नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट (NEET-UG) की परीक्षा में धांधली और पेपर लीक के मामलों को लेकर देश भर के अभ्यर्थियों में भारी रोष देखा गया। इस गंभीर विषय पर छात्रों और युवाओं की चिंताओं को शांत करने के इरादे से देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया पर एक विस्तृत वीडियो संदेश साझा किया था। हालांकि, यह मामला तब एक बड़े राजनीतिक और टेक विवाद में बदल गया जब फेसबुक ने पीएम नरेंद्र मोदी के इस वेरिफाइड वीडियो को अपने प्लेटफॉर्म से अचानक हटा दिया। इस अप्रत्याशित कदम के बाद सोशल मीडिया की दिग्गज कंपनी मेटा (Meta) को केंद्र सरकार के कड़े रुख का सामना करना पड़ा। सरकार की सख्त आपत्ति के बाद मेटा के चीफ ग्लोबल अफेयर्स ऑफिसर जोएल कपलान ने केंद्रीय सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव से मुलाकात की और इस घटनाक्रम पर आधिकारिक रूप से माफी मांगी।
पीएम नरेंद्र मोदी का फेसबुक वीडियो और मेटा का अचानक उठाया गया कदम
23 जुलाई 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फेसबुक पर एक विशेष वीडियो जारी किया था। इस संबोधन में पीएम नरेंद्र मोदी ने देश के लाखों छात्रों और युवाओं (Gen Z) को आश्वस्त किया था कि नीट-यूजी पेपर लीक मामले में शामिल किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा और सरकार परीक्षाओं की पवित्रता बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है। लेकिन इस महत्वपूर्ण वीडियो संदेश के पोस्ट होने के कुछ ही समय बाद यह अचानक फेसबुक से गायब हो गया।
यूजर्स और मीडिया में यह खबर फैलते ही हड़कंप मच गया क्योंकि प्रधानमंत्री के वेरिफाइड अकाउंट से पोस्ट की गई सामग्री लगभग 5 से 6 घंटे तक फेसबुक पर दिखाई नहीं दे रही थी। शुरुआत में मेटा की ओर से इस कंटेंट रिस्ट्रिक्शन पर कोई स्पष्टीकरण जारी नहीं किया गया। किसी भी टेक प्लेटफॉर्म द्वारा देश के शीर्ष नेतृत्व के वेरिफाइड पोस्ट को बिना किसी पूर्व सूचना या स्पष्ट नीतिगत उल्लंघन के हटा दिया जाना एक अत्यंत संवेदनशील मामला बन गया। इसके बाद टेक गलियारों से लेकर राजनीतिक हलकों तक मेटा की भूमिका पर गंभीर सवाल उठने लगे।
केंद्र सरकार की सख्त कार्रवाई और जोएल कपलान की पेशी
फेसबुक द्वारा प्रधानमंत्री का वीडियो हटाए जाने की घटना पर भारत सरकार ने कड़ा रुख अपनाया। केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने इसे गंभीरता से लेते हुए मेटा के शीर्ष प्रबंधन से तुरंत जवाब तलब किया। सरकार ने यह स्पष्ट किया कि वेरिफाइड प्रोफाइल और देश के प्रधान के आधिकारिक संदेशों को इस तरह से सेंसर या प्रतिबंधित करना स्वीकार्य नहीं है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार ने मेटा के चीफ ग्लोबल अफेयर्स ऑफिसर जोएल कपलान को तलब किया। जोएल कपलान ने नई दिल्ली में सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव के साथ एक उच्चस्तरीय बैठक की। इस बैठक के दौरान कपलान ने मेटा की तरफ से बिना शर्त माफी पेश की। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह कार्रवाई किसी दुर्भावना या जानबूझकर की गई सेंसरशिप का हिस्सा नहीं थी, बल्कि एक आंतरिक ऑपरेशनल एरर (संचालन संबंधी तकनीकी चूक) का नतीजा थी।
मंत्रालय के साथ हुई इस वार्ता के बाद जोएल कपलान ने कहा, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पोस्ट पर लगी पाबंदी की गलती के लिए मैंने मेटा की ओर से मंत्री से क्षमा मांगी।” कंपनी ने आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया कि पिछले महीने प्रधानमंत्री के वीडियो पोस्ट पर जो अस्थाई प्रतिबंध लगा था, वह पूरी तरह से एक तकनीकी गड़बड़ी के कारण हुआ था। सरकार के कड़े रुख और मेटा के स्पष्टीकरण के बाद इस वीडियो को फेसबुक पर दोबारा बहाल कर दिया गया।
नीट-यूजी पेपर लीक विवाद और जंतर-मंतर का छात्र आंदोलन
मेटा से जुड़े इस पूरे विवाद की जड़ें नीट-यूजी परीक्षा धांधली के खिलाफ चल रहे व्यापक छात्र आंदोलन से जुड़ी हुई हैं। देश भर में पेपर लीक की खबरें सामने आने के बाद कॉकरोच जनता पार्टी की अगुआई में राजधानी दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर पर विशाल विरोध-प्रदर्शन आयोजित किया गया था। इस आंदोलन में देश के अलग-अलग राज्यों से पहुंचे हजारों छात्रों और युवाओं ने हिस्सा लिया और मामले की निष्पक्ष जांच व दोषियों की तत्काल गिरफ्तारी की मांग की।
यह प्रदर्शन उस वक्त और अधिक उग्र हो गया जब 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर जमा भीड़ ने संसद भवन की तरफ मार्च करने की कोशिश की। इस दौरान प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाबलों के बीच तीखी झड़प देखने को मिली। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए सुरक्षाबलों द्वारा बल प्रयोग किया गया। प्रदर्शनकारियों की ओर से यह गंभीर आरोप भी लगाया गया कि भीड़ पर पैलेट गन का इस्तेमाल किया गया था, हालांकि प्रशासनिक अधिकारियों ने इस दावे का पूरी तरह से खंडन किया।
छात्रों के बढ़ते आक्रोश के बीच सरकार ने वार्ता का रास्ता अपनाया। जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों के प्रतिनिधियों और सरकारी अधिकारियों के बीच कई दौर की बातचीत हुई, जिसके बाद जंतर-मंतर पर धरना समाप्त किया गया। छात्रों के दबाव के चलते ही सरकार ने संसद के भीतर एंटी पेपर लीक संशोधन विधेयक पेश कर उसे सर्वसम्मति से पारित कराया। इसके अलावा मामले में लिप्त कई मुख्य आरोपियों को गिरफ्तार भी किया गया। छात्र आंदोलन की व्यापकता का ही असर था कि तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था।
प्रदर्शनों को हवा देने में सोशल मीडिया और व्हाट्सएप की भूमिका
जंतर-मंतर आंदोलन के दौरान यह बात भी सामने आई कि देशव्यापी युवाओं को एक मंच पर लाने में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और मैसेजिंग ऐप्स ने कितनी अहम भूमिका निभाई। नीट-यूजी मामले में भी दिल्ली समेत देश के दूर-दराज इलाकों से छात्रों को लामबंद करने के लिए व्हाट्सएप (WhatsApp) का भारी इस्तेमाल किया गया था। ग्रुप्स और ब्रॉडकास्ट मैसेज के जरिए 20 जुलाई के संसद मार्च का संदेश लाखों युवाओं तक पहुंचाया गया था।
गौरतलब है कि वर्तमान दौर में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स सिर्फ संचार का साधन नहीं रहे, बल्कि बड़े जनआंदोलनों को दिशा देने और भीड़ जुटाने का प्रमुख जरिया बन चुके हैं। हाल के महीनों में दक्षिण एशिया के विभिन्न देशों जैसे बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका में सोशल मीडिया के जरिए बड़े पैमाने पर जनसहयोग और प्रदर्शन आयोजित किए गए। नेपाल और बांग्लादेश में तो सोशल मीडिया पर शुरू हुए आंदोलनों ने राजनीतिक तख्तापलट तक की स्थिति पैदा कर दी और वहां की तत्कालीन सरकारों को सत्ता छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा था। यही वजह है कि जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान भी सोशल मीडिया गतिविधियों पर सरकार की पैनी नजर बनी हुई थी।



















