वैदिक ज्योतिष में प्रेम, सौंदर्य, आकर्षण और भौतिक सुख-सुविधाओं के कारक ग्रह शुक्र इस समय अपनी स्वराशि तुला में वक्री अवस्था में गोचर कर रहे हैं। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, शुक्र जब भी अपनी ही राशि में उल्टी चाल चलते हैं, तो इसका सीधा प्रभाव मानवीय संबंधों, प्रेम जीवन और दांपत्य पर देखने को मिलता है। यह वक्री अवस्था केवल तुला तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि शुक्र आगे चलकर कन्या राशि में प्रवेश करेंगे और 14 नवंबर तक इसी तरह वक्री चाल में ही रहेंगे। इसके साथ ही करवाचौथ के त्योहार के आस-पास शुक्र के अस्त और उदय होने का गणित भी बना हुआ है।
सूर्य के सानिध्य से शुक्र का अस्त होना और 28 अक्टूबर का उदय
इन दिनों खगोलीय और ज्योतिषीय स्थिति ऐसी बनी हुई है कि सूर्य, बुध और शुक्र तीनों ग्रह एक-दूसरे के बेहद करीब आ चुके हैं। जब भी कोई ग्रह सूर्य के अत्यधिक निकट पहुंचता है, तो सूर्य के तेज प्रभाव के कारण वह अस्त हो जाता है। शुक्र ग्रह भी सूर्य के सन्निकट आने के कारण वर्तमान में अस्त चल रहे हैं। ज्योतिषीय गणना के अनुसार ऐसी खगोलीय स्थिति अमूमन हर दो से तीन महीने के अंतराल पर बनती रहती है।
शुक्र के अस्त होने के बीच राहत की बात यह है कि करवाचौथ से ठीक एक दिन पहले यानी 28 अक्टूबर को शुक्र ग्रह पूर्व या पश्चिम दिशा में उदय हो जाएंगे। कई लोगों के मन में यह संशय बना रहता है कि क्या शुक्र के अस्त होने से करवाचौथ के व्रत अथवा पूजन पर कोई नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। ज्योतिषीय नियमों के अनुसार शुक्र के अस्त या उदय रहने से करवाचौथ की पारंपरिक पूजा, व्रत विधान और अर्घ्य देने की परंपरा पर कोई भी असर नहीं पड़ता है, इसलिए श्रद्धालु पूरी निष्ठा के साथ इस पर्व का अनुष्ठान कर सकते हैं।
वक्री शुक्र के दौर में रिश्तों में सामने आ सकती हैं ये चार परिस्थितियां
जब शुक्र जैसा सौम्य और प्रेम का कारक ग्रह वक्री होता है, तो वैवाहिक और प्रेम संबंधों में कई तरह के मनोवैज्ञानिक और व्यावहारिक बदलाव देखने को मिलते हैं। इस समयावधि में मुख्य रूप से चार प्रकार की स्थितियों का सामना करना पड़ सकता है
- पुराने विवादों का दोबारा उभरना: वक्री शुक्र के प्रभाव से बीते समय के अनसुलझे मुद्दे और पुरानी लड़ाइयां अचानक फिर से सिर उठा सकती हैं। यदि पार्टनर के साथ पूर्व में किसी बात को लेकर तकरार हुई थी, तो वही विषय दोबारा चर्चा में आकर मनमुटाव का कारण बन सकता है। इससे मन आहत होने या मानसिक तनाव बढ़ने की आशंका बनी रहती है।
- छोटी बातों का गलत अर्थ निकालना: इस दौरान ऐसी मानसिक स्थिति उत्पन्न हो सकती है जहां व्यक्ति सामान्य और गैर-जरूरी बातों का भी गलत मतलब निकालने लगता है। एक साधारण सी असहमति या छोटी बहस भी बड़ा रूप धारण कर सकती है। इस समय बिना सोचे-समझे किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से बचना चाहिए और साथी के साथ सीधे संवाद कर भ्रम दूर करना चाहिए।
- अतीत की स्मृतियां और पुराने रिश्तों की वापसी: वक्री गति के कालखंड में अतीत का कोई भूला-बिसरा रिश्ता, अधूरा संपर्क या पुरानी यादें अचानक सामने आ सकती हैं। यदि ऐसी परिस्थिति बने, तो भावुकता या पुरानी यादों में बहकर जीवन का कोई बड़ा और अपरिवर्तनीय फैसला लेने से बचना आवश्यक होता है। वर्तमान परिस्थितियों को गहराई से तौलकर ही कदम उठाना हितकर रहता है।
- आक्रोश और कटु वाणी से दूरियां बढ़ना: इस गोचर काल में भावनाएं उग्र हो सकती हैं और अचानक क्रोध भड़क सकता है। यदि गुस्से में आकर अनुचित या कड़वे शब्द बोल दिए जाएं, तो इससे जीवनसाथी या प्रेमी के साथ दूरियां और अधिक बढ़ सकती हैं। किसी भी उत्तेजक बात पर तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय शांति से विचार करना बहुत आवश्यक है।
रिश्तों में सामंजस्य बनाए रखने के लिए चार महत्वपूर्ण सावधानियां
वक्री शुक्र के प्रभाव के दौरान वैवाहिक जीवन में मधुरता और संतुलन बनाए रखने के लिए कुछ खास व्यावहारिक नियमों का पालन करना लाभकारी सिद्ध होता है
- क्रोध पर नियंत्रण और मौन का सहारा: यदि साथी की कोई बात बुरी लगती है या उससे मन आहत होता है, तो तत्काल पलटकर जवाब देने से बचें। अपने गुस्से पर काबू रखें और उस क्षण मौन रहना ही सबसे बेहतर उपाय साबित होता है।
- सुलझे हुए मुद्दों को दोबारा न कुरेदना: अतीत की जिन बातों का समाधान पहले ही निकाला जा चुका है, उन्हें बार-बार बातचीत में दोहराने की आदत से बचें। पुरानी बातों को बार-बार उछालने से वर्तमान का माहौल भी दूषित हो जाता है।
- अलग होने या संबंध विच्छेद में जल्दबाजी न करना: यदि किसी बात पर गंभीर असहमति या मतभेद उत्पन्न हो जाएं, तो रिश्ते को खत्म करने अथवा कोई अंतिम निर्णय लेने में तनिक भी उतावली न दिखाएं। समय बीतने के साथ ग्रह स्थितियां बदलती हैं, इसलिए विचार-मंथन के लिए पर्याप्त समय लें।
- पार्टनर की बात को ध्यानपूर्वक सुनना: किसी भी गलतफहमी को सुलझाने का सबसे सरल मार्ग खुला संवाद है। अपने विचार थोपने के बजाय साथी का पक्ष भी पूरी संवेदनशीलता से सुनें, जिससे उलझी हुई बातें बिना किसी विवाद के आसानी से सुलझ सकती हैं।























