बिहार के बेगूसराय जिले से एक ऐसा हैरान करने वाला प्रशासनिक मामला सामने आया है, जिसने शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यहाँ की एक समर्पित प्रधानाध्यापिका, जिन्होंने अपने स्कूल को शिक्षा का रोल मॉडल बनाने के लिए दिन-रात एक कर दिया था, उनके निधन के कई दिनों बाद विभाग की तरफ से स्पष्टीकरण का एक पत्र जारी किया गया। इस घटना ने न केवल शोक संतप्त परिवार को बल्कि पूरे इलाके के शिक्षकों और ग्रामीणों को गहरे सदमे में डाल दिया है। सरकारी फाइलों में दर्ज होने वाली लापरवाह व्यवस्था का यह नमूना अब हर तरफ चर्चा का विषय बना हुआ है.
प्रखंड के टॉप स्कूल की कमान संभालने वाली शिक्षिका
पंचमुखी देवी नाम की इस प्रधानाध्यापिका का सपना अपने सरकारी स्कूल को क्षेत्र का सबसे बेहतरीन शिक्षण संस्थान बनाने का था। उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत और लगन के बल पर प्रखंड के एक साधारण सरकारी स्कूल को शीर्ष श्रेणी में ला खड़ा किया था। उनके इस सराहनीय प्रयास की चर्चा पूरे जिले में होने लगी थी। अंग्रेजों के जमाने के इस पुराने स्कूल को उन्होंने अपनी मेहनत से निजी विद्यालयों की टक्कर में ला खड़ा किया था। लेकिन बच्चों को पढ़ाने के दौरान अचानक उनकी तबीयत बिगड़ गई और लंबे इलाज के बाद उन्होंने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया.
बीमारी और इलाज के दौरान विभाग को दी गई थी सूचना
पंचमुखी देवी के इकलौते बेटे आलोक कुमार ने बताया कि उनकी मां स्कूल में शिक्षण कार्य के दौरान ही बीमार पड़ी थीं। उनके निधन से करीब एक महीने पहले ही विद्यालय के माध्यम से विभाग को उनकी खराब सेहत के बारे में लिखित रूप से सूचित कर दिया गया था। इसके बाद उनकी स्थिति अधिक गंभीर होने पर उन्हें बेहतर इलाज के लिए दरभंगा ले जाया गया, जहाँ एक महीने तक उनका अस्पताल में लगातार इलाज चला। अस्पताल में भर्ती रहने की जानकारी भी विधिवत रूप से स्कूल के जरिए शिक्षा विभाग तक पहुँचाई गई थी। परिवार के अनुसार, इलाज के बाद जब वह घर लौटीं, तो उसके महज एक या दो दिन बाद ही उनका निधन हो गया.
निधन के बाद घर पहुँचा स्पष्टीकरण का अजीबो-गरीब पत्र
पंचमुखी देवी के पति इंद्र भूषण प्रसाद ने बताया कि उनकी पत्नी के बीमार होने की आधिकारिक सूचना पहले ही विद्यालय प्रबंधन को दे दी गई थी। इसके बावजूद, उनके निधन के लगभग बीस से पच्चीस दिन बाद विभाग की तरफ से एक आधिकारिक पत्र उनके घर पहुँचा। इस पत्र में उन्हें सेवाकालीन प्रशिक्षण में अनुपस्थित रहने का दोषी मानते हुए चौबीस घंटे के भीतर साक्ष्य सहित अपना जवाब पेश करने का कड़ा आदेश दिया गया था। इस अंसवेदनशील और लापरवाह आदेश को देखकर पूरा परिवार और ग्रामीण सन्न रह गए, क्योंकि जिस शिक्षिका का देहांत हो चुका है, उससे जवाब माँगा जा रहा था.
शिक्षकों और स्थानीय संघ में गहरी नाराजगी
प्रखंड शिक्षक संघ के अध्यक्ष राजेश कुमार ने इस पूरे घटनाक्रम पर दुख जताते हुए कहा कि मृत शिक्षिका के निधन की पूरी जानकारी समय पर विभाग को दे दी गई थी। उन्होंने बताया कि किसी सेवारत शिक्षक की मृत्यु के बाद इस प्रकार का नोटिस जारी होना शिक्षकों के लिए बेहद अपमानजनक और दुखद है। उनके मुताबिक, निधन के तुरंत बाद शिक्षक संघ की ओर से पंचमुखी देवी को श्रद्धांजलि भी अर्पित की गई थी। संघ का यह भी आरोप है कि सेवाकाल के दौरान निधन होने के बावजूद पीड़ित परिवार को विभाग की तरफ से किसी भी प्रकार की आर्थिक सहायता या मदद नहीं मिल पाई है.
अभिभावकों और स्कूल कमेटी की यादें
स्थानीय अभिभावक सुरेश महतो ने बताया कि पंचमुखी देवी एक अत्यंत कर्तव्यनिष्ठ और ऊर्जावान प्रधानाध्यापिका थीं। उन्होंने अपनी मेहनत के बूते पर गाँव के उस पुराने स्कूल को इस मुकाम पर पहुँचाया था कि आज वह बड़े-बड़े प्राइवेट स्कूलों को मात दे रहा था। ऐसी शानदार शिक्षिका के अचानक चले जाने से पूरे अभिभावक वर्ग और ग्रामीणों में गहरा शोक है। विद्यालय कमेटी की सदस्य रीता देवी ने भी उनके योगदान को याद करते हुए कहा कि वे हमेशा स्कूल के समग्र विकास को लेकर चिंतित रहती थीं और कमेटी के साथ मिलकर हमेशा बेहतरी के लिए योजनाएँ बनाती थीं.
जिला कार्यक्रम प्राधिकारी की तरफ से जारी हुआ था आदेश
प्राप्त जानकारी और दस्तावेजों के मुताबिक, यह विवादित पत्र जिला कार्यक्रम प्राधिकारी, सर्व शिक्षा अभियान, बेगूसराय की ओर से 22 सितंबर को जारी किया गया था। इस पत्र में यह उल्लेख किया गया था कि पूर्व में जारी किए गए विभागीय निर्देशों के बावजूद प्रधानाध्यापिका ने अनिवार्य सेवाकालीन प्रशिक्षण में हिस्सा नहीं लिया था। पत्र में आदेश की अवहेलना, कर्तव्यहीनता और अनुशासनहीनता जैसे गंभीर शब्दों का इस्तेमाल करते हुए महज चौबीस घंटों के भीतर साक्ष्य के साथ स्पष्टीकरण देने की माँग की गई थी, जबकि सच्चाई यह थी कि शिक्षिका इस दुनिया में नहीं थीं.



















