केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने अरुणाचल प्रदेश के अपर सुबनसिरी जिले में चीन द्वारा भारतीय क्षेत्र में 60 किलोमीटर अंदर तक घुसपैठ किए जाने संबंधी सभी दावों को सिरे से खारिज किया है। संसदीय कार्य मंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सोशल मीडिया पर तरह-तरह के वीडियो साझा करके इस प्रकार का भ्रम फैलाना पूरी तरह गलत और बेबुनियाद है। भारत और चीन के बीच अरुणाचल प्रदेश से लगती सीमा अत्यधिक लंबी और दुर्गम है, जिसका जमीन पर पूरी तरह और स्पष्ट रूप से सीमांकन नहीं हुआ है। कई क्षेत्रों में न तो सीमा स्तंभ मौजूद हैं और न ही धरातल पर रेखा को स्पष्ट रूप से चिन्हित किया गया है। रिजिजू ने रेखांकित किया कि यह कोई नया मुद्दा नहीं है और वास्तविक परिस्थितियों को जाने बिना घुसपैठ के दावे करना तथ्यों के विपरीत है।
सीमा पर स्पष्टता का अभाव और स्थानीय ग्रामीणों की चिंताएं
किरेन रिजिजू के अनुसार अरुणाचल प्रदेश में कई स्थानों पर सीमा से जुड़ी पुरानी समस्याएं बनी हुई हैं और इस विषय की गहराई तथा मूल कारण को समझना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि सीमा पर सीमांकन का काम पूरा न होने के कारण अरुणाचल प्रदेश के सीमावर्ती गांवों में रहने वाले कुछ स्थानीय नागरिकों द्वारा जताई जाने वाली चिंताएं बिल्कुल स्वाभाविक और सही हैं। हालांकि, सीमा पर स्पष्ट चिन्ह न होने की इस अनिश्चितता का गलत फायदा उठाकर 60 किलोमीटर चीनी घुसपैठ का प्रचार करना सच्चाई को भटकाने का प्रयास है। भौगोलिक जटिलताओं के कारण उत्पन्न होने वाली स्थानीय समस्याओं और सोशल मीडिया पर फैलाए जा रहे भ्रामक दावों के बीच अंतर को समझना जरूरी है।
इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण और नीतिगत बदलाव का इतिहास
अतीत की नीतियों का उल्लेख करते हुए केंद्रीय मंत्री ने बताया कि भारत और चीन के बीच सीमा बुनियादी ढांचे के विकास में बड़ा अंतर रहा है। चीन ने बहुत पहले ही अपनी तरफ सड़कों और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण कार्य शुरू कर दिया था, जबकि उस समय भारत में कांग्रेस पार्टी की सरकार थी। रिजिजू ने पूर्व रक्षा मंत्री एके एंटनी के संसद में दिए गए बयान का हवाला दिया, जिसमें उन्होंने स्वीकार किया था कि भारत सरकार की नीति सीमांत क्षेत्रों में बुनियादी ढांचा विकसित न करने की थी। इस रक्षा नीति के कारण चीन को अपनी ओर निर्बाध निर्माण करने का अवसर मिला।
हालांकि, वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद इस दृष्टिकोण को पूरी तरह बदल दिया गया। भारत ने अपनी तरफ के सीमावर्ती इलाकों में सड़कों और सुविधाओं के निर्माण में अभूतपूर्व तेजी लाई। रिजिजू ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि वे स्वयं अंतिम सीमा बिंदु के समीप स्थित गांव तक गए हैं, जहां उन्होंने भारतीय सेना और सीमा सुरक्षा बलों के जवानों के साथ मुलाकात की और हालात का जायजा लिया। आजादी के कई दशकों बाद तक जिन सीमांत इलाकों तक पहुंचने के लिए बुनियादी सड़कें भी नहीं थीं, वहां मोदी सरकार के दौरान कनेक्टिविटी को मजबूत किया गया। विशेष रूप से ताकसिंग तक सड़क संपर्क को सुदृढ़ किया गया और वर्ष 2019 में यहां सड़क निर्माण का कार्य सफलता पूर्वक पूरा कर लिया गया।
लोंगजू क्षेत्र का ऐतिहासिक विवाद और सुरक्षा स्थिति
रिजिजू ने स्थिति को और स्पष्ट करते हुए कहा कि जब भारत की ओर पर्याप्त सड़कें उपलब्ध नहीं थीं और चीनी पक्ष ने अपने बुनियादी ढांचे को मजबूत कर लिया था, तब चीनी सेना ने ऊपरी इलाकों के कुछ स्थानों पर अपनी मौजूदगी बढ़ाई और सीमा से जुड़े ढांचे बनाए थे। परंतु इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि चीनी सेना ने भारत के वर्तमान गांवों पर कब्जा जमा लिया है। वर्तमान में इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस (आईटीबीपी) की पेट्रोलिंग व्यवस्था पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत और विस्तृत हो चुकी है।
लोंगजू से आगे स्थित घाटी वाले क्षेत्र के संबंध में केंद्रीय मंत्री ने बताया कि वहां चीनी पीएलए के कुछ ढांचे और गांव जैसी दिखाई देने वाली इमारतें बनी हुई हैं। यह पूरा क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से विवादित रहा है। भारतीय अभिलेखों के अनुसार उस जमीन पर चीन ने वर्ष 1959 में कब्जा किया था और वर्ष 1962 के संघर्ष के दौरान वहां अपनी स्थिति को और मजबूत कर लिया था। आज की तारीख में सीमा बिंदु पर भारत की भी अग्रिम चौकी मुस्तैद है और उस पूरे क्षेत्र में भारत तथा चीन के बीच आम नागरिकों की आवाजाही पूरी तरह बंद है।
सशस्त्र बलों का सम्मान और राजनीति से दूर रखने का आह्वान
संसदीय कार्य मंत्री ने राजनीतिक दलों से सशस्त्र बलों की गरिमा बनाए रखने की अपील की। उन्होंने कहा कि सेना देश की सीमाओं की निष्ठापूर्वक रक्षा करती है और उसे राजनीतिक खींचतान या विवादों में नहीं घसीटा जाना चाहिए। रिजिजू ने कांग्रेस नेताओं द्वारा सेना के वरिष्ठ अधिकारियों के लिए इस्तेमाल की गई भाषा पर गहरा ऐतराज जताया। उन्होंने कहा कि सेना के जनरल के लिए सड़क छाप जैसे अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करना अत्यंत आपत्तिजनक है। कांग्रेस के नेताओं को इस तरह की शब्दावली पर गंभीरता से विचार करना चाहिए और देश के रक्षकों के प्रति सम्मानजनक आचरण बनाए रखना चाहिए।



















