फुटबॉल के मैच में जितनी संभावनाएं बन सकती हैं, उतने तो शायद ब्रह्मांड में परमाणु भी नहीं हैं। यह बात सुनने में अतिशयोक्ति लग सकती है, लेकिन पैट्रिक ल्यूसी इससे भी आगे की बात कहते हैं। उनके मुताबिक, फुटबॉल में एक खेल के दौरान इतने क्रमचय (परम्यूटेशन) बनते हैं जिनकी गिनती ब्रह्मांड के परमाणुओं से भी ज्यादा है।
ल्यूसी, स्टैट्स परफॉर्म नाम की डेटा और एआई कंपनी के चीफ साइंटिस्ट हैं। यह कंपनी आज दुनिया भर के फुटबॉल तंत्र की रीढ़ बन चुकी है। आधुनिक फुटबॉल का शायद ही कोई पहलू बचा हो जहां इसके आंकड़े इस्तेमाल न होते हों। यही डेटा खिलाड़ियों की स्काउटिंग से लेकर करोड़ों रुपये के ट्रांसफर सौदों तक की बुनियाद बनता है, कोचिंग स्टाफ को रणनीति और प्लेइंग इलेवन चुनने में मदद करता है, और कॉर्नर तथा फ्री किक की चालें तक तैयार करता है। खिलाड़ी इसी के आधार पर अपने कॉन्ट्रैक्ट पर मोलभाव करते हैं और प्रसारणकर्ता दर्शकों का मनोरंजन।
आंकड़े जो आत्मचालित गाड़ियों जैसे हैं
ल्यूसी समझाते हैं कि यह डेटा बेहद बारीक, मल्टी एजेंट और प्रतिस्पर्धी प्रकृति का होता है। उनके शब्दों में, खेल में जो काम होता है वह सबसे ज्यादा सेल्फ ड्राइविंग कारों के काम जैसा है, क्योंकि दोनों ही जगह आप गतिपथ यानी ट्रैजेक्टरी का अध्ययन करते हैं। वे कहते हैं कि अगर सिर्फ एक टीम की बात करें तो खिलाड़ियों को क्रम में लगाने भर के 10 फैक्टोरियल तरीके बन जाते हैं। और जैसे ही इसमें विरोधी टीम को जोड़ दिया जाए, यह आंकड़ा फट पड़ता है।
छोटे देश भी तकनीक से बना रहे रास्ता
तकनीक का फायदा सिर्फ बड़े देश ही नहीं उठा रहे। डच कैरिबियन द्वीप क्यूरासाओ, जिसकी आबादी करीब 1,59,000 है, इस टूर्नामेंट में वर्ल्ड कप के लिए क्वालिफाई करने वाला अब तक का सबसे छोटा देश बन गया। इसने अपने ही डेटा और तकनीक का इस्तेमाल करके 'डायस्पोरा ट्रैकिंग' की, यानी खिलाड़ियों के माता पिता की वंशावली का नक्शा बनाया, योग्य खिलाड़ियों की पहचान की और भौगोलिक डेटा की मदद से स्काउटिंग के दौरे और ट्रायल की योजना बनाई।
एनालिटिक्स एफसी नाम की डेटा आधारित स्पोर्ट्स कंसल्टेंसी के चीफ एग्जिक्यूटिव एलेक्स स्टीवर्ट बताते हैं कि क्यूरासाओ के 26 खिलाड़ियों में से सिर्फ एक ही खिलाड़ी असल में क्यूरासाओ द्वीप पर पैदा हुआ था। बाकी सभी का जन्म नीदरलैंड्स में हुआ था।
कोच चुनने से लेकर टीम बनाने तक
राष्ट्रीय फेडरेशनों में डेटा और एआई का एक और बढ़ता इस्तेमाल मैनेजर यानी कोच के चयन में हो रहा है। ये टूल उपलब्ध खिलाड़ियों के पूल का विश्लेषण कर सकते हैं और ऐसे मैनेजर की पहचान कर सकते हैं जिनकी रणनीतिक खूबियां उस टीम के लिए सबसे मुफीद हों। इतना ही नहीं, टीमें ग्रुप स्टेज के विरोधियों को ध्यान में रखकर टूर्नामेंट से पहले अपनी टीम का ढांचा तय करने में भी एआई की मदद ले सकती हैं।
उरुग्वे के मैनेजर मार्सेलो बिएलसा ने एक बार, जब वे प्रीमियर लीग की टीम लीड्स यूनाइटेड के कोच थे, कहा था कि उनका स्टाफ किसी आने वाली टीम का विश्लेषण करने में करीब 300 घंटे खर्च करता है। ल्यूसी कहते हैं कि अब यही काम अपने आप किया जा सकता है। वे एक वीडियो दिखाते हैं जिसमें लाल और नीले बिंदु एक पीली गेंद के पीछे मैदान पर इधर उधर भाग रहे हैं। विश्लेषक इससे सवाल पूछ सकते हैं, जैसे कि कोई खास चाल कितनी बार शॉट या गोल में बदली और बाकी हर बार जब ऐसा हुआ, और हर जवाब जानकारी की एक नई परत खोल देता है।
इंटरनेट के शुरुआती दौर जैसा मोड़
क्लबों और राष्ट्रीय टीमों के साथ काम कर रहे एआई प्लेटफॉर्म प्लेयर के सह संस्थापक और सीईओ यान वेंट इसकी तुलना इंटरनेट के आने से करते हैं। उनके मुताबिक, इंटरनेट के शुरुआती दिनों में ब्रिटिश एयरवेज और अमेज़न, दोनों ने वेबसाइटें बनाई थीं। एक सूचना देने और हवाई टिकट बेचने का मंच बनकर रह गई, जबकि दूसरी ने पूरी दुनिया का कारोबार बदल दिया। वेंट कहते हैं कि एआई का असर भी कुछ ऐसा ही है, जो रोजमर्रा के छोटे कामों से लेकर पूरे उद्योगों तक को बदल रहा है, और फुटबॉल के मामले में पूरे खेल फ्रेंचाइजी को।
हर देश के बस की बात नहीं
लेकिन एआई टूल और इन्हें बनाने तथा चलाने वाला स्टाफ महंगा पड़ता है। हर देश के पास इतने संसाधन नहीं हैं। वेंट का मानना है कि छोटे देशों के लिए उनकी अपनी कंपनी जैसी पहले से स्थापित बाहरी कंपनियों के साथ काम करना ज्यादा किफायती विकल्प हो सकता है।
एक और चुनौती यह है कि ज्यादा डेटा कई बार विश्लेषक का काम और मुश्किल कर देता है। उसका काम जानकारी के विशाल भंडार को निचोड़कर कोच या खिलाड़ी के लिए चंद काम की बातें निकालना होता है।
स्टीवर्ट कहते हैं कि आप यह नहीं कहना चाहते कि अब हमारे पास ये सब शानदार चीजें हैं तो लीजिए, विरोधी फुलबैक पर 47 पन्नों की रिपोर्ट हाजिर है। वे आगे जोड़ते हैं कि एक तरह से विश्लेषक का काम आसान हो गया है क्योंकि अब ज्यादा जानकारी है, लेकिन यही बात इसे कठिन भी बना देती है, और असली हुनर इसी को निचोड़कर छोटा करने में है।
अमीर और गरीब देशों के बीच चौड़ी होती खाई
तकनीक उन टीमों के लिए मैच विश्लेषण और तैयारी को मजबूत बना सकती है जो पहले बड़े स्काउटिंग और एनालिटिक्स विभागों वाले देशों के सामने टिक भी नहीं पाती थीं। लेकिन सवाल यह है कि क्या अब समस्या यह बन जाएगी कि वे कंप्यूटर वैज्ञानिकों और विश्लेषकों की बड़ी फौज वाले देशों के सामने मुकाबला नहीं कर पाएंगी? क्या अमीर और गरीब देशों के बीच डेटा की खाई इतनी चौड़ी हो जाएगी कि वह एक ऐसे टूर्नामेंट में मुकाबले को ही बिगाड़ दे, जहां छोटे देशों के खिलाफ हालात पहले से ही मुश्किल हैं?
फीफा इस बात को लेकर इतना चिंतित है कि उसने अपना खास एआई एजेंट 'फुटबॉल एआई प्रो' तैयार किया है और इस टूर्नामेंट में पहली बार यह वर्ल्ड कप के हर देश को उपलब्ध कराया जा रहा है।
चैटजीपीटी जैसा फीफा का एआई
यह एजेंट देखने में चैटजीपीटी जैसे इंटरफेस वाला है, जहां कोच सवाल टाइप करके अपने अगले विरोधियों के बारे में जानकारी हासिल कर सकते हैं। मैचों को 3डी में दोबारा रचा जाता है, जिससे ऐसे कोणों से विश्लेषण संभव हो जाता है जो पहले मुमकिन ही नहीं था। यहां हर चीज को आंकड़ों में मापा जा सकता है, चाहे वह यह हो कि खिलाड़ी कहां पास देते और दौड़ते हैं, कैसे हमला और बचाव करते हैं, या कौन से शॉट लगाते और कितने गोल करते हैं।
फीफा के डायरेक्टर ऑफ इनोवेशन योहानेस होल्ज़म्यूलर कहते हैं कि उनका लक्ष्य, बल्कि जिम्मेदारी भी, सभी टीमों को यह तकनीक मुहैया कराना है ताकि हर किसी के पास इसकी पहुंच हो और वह बिना किसी अतिरिक्त विशेषज्ञ के, आसानी से इसका इस्तेमाल कर सके, क्योंकि हर कोई इसका खर्च नहीं उठा सकता।
यह तकनीक मामूली डेटा विभाग वाले देश और मसलन इंग्लैंड की राष्ट्रीय टीम के बीच की खाई को पाट पाएगी या नहीं, यह बहस का विषय है। इंग्लैंड की टीम अपने यहां सॉफ्टवेयर डेवलपर, डेटा साइंटिस्ट और विश्लेषक रखती है, जो बाहरी एआई टूल से लैस होते हैं। होल्ज़म्यूलर मानते हैं कि कम से कम इतना तो वे कर ही सकते हैं। वे कहते हैं कि उन्हें यह खाई साफ दिखती है, जहां कुछ टीमें दूसरों के मुकाबले तकनीक और डेटा का कहीं ज्यादा इस्तेमाल कर रही हैं।
अगला कदम, भविष्य की भविष्यवाणी
डेटा, एआई और फुटबॉल का भविष्य सचमुच भविष्य का अनुमान लगाने में छिपा है। ल्यूसी कहते हैं कि अगला कदम लंबी अवधि की भविष्यवाणी करना है। उनका मानना है कि एक दिन ऐसा आएगा जब प्रति तथ्यात्मक (काउंटरफैक्चुअल) विश्लेषण की मदद से वे यह सिफारिश कर पाएंगे कि सफलता की संभावना को सबसे ज्यादा बढ़ाने के लिए किन खिलाड़ियों को आराम दिया जाना चाहिए।
तो क्या आगे चलकर फीफा को दखल देकर देशों को सिर्फ फीफा से मंजूर एआई टूल इस्तेमाल करने तक सीमित करना पड़ेगा? होल्ज़म्यूलर कहते हैं कि यह बहुत बड़ा सवाल है। इस पर कभी कोई नियमन बनेगा या नहीं, इसका जवाब आज नहीं दिया जा सकता, लेकिन इतना तय है कि आने वाले समय में एआई बड़ी भूमिका निभाएगा।













