भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि के अवसर पर हल षष्ठी का पावन व्रत रखा जाता है। इस विशेष पर्व को हल छठ, हर छठ, ललही छठ, चंदन छठ, कमर छठ और खमर छठ के नामों से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह व्रत भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम के जन्मोत्सव के रूप में बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। इस साल षष्ठी तिथि की शुरुआत दो सितंबर की सुबह 06:12 बजे से होने जा रही है। वहीं, इस तिथि का समापन तीन सितंबर की सुबह 04:25 बजे पर होगा। उदया तिथि की प्रामाणिक परंपरा के अनुसार, हल षष्ठी यानी हरछठ का यह पर्व दो सितंबर को ही मनाया जाएगा। इस व्रत को रखने का मुख्य उद्देश्य संतान की प्राप्ति, उनकी उत्तम सेहत और लंबी आयु की कामना करना होता है।
हल षष्ठी व्रत के शुभ मुहूर्त और योग
इस वर्ष हल षष्ठी के दिन बेहद खास और मंगलकारी योग बन रहे हैं। ज्योतिषीय गणना के मुताबिक, इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग और रवि योग का संयोग बन रहा है। सर्वार्थ सिद्धि योग की अवधि रात 01:43, तीन सितंबर से शुरू होकर उसी दिन सुबह 06:00 बजे तक रहेगी। ठीक इसी समय अवधि के दौरान यानी रात 01:43 से सुबह 06:00 बजे तक रवि योग भी प्रभावी रहेगा। इन दोनों शुभ योगों में पूजा-पाठ करना और अनुष्ठान करना बेहद फलदायी माना जाता है।
पूजा में क्या सामग्री है जरूरी
हल षष्ठी की पूजा-अर्चना के दौरान कुछ खास पूजन सामग्री का होना अनिवार्य है। इस दिन दीपक, व्रत की कथा की किताब, भैंस का दूध, शुद्ध घी, दही, गोबर, महुए का फल, विभिन्न प्रकार के फूल व पत्ते, ज्वार की धानी, ऐपन, मिट्टी के छोटे कुल्हड़, देवली छेवली, कलावा, धूप और कपूर आदि को पूजा की थाली में शामिल किया जाता है। इन सभी सामग्रियों से विधि-विधान से मां षष्ठी और भगवान बलराम की आराधना की जाती है।
पूजा की पूरी विधि और अनुष्ठान
हल षष्ठी के दिन सुबह स्नान आदि से निवृत्त होकर महिलाएं व्रत का संकल्प लेती हैं। इस दिन घर की दीवार पर गेरू, मिट्टी या फिर भैंस के गोबर से छठ माता का चित्र बनाया जाता है। इसके पश्चात भगवान गणेश और माता गौरा की षोडशोपचार पूजा की जाती है। पूजा के लिए पहले से तैयार किए गए ऐपन से चित्रों का शृंगार किया जाता है। ऐपन बनाने की विधि भी बहुत दिलचस्प है; इसके लिए पूजन हेतु रखे जाने वाले चावलों को कुछ देर के लिए पानी में भिगो दिया जाता है। पानी में भीगने के बाद उन्हें छानकर बाहर निकाला जाता है और फिर सिलबट्टे पर पीसकर उसमें हल्दी मिलाई जाती है। इस प्रकार तैयार होने वाले पीले रंग के लेप को ऐपन कहा जाता है, जिससे छठ माता के चित्र को सजाया जाता है। इसके बाद घर के आंगन या जमीन को लीप कर एक छोटा सा कृत्रिम तालाब बनाया जाता है। इस तालाब के पास झरबेरी, पलाश और कांसी के पेड़ स्थापित किए जाते हैं। व्रती महिलाएं वहीं बैठकर पूरी श्रद्धा के साथ पूजा-अर्चना करती हैं और व्रत कथा सुनती हैं।
क्या खाएं और क्या न खाएं के नियम
इस व्रत के दौरान खान-पान को लेकर बहुत कड़े और विशेष नियम बनाए गए हैं। इस पूरे दिन किसी भी प्रकार के सामान्य अनाज का सेवन करना पूरी तरह से वर्जित माना गया है। महिलाएं इस दिन खेतों में उगे हुए या फिर हल से जोते गए किसी भी प्रकार के अनाज या सब्जियों का सेवन नहीं करती हैं। पूजन और कथा संपन्न होने के बाद व्रत रखने वाली महिलाएं केवल वही चीजें खाती हैं जो जमीन जोते बिना प्राकृतिक रूप से पैदा होती हैं। इस दिन विशेष रूप से तालाब में पैदा होने वाले तिन्नी के चावल, करेमुआ का साग और पसई के चावल का ही सेवन किया जाता है।
भगवान बलराम और हल षष्ठी का धार्मिक महत्व
भगवान बलराम का प्रमुख शस्त्र हल और मूसल है, यही कारण है कि उन्हें हलधर के नाम से भी पुकारा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्री बलराम जी को भगवान शेषनाग का अवतार माना जाता है। वह गदा युद्ध में अत्यंत प्रवीण और निपुण थे, और कौरव सेना के प्रमुख योद्धा दुर्योधन उनके ही प्रमुख शिष्य हुआ करते थे। हल षष्ठी के इस पावन दिन हल का पूजन करने का विशेष महत्व बताया गया है। देश के पूर्वी जिलों में इस पर्व को बहुत आदर के साथ 'ललई छठ' के रूप में भी मनाया जाता है, जहां माताएं अपनी संतान के सुखी जीवन की प्रार्थना करती हैं।



















