न्यूयॉर्क में आयोजित संयुक्त राष्ट्र महासभा के सालाना सत्र में इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने बेहद आक्रामक अंदाज में अपनी बात रखी. मंच पर उनकी आमद होते ही विश्व के कई मुल्कों के प्रतिनिधि कुर्सियों को खाली कर बाहर निकल गए. सभागार में खाली सीटों की कतारों के बीच नेतन्याहू ने कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए घोषणा की कि उनका देश सुरक्षा चुनौतियों के आगे नहीं झुकेगा. उन्होंने दो टूक कहा कि जब तक विरोधी ताकतों का पूरी तरह सफाया नहीं हो जाता, तब तक किसी भी तरह के संघर्ष विराम की उम्मीद नहीं की जा सकती. इजरायली नेतृत्व ने इस बात पर जोर दिया कि अपने अस्तित्व की हिफाजत के लिए जंग जारी रखने के अलावा कोई अन्य रास्ता नहीं बचा है.
राजनयिकों के वॉकआउट को बताया नैतिक दोहरापन
सभागार से उठकर जाने वाले अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों पर निशाना साधते हुए नेतन्याहू ने इस कदम को ढोंग करार दिया. उन्होंने विरोध दर्ज कराने वालों को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि यह व्यवहार स्पष्ट रूप से नैतिक कायरता को दर्शाता है. उनका तर्क था कि इजरायल ने विरोधी ताकतों के खतरे को खत्म करने के लिए जो कदम उठाए हैं, उनसे वास्तव में उन सभी देशों को सुरक्षा हासिल हुई है जिनके राजनयिक आज विरोध जताते हुए बाहर भागे हैं. इजरायली प्रधानमंत्री ने मंच पर खड़े होकर इस पूरे प्रकरण को अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का एक चौंकाने वाला पाखंड बताया और कहा कि आलोचना करने वाले देश जमीनी हकीकत को नजरअंदाज कर रहे हैं.
ईरान के ठिकानों पर प्रहार और ऐतिहासिक मिशन का उल्लेख
अपने संबोधन में नेतन्याहू ने ईरान के खिलाफ इजरायल की सामरिक कार्रवाई का जोरदार बचाव किया. उन्होंने उल्लेख किया कि तेहरान के परमाणु इरादों को ध्वस्त करने के लिए कड़े कदम उठाने की उनकी प्रतिज्ञा पूरी की गई है. इस सैन्य कार्रवाई की गंभीरता को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा, “अगर हमने ये कदम नहीं उठाया होता, तो आज हममें से कोई भी जिंदा नहीं बचता.” हालांकि अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) ने ऐसे कोई ठोस सुबूत मिलने की पुष्टि नहीं की है और ईरान भी अपने परमाणु कार्यक्रम को शांतिपूर्ण बताता रहा है, फिर भी इजरायली नेता ने दावा किया कि यह प्रहार इजरायल की राष्ट्रीय संप्रभुता और अस्तित्व के लिए अपरिहार्य था.
इसी सिलसिले में उन्होंने 1976 के प्रसिद्ध एंटेबे बचाव अभियान का भावुक स्मरण कराया. यूगांडा के हवाई अड्डे पर बंधक बनाए गए नागरिकों को मुक्त कराने के लिए चलाए गए उस साहसिक अभियान की कमान उनके बड़े भाई योनी नेतन्याहू के हाथों में थी. उस समूचे सैन्य मिशन में योनी ही एकमात्र इजरायली सैनिक थे जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति दी थी. अपने पारिवारिक त्याग का उदाहरण देते हुए नेतन्याहू ने उपस्थित देशों को संदेश दिया कि जब नागरिकों की सुरक्षा का प्रश्न सामने आता है, तो इजरायल किसी भी हद तक जाने से कभी पीछे नहीं हटता.
सीरियाई नेतृत्व को चेतावनी और गोलान हाइट्स पर अटल दावा
भाषण के अगले हिस्से में नेतन्याहू ने सीरिया के राष्ट्रपति अहमद अल-शरा की हालिया टिप्पणियों का सीधा उत्तर दिया. सीरियाई राष्ट्रपति ने इसी अंतरराष्ट्रीय मंच से मांग रखी थी कि इजरायल को गोलान हाइट्स के इलाके से अपनी सेना फौरन हटा लेनी चाहिए. इस मांग को खारिज करते हुए नेतन्याहू ने कहा कि यहूदी समुदाय की उपस्थिति मूसा के समय से ही इस भूभाग पर रही है. उन्होंने सीरियाई नेतृत्व को आगाह किया कि इतिहास की वास्तविकताओं को समझा जाना चाहिए, क्योंकि गोलान हाइट्स पर इजरायल अपनी रणनीतिक स्थिति और उपस्थिति पर कोई समझौता स्वीकार नहीं करेगा.
पश्चिमी मुल्कों के आरोपों पर तीखा पलटवार
संबोधन के समापन चरण में नेतन्याहू ने उन पश्चिमी देशों को भी निशाने पर लिया जो इजरायल की नीतियों पर औपनिवेशिक मानसिकता का आरोप लगाते हैं. विशेष रूप से फ्रांस और ब्रिटेन की ओर संकेत करते हुए उन्होंने कहा कि जिन देशों ने औपनिवेशिक शासन की नींव रखी और सदियों तक वैश्विक भूभागों पर अपना वर्चस्व बनाए रखा, वे ही आज दूसरों को उपदेश दे रहे हैं. उन्होंने इन आरोपों को पूरी तरह अनुचित बताते हुए कहा कि अपने सुरक्षा हितों की रक्षा करने वाले राष्ट्र पर औपनिवेशिक लेबल लगाना केवल राजनीतिक अवसरवादिता है.



















