राजस्थान के पाली हाईवे पर लोक देवता बाबा रामदेवजी के प्रति लोगों की गहरी निष्ठा का एक ऐसा नजारा सामने आया है जिसने देखने वालों को अचंभित कर दिया है। जहां आमतौर पर भक्त नंगे पांव या दंडवत करते हुए मीलों का सफर तय करते हैं, वहीं सरवडी से आए खेतसिंह ने अपनी यात्रा के लिए एक अत्यंत कठिन और अनूठा तरीका चुना है। यह श्रद्धालु जमीन से करीब तीन इंच ऊपर लकड़ी के बांस के डंडों और पारंपरिक खड़ाऊ का उपयोग करके अपना संतुलन बनाए रखते हुए आगे बढ़ रहे हैं। तेज धूप और गर्म हवाओं के बीच इस तरह से शारीरिक संतुलन साधकर चलना बेहद कठिन होता है और इसे देख हर कोई हैरान है।
दस दिन की कठिन साधना और लोगों की भारी भीड़
पाली हाईवे से जब यह अनोखा पदयात्री गुजरता है तो उन्हें देखने के लिए आसपास के लोगों का तांता लग जाता है। स्थानीय नागरिक इस दृश्य को देखकर उनकी अद्भुत श्रद्धा की प्रशंसा कर रहे हैं और इसे बाबा रामदेवजी की कृपा मान रहे हैं। इस कठिन साधना को करते हुए उन्हें दस दिन का समय बीत चुका है। अपनी मनोकामना पूर्ण होने की मन्नत के कारण उन्होंने यह चुनौतीपूर्ण संकल्प उठाया था। अब यह यात्रा अपने अंतिम चरण में है और वे जल्द ही रामदेवरा धाम पहुंचकर बाबा के दरबार में अपनी हाजिरी लगाएंगे तथा अपनी मन्नत पूरी करेंगे।
भक्तों का उत्साह और पदयात्रियों का संघ
सरवड़ी से रामदेवरा धाम की तरफ बढ़ रहे पदयात्रियों के इस पूरे संघ में गजब का उत्साह और अटूट विश्वास दिखाई दे रहा है। सैकड़ों किलोमीटर लंबे इस दुर्गम मार्ग पर बिना किसी कठिनाई की परवाह किए बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएं सभी बढ़चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं। रास्ते भर खम्मा-खम्मा ओ रामापीर और बाबा के जयकारों की गूंज से पूरा माहौल भक्तिमय बना हुआ है। चिलचिलाती धूप और लंबे सफर की थकान के बावजूद इन श्रद्धालुओं के चेहरे पर ऊर्जा और उल्लास साफ देखा जा सकता है, जो इस कठिन मार्ग पर भी उन्हें लगातार आगे बढ़ने की शक्ति दे रहा है।
बाबा रामदेवजी के प्रति जन-आस्था का मूल कारण
लोक देवता बाबा रामदेवजी को पीरो के पीर के रूप में भी जाना जाता है, यही वजह है कि यहां समाज के हर वर्ग और छत्तीस कौम के लोग शीश नवाने आते हैं। करोड़ों श्रद्धालुओं के दिलों में उनके प्रति अटूट श्रद्धा का मुख्य आधार उनका सामाजिक समरसता, छुआछूत का विरोध और गरीबों की मदद का संदेश है। चौदहवीं शताब्दी में जन्मे बाबा रामदेवजी ने समाज से ऊंच-नीच, जाति-पाति और भेदभाव की दीवारों को गिराकर सभी को एक धागे में पिरोने का महान कार्य किया था। हिंदू समुदाय उन्हें भगवान विष्णु का अवतार मानता है, जबकि मुस्लिम समुदाय उन्हें रामसा पीर के रूप में श्रद्धा सुमन अर्पित करता है।
मन्नतें पूरी होने का अटूट विश्वास
श्रद्धालुओं के मन में यह पक्का विश्वास बसा हुआ है कि बाबा के दरबार में जो भी सच्चे दिल से अर्जी लगाता है, उसकी झोली कभी खाली नहीं रहती। उनकी सभी मनोकामनाएं निश्चित रूप से पूरी होती हैं। बाबा की इसी चमत्कारिक कृपा, आपसी भाईचारे और शरण में आए हर व्यक्ति की रक्षा करने वाले स्वभाव के कारण सदियों का समय बीत जाने के बाद भी उनका स्थान हर नागरिक के हृदय में सर्वोच्च बना हुआ है। उनकी यही ख्याति दूर-दूर से भक्तों को खींचकर उनके दरबार तक ले आती है।



















