कुशाग्रहिणी अमावस्या को कुशा उखाड़ने वाली अमावस्या भी कहा जाता है और इस बार यह तिथि खास मानी जा रही है क्योंकि यह पितृपक्ष की अमावस्या से ठीक पहले पड़ रही है। इस दिन पूरे साल इस्तेमाल होने वाली कुशा को उखाड़कर घर में सहेज लिया जाता है, और इसके पीछे सदियों पुरानी विधि और नियम जुड़े हैं।
कुशा उखाड़ने की यह परंपरा क्यों मानी जाती है खास
शब्द उत्पाटिनी का मतलब उखाड़ना होता है, इसी वजह से इस अमावस्या को कुशोत्पाटिनी अमावस्या कहा जाता है। इसे कुशग्रहणी और पिठौरी अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि साल में सिर्फ इसी एक दिन विधिपूर्वक कुशा एकत्र की जा सकती है, बाकी दिनों में इसे लाने की परंपरा नहीं मानी जाती। इसलिए एक बार में जितनी कुशा जुटा ली जाती है, उसी से पूरे साल के धार्मिक कार्य पूरे किए जाते हैं। यह कुशा पितृपक्ष के तर्पण, गणपति महोत्सव, यज्ञ, हवन और संकल्प जैसे अनुष्ठानों में इस्तेमाल होती है, यानी साल भर के लगभग हर बड़े धार्मिक आयोजन में इसकी जरूरत पड़ती है। यही कारण है कि इस एक दिन को इतनी अहमियत दी जाती है।
इस साल कब मनाई जाएगी कुशाग्रहिणी अमावस्या
इस साल यह अमावस्या तिथि गुरुवार, 10 सितंबर को पड़ रही है। मान्यता के अनुसार कुशाग्रहिणी अमावस्या के लिए उस दिन चतुर्दशी तिथि का साथ होना भी जरूरी माना गया है। इसके अगले दिन यानी शुक्रवार को स्नान और दान वाली अमावस्या मनाई जाएगी, जिसमें पवित्र नदियों में स्नान करने और दान-पुण्य करने की परंपरा निभाई जाती है। इस तरह लगातार दो खास तिथियां आ रही हैं, पहले कुशा एकत्र करने वाली अमावस्या और उसके अगले ही दिन स्नान-दान वाली अमावस्या।
पितरों के तर्पण से क्यों जुड़ा है इसका महत्व
यह अमावस्या पितृपक्ष शुरू होने से ठीक पहले पड़ रही है, इसी वजह से इस बार कुशा जमा करने की परंपरा का महत्व और बढ़ गया है। मान्यता है कि पितरों का तर्पण इसी अमावस्या पर एकत्र की गई कुशा से करना चाहिए। तर्पण के दौरान पुरोहित यजमान की अनामिका अंगुली में कुशा से बनी पवित्री पहनाते हैं, यह पवित्री तर्पण की पूरी प्रक्रिया का जरूरी हिस्सा मानी जाती है। यानी अगर यह कुशा समय रहते जुटा ली जाए तो पितृपक्ष के दौरान होने वाले तर्पण और श्राद्ध कर्म बिना किसी रुकावट के पूरे किए जा सकते हैं।
कुशा उखाड़ने के नियम और मंत्र
अगर आप खुद कुशा उखाड़ने जा रहे हैं तो इसके लिए कुछ खास नियम बताए गए हैं। सूर्योदय का समय इसके लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है। मान्यता है कि कुशा को किसी औजार से काटने के बजाय हाथ से ही उखाड़ना चाहिए, और उसके अग्रभाग यानी सबसे ऊपरी हिस्से को सुरक्षित रखना चाहिए। कुशा उखाड़ते समय परंपरा में यह मंत्र बोला जाता है, विरंचिना सहोत्पन्न परमेष्ठिन्निसर्गज, नुद सर्वाणि पापानि दर्भ स्वस्तिकरो भव। मंत्र बोलने के बाद विधिपूर्वक कुशा एकत्र कर उसे किसी साफ-सुथरी जगह पर सुरक्षित रख दिया जाता है, ताकि साल भर जरूरत पड़ने पर इस्तेमाल की जा सके। हालांकि अलग-अलग परंपराओं और संप्रदायों में इस मंत्र और विधि को लेकर थोड़ा-बहुत फर्क देखने को मिल सकता है, इसलिए अपने परिवार या क्षेत्र में प्रचलित रीति का पालन करना बेहतर माना जाता है।



















