द्विपक्षीय व्यापार समझौते के लिए जारी बातचीत के बीच वाशिंगटन की एक ताजा रिपोर्ट ने भारत और अमेरिका के व्यापारिक संबंधों में नई हलचल पैदा कर दी है। व्हाइट हाउस की ओर से जारी एक व्यापक अध्ययन में 40 से अधिक देशों की सूची तैयार की गई है, जिन्हें चीनी वस्तुओं की अवैध ट्रांसशिपमेंट के मामले में जोखिम वाला माना गया है। अमेरिकी प्रशासन को अंदेशा है कि चीन अपनी वस्तुओं पर भारी टैरिफ से बचने के लिए उन्हें तीसरे देशों के रास्ते अमेरिकी बाजार में भेज रहा है। इस रिपोर्ट के सार्वजनिक होते ही व्हाइट हाउस के वरिष्ठ व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा कि भारत उनकी निगरानी सूची में शामिल है। जारी वार्ता के दौरान आया यह बयान वाशिंगटन द्वारा व्यापारिक मेज पर दबाव बढ़ाने के एक स्पष्ट संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
व्हाइट हाउस की जोखिम श्रेणियों का विस्तृत ढांचा
अमेरिकी रिपोर्ट में वैश्विक व्यापार और पारगमन मार्गों का विश्लेषण करते हुए 40 से ज्यादा देशों को तीन अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित किया गया है। भारत को कनाडा, यूरोपीय संघ, इजरायल, जापान, मैक्सिको, दक्षिण कोरिया और ताइवान के साथ सबसे उच्च जोखिम वाली यानी Tier-1 श्रेणी में रखा गया है। वाशिंगटन का मानना है कि इन देशों में बड़े और आधुनिक औद्योगिक आधार मौजूद हैं, जिसके कारण वैध व्यापारिक गतिविधियों की आड़ में ट्रांसशिपमेंट का खतरा सबसे अधिक रहता है। हालांकि अमेरिकी अधिकारियों ने यह स्पष्ट किया है कि श्रेणीबद्ध किए जाने का मतलब यह नहीं है कि संबंधित देश की सरकार स्वयं टैरिफ चोरी या तस्करी में शामिल है।
इसी रिपोर्ट की दूसरी श्रेणी यानी Tier-2 में ब्राजील, इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड, तुर्की और वियतनाम को जगह दी गई है। वहीं तीसरी श्रेणी यानी Tier-3 के अंतर्गत बांग्लादेश, कंबोडिया, फिलीपींस, सिंगापुर, श्रीलंका और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों को शामिल किया गया है। अमेरिकी विश्लेषकों के अनुसार इन श्रेणियों का मुख्य उद्देश्य उन भौगोलिक क्षेत्रों की पहचान करना है जिनका उपयोग चीनी निर्यात को नए लेबल देकर या मामूली बदलाव के साथ अमेरिका भेजने के लिए किया जा सकता है।
पीटर नवारो की चेतावनी और अमेरिकी प्रशासन का रुख
रिपोर्ट आने के बाद मीडिया से बातचीत के दौरान पीटर नवारो ने अमेरिका की कठोर व्यापार नीति को रेखांकित किया। उन्होंने कहा, “यह उन 40 से अधिक देशों के बारे में है जो ट्रांसशिपिंग को सक्षम बना रहे हैं और जैसे-जैसे हम दूसरे देशों पर अधिक टैरिफ लगाते हैं, भारत, वियतनाम और आगे चलकर अन्य देश भी इस ट्रांसशिपमेंट की कोशिश करेंगे।”
अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए नवारo ने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिकी बाजार का लाभ उठाने के लिए पारस्परिकता और नियमों का पालन जरूरी है। उनके अनुसार विदेशी वस्तुओं को कम टैरिफ पर अमेरिकी बंदरगाहों तक पहुंचाने के लिए अनुचित तरीकों का सहारा नहीं लिया जा सकता। वाशिंगटन ने इस बात पर जोर दिया है कि किसी भी देश को अपने निर्यात को वैध साबित करने के लिए री-लेबलिंग या छलावा करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
क्या होती है चीनी ट्रांसशिपमेंट और स्क्रूड्राइवर फैक्ट्रियां
सामान्य व्यावसायिक भाषा में ट्रांसशिपमेंट का अर्थ किसी उत्पाद को उसके मूल देश से अंतिम गंतव्य तक पहुंचाते समय किसी तीसरे देश के बंदरगाह या विनिर्माण केंद्र से गुजारना है। आधुनिक वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में यह प्रक्रिया पूरी तरह कानूनी और सामान्य है। हालांकि अमेरिकी प्रशासन की मुख्य आपत्ति उस स्थिति पर है जहां चीन में बने सामान में तीसरे देश के भीतर केवल मामूली बदलाव किए जाते हैं और फिर उस पर उस तीसरे देश की मुहर लगाकर कम शुल्क में अमेरिका भेज दिया जाता है।
व्हाइट हाउस की रिपोर्ट में ऐसे कई मामलों का उदाहरण दिया गया है। एक मामले का जिक्र करते हुए बताया गया कि वियतनाम में चीन से आयातित इलेक्ट्रिक मोटरों को फर्नीचर में असेंबल करके अमेरिकी बाजार में भेजा जा रहा था। इसके अलावा रिपोर्ट में स्क्रूड्राइवर फैक्ट्रियों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए गए हैं। ये ऐसी इकाइयां होती हैं जहां विदेश से पूरी तरह तैयार पुर्जे आते हैं और स्थानीय स्तर पर केवल पेंच कसने जैसा मामूली काम करके उत्पाद का मूल देश बदल दिया जाता है।
डिटेक्टिव बॉर्डर और एआई आधारित निगरानी व्यवस्था
अवैध ट्रांसशिपमेंट पर शिकंजा कसने के लिए अमेरिकी प्रशासन अपनी प्रवर्तन एजेंसियों को नए अधिकार देने जा रहा है। अमेरिका कस्टम्स एंड बॉर्डर प्रोटेक्शन (CBP) को अधिक व्यापक शक्तियां प्रदान करने के लिए एक विशेष कार्यकारी आदेश पर काम किया जा रहा है। इसके साथ ही अमेरिकी बंदरगाहों पर पहुंचने से पहले ही संदिग्ध माल की पहचान करने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) पर आधारित एक आधुनिक निगरानी प्रणाली तैयार की जा रही है, जिसे डिटेक्टिव बॉर्डर का नाम दिया गया है।
वाशिंगटन आने वाले समय में अपने सभी नए द्विपक्षीय और बहुपक्षीय व्यापार करारों में सख्त एंटी-ट्रांसशिपमेंट प्रावधान जोड़ने की तैयारी कर रहा है। इसका सीधा अर्थ यह है कि भविष्य में व्यापारिक जांच केवल कस्टम्स जांच तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसके विधिक और कूटनीतिक परिणाम भी होंगे।
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर संभावित प्रभाव
यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब भारत और अमेरिका एक पारस्परिक टैरिफ समझौते को अंतिम रूप देने के लिए गहन बातचीत कर रहे हैं। पहले से ही रूसी ऊर्जा आयात और भारतीय व्यापार नीतियों पर सवाल उठा रहा वाशिंगटन अब ट्रांसशिपमेंट के मुद्दे को बातचीत का केंद्र बना सकता है।
अगर नया व्यापार समझौता अस्तित्व में आता है, तो उसमें CBP को कठोर शक्तियां दी जा सकती हैं। अमेरिकी प्रस्तावों के तहत यदि किसी भारतीय खेप में अवैध ट्रांसशिपमेंट का मामला साबित होता है, तो कस्टम्स विभाग न केवल उस एक शिपमेंट पर जुर्माना लगाएगा, बल्कि संबंधित कंपनी द्वारा पिछले एक वर्ष में भेजे गए सभी माल पर बकाए टैरिफ की वसूली कर सकेगा। यद्यपि वाशिंगटन ने भारत पर सीधे तौर पर कोई आरोप नहीं लगाया है, लेकिन वियतनाम, कंबोडिया, मलेशिया, इंडोनेशिया और फिलीपींस जैसे प्रमुख ट्रांसशिपमेंट हब के साथ भारत का नाम शामिल होना यह दर्शाता है कि नई दिल्ली को अब अपनी व्यापारिक प्रणालियों को और अधिक पारदर्शी बनाना होगा।



















