पूरी दुनिया में लोग खाना पकाने की नई विधियों की खोजबीन से लेकर दफ्तर की प्रस्तुतियों और जटिल शोध तक हर छोटे-बड़े काम के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता का सहारा लेने लगे हैं। जिंदगी के रोजमर्रा के कामों में यह तकनीक जितनी तेजी से पैठ बना रही है, उतनी ही तेजी से इसके असर को लेकर इंसानी मन में उलझनें और बेचैनी भी बढ़ रही हैं। किसी नई व्यवस्था का नियमित इस्तेमाल इस बात की गारंटी नहीं है कि समाज उसके भविष्य से पूरी तरह आश्वस्त हो चुका है। रायशुमारी एजेंसी गैलप द्वारा किए गए एक ताजा अध्ययन से यह बात साफ हुई है कि अमेरिका में रोजाना एआई इस्तेमाल करने वाले लगभग 68 प्रतिशत लोग इसके दूरगामी प्रभावों को लेकर गहरी चिंता में हैं। जो लोग इसका इस्तेमाल कभी-कभार करते हैं, उनमें यह घबराहट और भी ज्यादा दर्ज की गई है।
यह स्थिति ऐसे दौर में सामने आई है जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर नियंत्रण, सुरक्षा मानकों, तकनीक के अनियंत्रित होने के खतरे और तकनीकी जगत में अनुचित प्रतिस्पर्धा को लेकर तीखी बहस जारी है। यह अध्ययन साफ दिखाता है कि तकनीक को अपनाना केवल उसके प्रति अंध समर्थन का पैमाना नहीं माना जा सकता। माइक्रोसॉफ्ट द्वारा प्रायोजित इस अध्ययन में दुनिया के 37 देशों से शुरुआती आंकड़े जुटाए गए हैं। अप्रैल से जुलाई के बीच प्रत्येक देश के करीब 1,000 लोगों से सीधे सवाल पूछे गए थे। आगे चलकर इस शोध को 140 देशों तक विस्तारित किया जाएगा। वर्तमान नतीजों में भारत, ऑस्ट्रेलिया और मलेशिया जैसे विशाल तकनीकी उपभोक्ता आधार वाले देश शामिल नहीं हैं।
पश्चिमी देशों में गहरी चिंता, अमेरिका सबसे आगे
अध्ययन के आंकड़े बताते हैं कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पश्चिमी देश इस नई तकनीकी क्रांति से सबसे ज्यादा सहमे हुए हैं। अमेरिका में यह बेचैनी चरम पर है, जहां 74 प्रतिशत नागरिकों ने एआई के संबंध में चिंता व्यक्त की है। इसके उलट केवल 36 प्रतिशत अमेरिकी मानते हैं कि यह तकनीक देश के लिए मददगार साबित होगी।
कनाडा जैसे अन्य संपन्न पश्चिमी देशों में भी बार-बार इस्तेमाल और गहरे डर का ऐसा ही मिश्रण देखने को मिला। कनाडा में सर्वेक्षण में शामिल 29 प्रतिशत लोगों ने रोज एआई का उपयोग करने की बात कही, लेकिन उनमें से आधे से अधिक लोग इसके सामाजिक असर को लेकर आशंकित थे। कुल मिलाकर कनाडा के 64 प्रतिशत लोग जो एआई से परिचित हैं, उन्होंने इसके प्रति चिंता जाहिर की।
लोगों के इस अंदेशे के पीछे ठोस जमीनी कारण भी हैं। तकनीकी उद्योग में एआई पर भारी निवेश करने के नाम पर लाखों कर्मचारियों की छंटनी की जा चुकी है और नए युवाओं के लिए शुरुआती स्तर की नौकरियां तेजी से घट रही हैं। इसके अलावा एआई की लत से जुड़े गंभीर मानसिक संकट और एंथ्रोपिक के सीईओ डारियो अमोदेई जैसे उद्योग जगत के दिग्गजों की चेतावनियों ने भी भय को बढ़ाया है। डारियो अमोदेई ने आगाह किया है कि यह तकनीक बहुत बड़े पैमाने पर नौकरियों को खत्म कर सकती है।
एशियाई देशों में उम्मीद और उत्साह का माहौल
पश्चिमी देशों के तनाव के विपरीत एशियाई देशों की तस्वीर बिल्कुल अलग है। सिंगापुर में रोजाना एआई का उपयोग करने वालों की तादाद सबसे अधिक 46 प्रतिशत दर्ज की गई। वहां एआई को जानने वाले 80 प्रतिशत से अधिक लोगों का विश्वास है कि यह तकनीक उनके रोजमर्रा के जीवन को बेहतर बनाएगी, जबकि 77 प्रतिशत का मानना है कि इससे पूरे देश का विकास होगा।
चीन में भी 35 प्रतिशत लोग रोजाना एआई का उपयोग करते हैं और अधिकांश आबादी इसे देश के लिए फायदेमंद मानती है। इज़राइल में भी इसी तरह का मजबूत तकनीकी भरोसा देखा गया है। सकारात्मक भावनाओं के मामले में चीन 90 प्रतिशत, सिंगापुर 89 प्रतिशत और केन्या 87 प्रतिशत के साथ सबसे आगे रहे हैं।
सटीकता पर सवाल और वैश्विक कूटनीति का मुद्दा
भले ही लोग तकनीक की उपयोगिता को लेकर उत्साहित हों, लेकिन इसकी सटीकता पर अंधा भरोसा करने वाले बहुत कम हैं। जो लोग इसका रोज इस्तेमाल करते हैं, वे तुलनात्मक रूप से परिणामों पर ज्यादा भरोसा करते हैं, विशेषकर सिंगापुर, इज़राइल और चीन में। अमेरिका में प्रतिदिन उपयोग करने वालों में से केवल 45 प्रतिशत ही परिणामों पर पूरा भरोसा जताते हैं। वैश्विक स्तर पर देखें तो केवल 36 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे एआई के नतीजों पर पूरी तरह विश्वास करते हैं।
एआई का यह प्रसार अब सिर्फ तकनीकी मुद्दा नहीं रहा, बल्कि वैश्विक सुरक्षा और कूटनीति के केंद्र में आ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच गुरुवार को होने वाली बैठक में एआई सुरक्षा और चिप्स एक प्रमुख एजेंडा हैं। चीन के राज्य सुरक्षा मंत्रालय के प्रमुख चेन यिक्सिन ने एक लेख में चेताया है कि यह तकनीक राजनीतिक, संस्थागत और वैचारिक सुरक्षा पर गहरा असर डाल सकती है।
गैलप के वरिष्ठ वैज्ञानिक पाब्लो डिएगो-रोसेल ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि लोगों का रवैया बहुआयामी है, जहां वे एआई को उपयोगी मानते हुए भी चिंतित रह सकते हैं और इसकी सटीकता पर संदेह के बावजूद संभावनाओं को स्वीकार कर सकते हैं। भारी पूंजी निवेश के चलते तकनीक का विस्तार तो जारी रहेगा, लेकिन समाज में इसके दायरे और सीमाओं को लेकर मंथन आगे भी जारी रहेगा।


















