राजस्थान के भीलवाड़ा जिले में बरसात के मौसम के बीच दलहनी फसलों पर गंभीर संकट मंडरा रहा है। जिले के कई क्षेत्रों में मूंग और उड़द की बुवाई करने वाले किसान एक संक्रामक बीमारी के फैलाव से बेहद चिंतित हैं। फसलों में तेजी से फैल रहे पीला मोजेक, जिसे स्थानीय भाषा में पीलिया रोग भी कहा जाता है, ने कई खेतों को अपनी चपेट में ले लिया है। अगर समय पर ध्यान न दिया गया तो यह बीमारी पूरी फसल को तबाह कर सकती है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यह रोग पौधों के स्वाभाविक विकास को पूरी तरह बाधित कर देता है और दाने बनने की प्रक्रिया को रोक देता है, जिससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
50 से 60 प्रतिशत तक फसल प्रभावित और बीमारी के प्रमुख लक्षण
भीलवाड़ा जिले के कई इलाकों में इस बीमारी का असर काफी व्यापक देखा जा रहा है, जहां खेतों में 50 से 60 प्रतिशत तक फसल पूरी तरह प्रभावित हो चुकी है। पीला मोजेक रोग की पहचान बहुत शुरुआती चरण में पत्तियों के रंग से की जा सकती है। इस बीमारी का पहला लक्षण पौधों की हरी पत्तियों पर दिखाई देता है। शुरुआती दौर में पत्तियों की सतह पर पीले और हरे रंग के धब्बे उभरने लगते हैं। समय बीतने के साथ यह पीलापन पूरी पत्ती पर छा जाता है और पत्ती का प्राकृतिक हरा रंग पूरी तरह बदल जाता है।
जब पत्तियां हरी नहीं रहतीं तो पौधे में भोजन बनाने की क्षमता कमजोर पड़ जाती है। इसके परिणामस्वरूप पौधे का विकास रुक जाता है और पौधा बौना ही रह जाता है। संक्रमण ज्यादा गहराने पर पौधों में फूल आने और फलियां बनने की प्रक्रिया बुरी तरह प्रभावित होती है या पूरी तरह बंद हो जाती है। फलियां न बनने या कम बनने से दानों का उत्पादन गिर जाता है, जिसका सीधा प्रतिकूल असर कुल कृषि पैदावार पर पड़ता है। यही वजह है कि किसानों को अपने खेतों की नियमित देखरेख करने की सलाह दी गई है।
सफेद मक्खी का प्रकोप और खरपतवार की भूमिका
कृषि विभाग के अधिकारी कजोड़ मल गुर्जर के अनुसार, मानसून के इस मौसम में फसलों पर जैविक खतरों का जोखिम काफी बढ़ जाता है। इस रोग को एक खेत से दूसरे खेत और एक पौधे से दूसरे पौधे तक फैलाने में सफेद मक्खी की सबसे प्रमुख भूमिका होती है। सफेद मक्खी एक संक्रामक वाहक के रूप में कार्य करती है, जो रोगग्रस्त पौधे का रस चूसने के बाद स्वस्थ पौधों पर बैठकर वायरस पहुंचा देती है। इसलिए पीलिया रोग की रोकथाम के लिए सफेद मक्खी के फैलाव को नियंत्रित करना सबसे प्राथमिक कदम है।
इसके अलावा खेतों में मौजूद अनावश्यक खरपतवार भी इस संकट को और बढ़ा देते हैं। खरपतवार सफेद मक्खी के साथ-साथ अन्य हानिकारक कीटों और बीमारियों के लिए सुरक्षित पनाहगाह का काम करते हैं। खरपतवार की मौजूदगी में ये कीट तेजी से पनपते हैं और फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं। इसलिए खेतों को पूरी तरह खरपतवार मुक्त रखना बेहद आवश्यक है ताकि कीटों का आश्रय स्थल खत्म किया जा सके।
फसल सुरक्षा के लिए कृषि विभाग की जरूरी सलाह
किसानों को फसल के नुकसान से बचाने के लिए कृषि विभाग ने स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए हैं। अधिकारी कजोड़ मल गुर्जर ने सलाह दी है कि किसान अपने मूंग और उड़द के खेतों का रोजाना या नियमित अंतराल पर ध्यानपूर्वक निरीक्षण करें। यदि किसी पौधे की पत्तियों पर असामान्य पीलापन, पीले-हरे धब्बे या बढ़त रुकने जैसे लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत उस प्रभावित पौधे को जड़ से उखाड़कर खेत से दूर ले जाकर नष्ट कर देना चाहिए। ऐसा करने से रोगजनक वायरस को स्वस्थ पौधों तक फैलने से रोका जा सकता है।
इसके साथ ही, सफेद मक्खी के प्रभावी नियंत्रण के लिए कृषि विभाग द्वारा अनुशंसित कीटनाशकों का सही मात्रा में छिड़काव करना जरूरी है। यदि खेत में बीमारी के लक्षण शुरुआती नियंत्रण के बाद भी बढ़ते हुए दिखें, तो किसानों को बिना देरी किए अपने नजदीकी कृषि विभाग के अधिकारियों या विशेषज्ञों से संपर्क कर तकनीकी मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहिए।





















