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भारत में क्यों उठती रही है अमेरिकी राष्ट्रपति प्रणाली अपनाने की मांग और क्या था इंदिरा गांधी से आडवाणी तक का रुखराजनीति
28 अक्तू॰ 2026, 12:25 am (6 घंटे पहले)· 2

भारत में क्यों उठती रही है अमेरिकी राष्ट्रपति प्रणाली अपनाने की मांग और क्या था इंदिरा गांधी से आडवाणी तक का रुख

भारत के संविधान निर्माताओं ने वेस्टमिंस्टर संसदीय मॉडल को चुना था, लेकिन राजनीतिक स्थिरता की तलाश में इंदिरा गांधी के दौर से लेकर लालकृष्ण आडवाणी के समय तक अमेरिकी राष्ट्रपति प्रणाली अपनाने पर बहस होती रही है।

भारत के संविधान निर्माताओं ने देश की सामाजिक विविधता और व्यापक प्रतिनिधित्व की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए ब्रिटेन के वेस्टमिंस्टर मॉडल पर आधारित संसदीय शासन प्रणाली को अपनाया था। इसके बावजूद, देश के राजनीतिक इतिहास में कई ऐसे मोड़ आए हैं जब अमेरिकी तर्ज पर राष्ट्रपति शासन प्रणाली लागू करने पर गंभीर विमर्श हुआ है। अमेरिका में 3 नवंबर को होने वाले मध्यावधि चुनावों में प्रतिनिधि सभा की सभी 435 सीटों और सीनेट की 100 में से 35 सीटों के लिए होने वाली वोटिंग पूरी दुनिया का ध्यान खींचती है, क्योंकि इसी से तय होता है कि वहां के राष्ट्रपति कितने प्रभावी ढंग से सरकार चला पाएंगे। भारत में भी जब भी राजनीतिक अस्थिरता का माहौल बना, तब सत्ता प्रतिष्ठान से जुड़े नेताओं से लेकर कानूनी विशेषज्ञों तक ने राष्ट्रपति प्रणाली के गुण-दोषों की समीक्षा करने पर जोर दिया।

इंदिरा गांधी का दौर और 1980 का चर्चित प्रस्ताव

संसदीय व्यवस्था की कार्यप्रणाली और इसकी प्रभावशीलता पर पहला बड़ा सवाल 1980 के आखिरी महीनों में सत्तारूढ़ कांग्रेस (आई) के शासनकाल के दौरान उठाया गया था। अक्टूबर 1980 में आयोजित ऑल इंडिया लॉयर्स कॉन्फ्रेंस में सत्ता के करीबी वकीलों ने देश में राष्ट्रपति शासन प्रणाली लागू करने पर एक कथित राष्ट्रीय बहस की शुरुआत की। यद्यपि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इस संवेदनशील मुद्दे पर खुलकर कोई भी बयान देने से परहेज किया, लेकिन तत्कालीन कानून मंत्री शिवशंकर ने संसद में यह औपचारिक सफाई दी थी कि मौजूदा संसदीय व्यवस्था की तुलना में राष्ट्रपति प्रणाली अधिक उपयुक्त होगी या नहीं, इस पर सरकार के स्तर पर किसी विचार का प्रस्ताव नहीं है।

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इसके बावजूद तत्कालीन राजनीतिक विश्लेषकों का स्पष्ट मानना था कि वेस्टमिंस्टर संसदीय मॉडल को सवालों के घेरे में खड़ा करने की इस पूरी योजना को प्रधानमंत्री का मौन समर्थन प्राप्त था। इसी रणनीति के तहत पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने यह सुनिश्चित किया कि यह विषय चर्चा का केंद्र बना रहे। इसके परिणामस्वरूप दिसंबर 1980 में राजधानी दिल्ली में हुए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सम्मेलन में राष्ट्रपति शासन प्रणाली की खुलकर वकालत की गई।

उस समय महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री ए.आर. अंतुले इस व्यवस्था के सबसे प्रखर समर्थक बनकर उभरे थे। इसके अलावा जाने-माने संविधान विशेषज्ञ नानी पालखीवाला ने भी राष्ट्रपति प्रणाली के पक्ष में अपनी सहमति व्यक्त की, जिससे यह पूरा मामला महज एक राजनीतिक बयानबाजी से ऊपर उठकर एक गंभीर संवैधानिक परिचर्चा का रूप ले सका। नानी पालखीवाला को कांग्रेस पार्टी का समर्थक नहीं माना जाता था, इसलिए उनके द्वारा इस विचार का समर्थन किए जाने से राजनीतिक हलकों में इस बहस को काफी बल मिला।

1998 में लालकृष्ण आडवाणी और भाजपा में शुरू हुई बहस

राष्ट्रपति शासन प्रणाली के प्रति झुकाव केवल कांग्रेस पार्टी के गलियारों तक सीमित नहीं था। वैचारिक रूप से कांग्रेस के विपरीत ध्रुव पर खड़ी रहने वाली भारतीय जनता पार्टी में भी इस शासन मॉडल की उपयोगिता पर विचार-विमर्श हुआ था। इसकी शुरुआत भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने की थी, जब उनकी राय को व्यावहारिक रूप से पूरी पार्टी का आधिकारिक रुख माना जाता था।

अप्रैल 1998 में एक सार्वजनिक भाषण के दौरान तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने भारतीय संविधान की व्यापक समीक्षा करने और राष्ट्रपति शासन प्रणाली के गुण-दोषों का मूल्यांकन करने का विचार सामने रखा। यह वह समय था जब देश में गठबंधन सरकारों के जल्दी गिरने और राजनीतिक अवसरवाद के कारण वेस्टमिंस्टर मॉडल की स्थिरता पर सवाल खड़े हो रहे थे। आडवाणी के इस बयान से देश भर में यह बहस तेज हो गई कि क्या राष्ट्रपति शासन प्रणाली भारत में राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित करने का बेहतर विकल्प साबित हो सकती है। हालांकि बाद में एक निजी टीवी चैनल को दिए साक्षात्कार में लालकृष्ण आडवाणी ने स्पष्ट किया कि वे सीधे तौर पर राष्ट्रपति प्रणाली लागू करने की सिफारिश नहीं कर रहे थे, बल्कि उनका मानना था कि दोनों ही शासन व्यवस्थाओं की अपनी ताकत और कुछ सीमाएं हैं।

आडवाणी की इस टिप्पणी पर देश के प्रमुख राजनीतिक दलों की ओर से उनकी पार्टीगत प्राथमिकताओं के हिसाब से तीखी प्रतिक्रियाएं आईं। भाजपा के भीतर जहां अपने नेता के तर्कों का समर्थन किया गया, वहीं कांग्रेस और संयुक्त मोर्चा के नेताओं ने इस विचार को देश पर तानाशाही व्यवस्था थोपने की एक सोची-समझी साजिश करार दिया था।

जनता की राय: सर्वेक्षण के आंकड़े क्या कहते हैं

मौजूदा शासन व्यवस्था को बदलकर राष्ट्रपति प्रणाली लागू करने के मुद्दे पर आम भारतीय नागरिकों की सोच क्या थी, इसको मापने के लिए उस दौर में आईएमआरबी द्वारा एक व्यापक राष्ट्रीय सर्वेक्षण किया गया था। इस सर्वे में लोगों से सीधा प्रश्न पूछा गया था कि क्या वे मानते हैं कि भारत के लिए राष्ट्रपति शासन प्रणाली अधिक उपयुक्त और लाभकारी सिद्ध होगी।

सर्वेक्षण से प्राप्त आंकड़ों से पता चला कि देश का एक बड़ा वर्ग इस तरह के बुनियादी बदलाव के पक्ष में नहीं था। सर्वे में शामिल कुल उत्तरदाताओं में से केवल 27 प्रतिशत लोगों ने माना कि राष्ट्रपति प्रणाली भारत के लिए बेहतर विकल्प होगी। इसके विपरीत 49 प्रतिशत लोगों ने इस बदलाव को पूरी तरह से नकारते हुए स्पष्ट रूप से 'नहीं' में उत्तर दिया। वहीं लगभग 23 प्रतिशत लोग इस विषय पर किसी निश्चित निर्णय पर नहीं पहुंच सके थे और असमंजस की स्थिति में थे। इन आंकड़ों से साफ जाहिर हुआ कि शीर्ष राजनीतिक विमर्श के बावजूद बहुसंख्यक जनता देश में संसदीय लोकतंत्र के पक्ष में ही खड़ी थी।

सवाल-जवाब

भारत में राष्ट्रपति शासन प्रणाली पर प्रमुख बहस कब शुरू हुई थी?
अक्टूबर 1980 में ऑल इंडिया लॉयर्स कॉन्फ्रेंस के दौरान इस मुद्दे पर देशव्यापी बहस की शुरुआत हुई थी।
1980 में किस नेता ने राष्ट्रपति प्रणाली का सबसे खुलकर समर्थन किया था?
महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री ए.आर. अंतुले ने दिसंबर 1980 के दिल्ली AICC अधिवेशन में राष्ट्रपति प्रणाली का खुलकर समर्थन किया था।
लालकृष्ण आडवाणी ने संविधान समीक्षा का सुझाव किस वर्ष दिया था?
लालकृष्ण आडवाणी ने अप्रैल 1998 में एक व्याख्यान के दौरान संविधान समीक्षा और राष्ट्रपति प्रणाली के गुण-दोषों पर चर्चा का सुझाव दिया था।
आईएमआरबी (IMRB) सर्वे के अनुसार कितने प्रतिशत लोगों ने राष्ट्रपति प्रणाली का विरोध किया था?
सर्वेक्षण में शामिल 49 प्रतिशत लोगों ने राष्ट्रपति प्रणाली लागू करने का स्पष्ट रूप से विरोध किया था।
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टिप्पणियाँ 5

Sophie Laurent@sophie-laurent·3 घंटे पहले

यूरोप में भी जब राजनीतिक अस्थिरता आती है, तो अक्सर शासन प्रणाली बदलने पर ऐसी ही बहसें छिड़ जाती हैं।

Ravikash Gupta@ravikash·4 घंटे पहले

अस्सी के दशक में जब ये बहस छिड़ी थी, तब मेरे ताऊजी अक्सर कहा करते थे कि हमारे यहाँ का चुनाव और अमेरिका का राष्ट्रपति चुनना बिल्कुल अलग चीज़ है।

Dr. Aditya Sharma@aditya-sharma·4 घंटे पहले

रविकेश जी, ताऊजी बिल्कुल ठीक कहते थे। हमारे ग्रहों और नक्षत्रों की चाल की तरह शासन की अपनी व्यवस्था होती है, जिसे बदलना आसान नहीं।

Rohan Verma@rohan-verma·4 घंटे पहले

अंतुले साहब का नाम पढ़कर पुरानी राजनीति याद आ गई। तब भी नेताओं को लगता था कि एक आदमी के हाथ में ताकत देने से सारे पचड़े खत्म हो जाएंगे।

Karan Malhotra@karan-malhotra·4 घंटे पहले

रोहन जी, बिल्कुल सही कहा। जब मैं शुरुआती दिनों में कोर्ट कवर करता था, तब वकीलों के बीच इस बहस पर खूब चर्चा होती थी कि अकेले के हाथ में कमान हो तो फैसले जल्दी आएं।

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