हिमाचल प्रदेश के सरकारी तंत्र में आउटसोर्स व्यवस्था के तहत अपनी सेवाएं दे रहे कर्मियों की आजीविका पर एक बार फिर गंभीर अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं। जल शक्ति विभाग के विभिन्न प्रशासनिक और फील्ड दफ्तरों में लंबे समय से काम कर रहे लगभग 400 डेटा एंट्री ऑपरेटरों की सेवाएं 30 सितंबर के बाद समाप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी हैं। इस व्यवस्था का संचालन कर रहे राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान यानी नाईलिट शिमला ने विभाग को एक औपचारिक पत्र प्रेषित कर स्थिति को पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है कि मौजूदा अनुबंध की अवधि 30 सितंबर 2026 को पूरी हो रही है।
नाईलिट का औपचारिक पत्र और वेतन भुगतान की शर्त
संस्थान द्वारा जल शक्ति विभाग के इंजीनियर-इन-चीफ को भेजे गए पत्राचार में साफ तौर पर आगाह किया गया है कि यदि अनुबंध की अवधि में आधिकारिक विस्तार नहीं होता है, तो कर्मचारी विभाग के कार्यालयों में कार्य जारी रखने के हकदार नहीं होंगे। एजेंसी ने कड़े शब्दों में स्पष्ट किया है कि 30 सितंबर 2026 के बाद यदि कोई भी कर्मी बिना किसी वैध एवं औपचारिक एक्सटेंशन के अपने दफ्तर या कार्यस्थल पर सेवाएं देता पाया जाता है, तो उसके वेतन अथवा अन्य किसी भी प्रकार की वित्तीय देनदारियों की जिम्मेदारी एजेंसी की बिल्कुल नहीं होगी। संस्थान ने यह भी रेखांकित किया है कि यदि अनुबंध विस्तार से संबंधित कोई भी पत्राचार 30 सितंबर 2026 की समयसीमा बीत जाने के उपरांत प्राप्त होता है, तो वह केवल उसी तिथि से प्रभावी माना जाएगा जिस दिन नाईलिट शिमला औपचारिक रूप से एक्सटेंशन लेटर जारी करेगा। इसका सीधा अर्थ यह है कि राज्य सरकार जब तक एजेंसी के साथ अनुबंध का नवीनीकरण नहीं करती, तब तक इन कर्मियों की सेवा बहाली संभव नहीं हो सकेगी।
लंबित वेतन और नीतिगत वादों के बीच कर्मचारियों का दर्द
विभाग के कार्यालयों में तैनात आउटसोर्स कर्मियों के भीतर इस घटनाक्रम के बाद गहरा असंतोष और निराशा देखने को मिल रही है। नाम न उजागर करने का आग्रह करते हुए एक कर्मी ने अपनी आपबीती साझा करते हुए बताया कि वे कई महीनों से वेतन न मिलने की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं और वर्तमान में भी उनका कई महीनों का पारिश्रमिक बकाया पड़ा हुआ है। कर्मचारियों का कहना है कि मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने पूर्व में आउटसोर्स कर्मचारियों के कल्याण और स्थायित्व के लिए एक ठोस नीति तैयार करने की बात कही थी, लेकिन धरातल पर अब उनकी सेवाएं ही छिनने की नौबत आ गई है। एजेंसी की ओर से नए सिरे से करार किए जाने को लेकर कोई स्पष्ट रुख सामने न आने से सैकड़ों परिवारों के सामने आर्थिक भरण-पोषण की विकट चुनौती खड़ी हो गई है।



















