बॉम्बे हाईकोर्ट ने पुणे में रहने वाली इंजीनियरिंग छात्रा खदीजा शहाबुद्दीन शेख के खिलाफ दर्ज आपराधिक एफआईआर को पूरी तरह से रद्द कर दिया है। छात्रा पर सोशल मीडिया मंच इंस्टाग्राम पर 'ऑपरेशन सिंदूर' से संबंधित एक विवादास्पद पोस्ट को दोबारा शेयर करने का आरोप लगाया गया था। मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी सोशल मीडिया सामग्री से किसी वर्ग में नाराजगी या असंतोष पैदा होने की आशंका मात्र से किसी व्यक्ति पर आपराधिक मुकदमा चलाना कानूनन उचित नहीं है। किसी भी व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए संबंधित कानून में तय किए गए अपराध के आवश्यक तत्वों का मौजूद होना बेहद जरूरी है।
घटनाक्रम और पुलिस की कार्रवाई
यह मामला पुणे शहर के कोंढवा पुलिस थाने से जुड़ा हुआ है। 7 मई 2025 को गश्त के दौरान एक पुलिस हवलदार ने इंटरनेट पर एक पोस्ट देखी, जो भारत और पाकिस्तान के बीच चल रहे तनाव तथा युद्ध के विषयों से संबंधित थी। पुलिस का मानना था कि इस पोस्ट की सामग्री से धार्मिक भावनाएं आहत हो सकती हैं और विभिन्न समुदायों के बीच आपसी सौहार्द बिगड़ सकता है। इस आशंका के आधार पर कोंढवा पुलिस थाने में 9 मई 2025 को खदीजा शहाबुद्दीन शेख के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया गया था। पुलिस कार्रवाई के बाद छात्रा ने अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द कराने के लिए बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।
बचाव पक्ष और राज्य सरकार की दलीलें
अदालत में सुनवाई के दौरान छात्रा के वकील ने बताया कि खदीजा इस पोस्ट की मूल रचयिता नहीं थी। उसने किसी अन्य उपयोगकर्ता द्वारा तैयार की गई सामग्री को केवल अपने इंस्टाग्राम खाते पर दोबारा साझा किया था। वकील ने अदालत को जानकारी दी कि छात्रा ने स्थिति की संवेदनशीलता को समझते हुए उसी दिन लगभग 2 घंटे के भीतर उस पोस्ट को अपने खाते से हटा दिया था। इसके साथ ही उसने सार्वजनिक रूप से खेद व्यक्त करते हुए माफी भी मांग ली थी। बचाव पक्ष ने कहा कि एफआईआर में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जो यह साबित करे कि छात्रा का उद्देश्य धार्मिक वैमनस्य फैलाना या सामाजिक तनाव पैदा करना था। उसने पहले कभी किसी आपराधिक मामले का सामना नहीं किया था और कानूनी प्रक्रिया जारी रहने से उसके शैक्षणिक करियर पर बुरा असर पड़ता।
दूसरी तरफ, राज्य सरकार की ओर से पेश हुए सरकारी वकील अमित पालकर ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि भले ही पोस्ट किसी अन्य व्यक्ति की हो, लेकिन उसे सोशल मीडिया पर दोबारा शेयर करने से उसकी पहुंच बढ़ती है और इससे धार्मिक भावनाएं आहत हो सकती हैं। सरकारी पक्ष का कहना था कि पोस्ट हटा लेने या बाद में माफी मांग लेने से कानून के तहत आपराधिक जवाबदेही अपने आप समाप्त नहीं हो जाती है।
बॉम्बे हाईकोर्ट का अंतिम फैसला और टिप्पणियां
जस्टिस मिलिंद एन. जाधव की एकल पीठ ने 27 अक्टूबर को इस मामले पर अपना फैसला सुनाया। पीठ ने दोनों पक्षों की विस्तृत बहस सुनने के बाद माना कि पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर में ऐसी पर्याप्त सामग्री नहीं है जो भारतीय न्याय संहिता (BNS) की संबंधित धाराओं के तहत अपराध के वैधानिक तत्वों को पूरा करती हो। अदालत ने ध्यान दिलाया कि इस पोस्ट के शेयर होने के बाद क्षेत्र में सांप्रदायिक तनाव या किसी अप्रिय घटना की कोई वास्तविक रिपोर्ट सामने नहीं आई थी।
न्यायाधीश ने अपने आदेश में कहा कि छात्रा ने पोस्ट को तुरंत हटा दिया था और उसे बार-बार प्रसारित करने की कोई कोशिश नहीं की थी। रिकॉर्ड पर ऐसी कोई सामग्री नहीं है जिससे यह संकेत मिले कि यह धार्मिक विद्वेष फैलाने का कोई पूर्व-नियोजित प्रयास था। छात्रा की कम उम्र और उसके भविष्य को ध्यान में रखते हुए अदालत ने टिप्पणी की कि युवावस्था में हुई किसी अनजाने भूल को आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता। जस्टिस मिलिंद एन. जाधव ने कहा कि न्याय प्रणाली और मुकदमों का मुख्य उद्देश्य सुधार होना चाहिए, केवल सजा देना नहीं। छात्रा पहले ही कुछ समय हिरासत में बिता चुकी थी, इसलिए अदालत ने उसकी याचिका स्वीकार करते हुए कोंढवा पुलिस थाने में दर्ज एफआईआर को रद्द करने का आदेश दे दिया।
























