम करने को मजबूर हुए थे। कैस्पर ने कहा, "इस वक्त AI से जुड़ा लगभग हर शख्स एक बात पर सहमत है, कि AI को किसी चेरनोबिल जैसे हादसे की जरूरत नहीं है।"
साइबर खतरा हर जगह एक जैसा
एक पूरे दिन चले सत्र ने यह साफ कर दिया कि ज्यादा ताकतवर AI से पैदा होने वाली सुरक्षा चुनौतियां कितनी सरहद-विहीन हो चुकी हैं। इनमें AI से बने कोड में नई किस्म की कमजोरियां, एजेंटिक टूल के इस्तेमाल से खुलने वाले हमले के नए रास्ते, और सोशल इंजीनियरिंग के हमले अपने-आप अंजाम देने के तरीके शामिल हैं।
शंघाई जिया टोंग यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर लिन यून, जिनका काम AI और कंप्यूटर सुरक्षा पर केंद्रित है, मानते हैं कि नजदीकी भविष्य में बढ़त हमलावरों के हाथ रहेगी। लेकिन उनका मानना है कि समय के साथ नए बचाव, जिनमें खुद AI के नए इस्तेमाल भी शामिल हैं, यह पलड़ा फिर से बचाव करने वालों की तरफ झुका देंगे। यून का तर्क है कि भले ही मुकाबला इसे उलझा देता हो, फिर भी सहयोग को प्राथमिकता बनी रहनी चाहिए। उन्होंने कहा, "अगर अलग-अलग देश खतरों को एक जैसे तरीके से समझें, तो साझा सुरक्षा सिद्धांत और तकनीकी मानक तय करना आसान हो जाता है। असली बात यह है कि ऐसे क्षेत्र ढूंढे जाएं जहां जानकारी साझा करने से संवेदनशील ऑपरेशनल ब्योरे उजागर हुए बिना सिस्टम-स्तर का जोखिम घटाया जा सके।"
ओपन-वेट मॉडल की उलझन
शायद दोनों देशों के लिए सबसे पेचीदा सवाल यही है कि खुलेपन और जोखिम के बीच संतुलन कैसे बैठाया जाए। ओपन-वेट मॉडल रिसर्च और इनोवेशन के लिए बेहद जरूरी हो चुके हैं, और खासकर चीनी मॉडलों को अमेरिका में खूब पसंद किया जा रहा है। लेकिन जैसे-जैसे ये और सक्षम होते जाएंगे, यह पक्का करना मुश्किल होता जाएगा कि ये हैकरों को सुरक्षा की खामियां ढूंढने में मदद न करें और इन्हें साइबर हथियार के तौर पर इस्तेमाल न किया जा सके।
पिछले कुछ सालों में चीनी कंपनियों ने बेहद सक्षम ओपन-वेट मॉडल पेश करने में बढ़त बनाई है, जिनमें मूनशॉट का किमी, अलीबाबा का क्वेन और ज़ेड.एआई का GLM शामिल हैं। अमेरिका ने एनवीडिया के नेमोट्रॉन जैसे मॉडलों के साथ अपनी ओपन-वेट मुहिम को फिर से शुरू किया है। लेकिन यह क्षेत्र अब एक ऐसे मोड़ पर पहुंच रहा है, जहां कम ताकतवर ओपन मॉडल भी खतरनाक साबित हो सकते हैं, अगर उनके सुरक्षा घेरे हटा दिए जाएं। विशेषज्ञों के विश्लेषण के मुताबिक ज़ेड.एआई का ताजा मॉडल GLM 5.2 फ्रंटियर एजेंटिक और कोडिंग क्षमताएं रखता है, और ओपन-वेट मॉडलों की अगली पीढ़ी फेबल या मिथॉस के बराबर हो सकती है। इसी हफ्ते चीन की एक प्रमुख साइबर सुरक्षा कंपनी 360 सिक्योरिटी टेक्नोलॉजीज ने कहा कि उसने मिथॉस के बराबर हैकिंग क्षमताओं वाला एक AI मॉडल तैयार कर लिया है।
यून ने कहा कि उद्योग को यह पक्का करने के नए तरीके बनाने होंगे कि ओपन मॉडल अप-टू-डेट हों, बैकडोर और कमजोरियों से मुक्त हों, और सुरक्षा मानकों पर खरे उतरें। बदलाव के संकेत अभी से दिखने लगे हैं, सुरक्षा संबंधी चिंताएं अब एक वजह हैं कि चीन में कुछ एडवांस मॉडल अब ओपन सोर्स के रूप में जारी नहीं किए जा रहे।













