पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश के दिबांग वैली जिले में मवेशियों के बीच फैली एक गंभीर संक्रामक बीमारी ने पशुपालकों की चिंता बढ़ा दी है। पिछले दो महीनों के भीतर यहां खुरपका और मुंहपका रोग की चपेट में आने से कुल 267 मिथुन अपनी जान गंवा चुके हैं। इस घातक संक्रमण का असर इलाके के 21 गांवों तक फैल चुका है, जहां अब तक 1402 पशु इस वायरस से ग्रस्त पाए गए हैं। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए स्थानीय पशुपालन और पशु चिकित्सा तंत्र को हाई अलर्ट पर रखा गया है।
जुलाई के आखिरी हफ्ते में सामने आए थे शुरुआती लक्षण
जिला पशुपालन एवं पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. दम्मो रिबा के अनुसार, क्षेत्र में इस बीमारी के शुरुआती मामले जुलाई के अंतिम सप्ताह में दर्ज किए गए थे। जैसे ही स्थानीय स्तर पर मिथुन की असामान्य मौतों की सूचना मिली, विभाग ने तुरंत राहत दल तैनात किए। दवाओं और आवश्यक सैंपल कलेक्शन किट से लैस चिकित्सा कर्मियों को सीधे प्रभावित बस्तियों में भेजा गया, ताकि स्थिति बिगड़ने से पहले बीमार पशुओं का इलाज शुरू किया जा सके। इसके साथ ही जमीनी हालात का जायजा लेने के लिए केंद्र सरकार की ओर से विषय विशेषज्ञों का एक विशेष दल भी प्रभावित गांवों में पहुंचा।
प्रयोगशाला जांच में सीरोटाइप ओ स्ट्रेन की पुष्टि
संक्रमण के सटीक कारण की पहचान के लिए एकत्र किए गए नमूनों को परीक्षण हेतु भेजा गया था। ओडिशा स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फुट एंड माउथ डिजीज द्वारा की गई विस्तृत लैब जांच में यह स्पष्ट हुआ कि इस पूरे प्रकोप के पीछे एफएमडी का सीरोटाइप 'ओ' जिम्मेदार है। विभाग की ओर से 20 सितंबर को जारी ताजा स्थिति रिपोर्ट बताती है कि चिन्हित किए गए 1402 पीड़ित पशुओं में से 1225 को चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई जा चुकी है, जबकि 267 पशुओं को नहीं बचाया जा सका।
त्वरित प्रतिक्रिया दल और जमीनी स्तर पर निगरानी
वर्तमान में चार सदस्यों वाली एक क्विक रिस्पॉन्स टीम स्थानीय पशु चिकित्सा कर्मियों के साथ मिलकर जमीनी मोर्चा संभाले हुए है। यह संयुक्त दल प्रभावित बस्तियों में लगातार निगरानी रखने, संक्रमित पशुओं को दवाएं देने और स्थानीय पशुपालकों को जागरूक करने का कार्य कर रहा है। राज्य सरकार और पशुपालन, पशु चिकित्सा एवं डेयरी विकास निदेशालय ने संकट से निपटने के लिए जिले को पर्याप्त मात्रा में दवाइयां और अतिरिक्त कार्यबल मुहैया कराया है। विभाग के पास मिथुन और अन्य मवेशियों का घर-घर, व्यक्ति-वार और गांव-वार विस्तृत डिजिटल रिकॉर्ड मौजूद है। भ्रामक दावों से बचने के लिए अधिकारियों ने सभी से अपील की है कि वे पशुओं की संख्या और मृत्यु के आंकड़ों का मिलान केवल आधिकारिक आंकड़ों से ही करें।
नियमित टीकाकरण और रोकथाम के उपाय
खुरपका-मुंहपका एक बेहद संक्रामक विषाणु जनित रोग है, जो मुख्य रूप से दोहरे खुर वाले पशुओं जैसे मिथुन और गाय-बैलों को तेजी से अपना शिकार बनाता है। बचाव के लिए विभाग साल में दो बार किसानों के घर-द्वार पर जाकर पूरी तरह मुफ्त नियमित टीकाकरण अभियान चलाता है। पशु चिकित्सकों ने पशुपालकों से आह्वान किया है कि वे मवेशियों की सुरक्षा के लिए इन टीकाकरण अभियानों में पूरा सहयोग दें, ताकि जिले के पशुधन को सुरक्षित रखा जा सके।



















