अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और वैश्विक व्यापार के मंच पर एक बार फिर रणनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका ने एक नया कानून मंजूर किया है, जिसके तहत रूस से कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले बड़े देशों पर 100 प्रतिशत तक दंडात्मक टैरिफ लगाने का कानूनी अधिकार अमेरिकी प्रशासन को मिल गया है। दूसरी ओर, स्वयं अमेरिका ने अपनी घरेलू ऊर्जा जरूरतों और असैन्य परमाणु रिएक्टरों के लिए रूस से यूरेनियम आपूर्ति का रास्ता खुला रखा है। इस दोहरे रुख के बीच भारत पर पड़ने वाले संभावित आर्थिक दबाव को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं, लेकिन भारतीय कूटनीति ने पिछले कुछ महीनों में वैश्विक स्तर पर अपने व्यापारिक और रणनीतिक विकल्पों का दायरा अभूतपूर्व रूप से विस्तृत कर लिया है।
लिंडसे ओ. ग्राहम कानून और 100 फीसदी टैरिफ का प्रावधान
अमेरिकी संसद के उच्च सदन सीनेट के बाद निचले सदन हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट, 2026 को मंजूरी दी गई। सदन में मतदान के दौरान इस विधेयक के पक्ष में 262 वोट पड़े, जबकि विरोध में 159 वोट दर्ज किए गए। इसके बाद 18 सितंबर को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस विधेयक पर आधिकारिक हस्ताक्षर कर इसे कानून का रूप दे दिया। इस कानून का प्राथमिक उद्देश्य मॉस्को के राजस्व स्रोतों पर अंकुश लगाना है, जिसके तहत रूसी ऊर्जा उत्पादों के बड़े आयातक देशों पर 100 फीसदी तक आयात शुल्क लगाया जा सकता है।
हालांकि, इस नए कानून के प्रावधानों में यह भी स्पष्ट किया गया है कि 100 प्रतिशत टैरिफ अपने आप तुरंत लागू नहीं हुआ है। कानून के जरिए अमेरिकी राष्ट्रपति को शुल्क अधिरोपित करने का कानूनी अधिकार सौंपा गया है, साथ ही विशेष परिस्थितियों में छूट प्रदान करने की शक्तियां भी दी गई हैं। इससे पूर्व फरवरी 2026 में भी दोनों देशों के बीच व्यापारिक बातचीत का एक दौर देखा गया था। उस समय अमेरिका ने भारत पर पहले से लागू अतिरिक्त 25 प्रतिशत रूस-लिंक्ड टैरिफ को वापस ले लिया था। उस दौरान दोनों पक्षों के बीच सामने आए द्विपक्षीय व्यापार ढांचे में अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर अपने पारस्परिक शुल्क को 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करने की बात भी रखी थी।
परमाणु ऊर्जा का आयात और दोहरे मानकों का सवाल
एक तरफ जहां वॉशिंगटन द्वारा तीसरे देशों को रूस से जीवाश्म ईंधन न खरीदने की नसीहतें दी जाती हैं, वहीं दूसरी तरफ स्वयं अमेरिका के असैन्य परमाणु ऊर्जा क्षेत्र की निर्भरता पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाई है। नए कानून के भीतर ही अमेरिका और रूस के बीच चुनिंदा असैन्य परमाणु सहयोग को प्रतिबंधों से विशेष छूट दी गई है। इसके तहत अमेरिकी रिएक्टरों के संचालन के लिए आवश्यक रूसी कम-संवर्धित यूरेनियम यानी लो-एनरिच्ड यूरेनियम (LEU) के आयात के लिए अपवाद सुरक्षित रखे गए हैं।
अमेरिकी एनर्जी इंफॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में अमेरिकी परमाणु रिएक्टर संचालकों द्वारा खरीदी गई कुल विदेशी यूरेनियम संवर्धन सेवाओं में अकेले रूस की हिस्सेदारी लगभग 26 फीसदी दर्ज की गई थी। हालांकि अमेरिका अपनी घरेलू परमाणु ईंधन आपूर्ति श्रृंखला को आत्मनिर्भर बनाने के प्रयासों में जुटा है, लेकिन मौजूदा वास्तविकता यह दर्शाती है कि ऊर्जा सुरक्षा का संतुलन साधना किसी भी बड़े देश के लिए एक दीर्घकालिक और जटिल प्रक्रिया है।
भारत की रणनीतिक विविधता और नए व्यापारिक समझौते
ऊर्जा और व्यापार के मोर्चे पर किसी एक देश अथवा स्रोत पर अत्यधिक निर्भरता से बचने के लिए भारत ने अपनी कूटनीतिक रणनीति को व्यापक रूप दिया है। अगस्त 2025 के बाद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विभिन्न महाद्वीपों के कई प्रमुख देशों की द्विपक्षीय यात्राएं कीं। इन यात्राओं का केंद्र केवल कूटनीतिक औपचारिकताएं नहीं, बल्कि ठोस निवेश, ऊर्जा सुरक्षा, आधुनिक प्रौद्योगिकी और रक्षा क्षेत्र में दीर्घकालिक साझेदारी स्थापित करना रहा।
इस आर्थिक विविधीकरण अभियान के तहत यूरोपीय संघ के साथ मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) की बातचीत पूरी की गई। इसके साथ ही यूनाइटेड किंगडम के साथ व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (सीईपीए) को गति दी गई, जबकि यूरोपियन फ्री ट्रेड एसोसिएशन (ईएफटीए) के सदस्य देशों के साथ व्यापार के साथ-साथ बड़े पूंजीगत निवेश की प्रतिबद्धताएं जोड़ी गईं। फ्रांस के साथ अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी सहयोग और द्विपक्षीय व्यापार बढ़ाने पर जोर दिया गया, वहीं संयुक्त अरब अमीरात के साथ कच्चे तेल, एलपीजी, रक्षा विनिर्माण और संस्थागत निवेश के क्षेत्रों में रणनीतिक गठबंधन और मजबूत किया गया। इटली के साथ वर्ष 2029 तक द्विपक्षीय व्यापार को 20 अरब यूरो तक पहुंचाने का स्पष्ट वित्तीय लक्ष्य तय किया गया।
कनेक्टिविटी कॉरिडोर और वैश्विक निवेश की दिशा
वैश्विक समुद्री मार्गों, विशेष रूप से लाल सागर में लगातार बने तनाव और लॉजिस्टिक्स से जुड़ी अनिश्चितताओं को देखते हुए वैकल्पिक व्यापार गलियारों की उपयोगिता अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई है। इसी परिप्रेक्ष्य में भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (आईएमईसी) के विकास को प्राथमिकता दी जा रही है ताकि भारत से यूरोपीय बाजारों तक सीधी और निर्बाध कनेक्टिविटी सुनिश्चित हो सके।
कूटनीतिक सक्रियता के इस क्रम में मई महीने के दौरान प्रधानमंत्री द्वारा पांच प्रमुख देशों का आधिकारिक दौरा किया गया। भारतीय विदेश मंत्रालय के आधिकारिक बयानों के अनुसार, इस बहुपक्षीय दौरे के दौरान देश में लगभग 40 अरब डॉलर की नई निवेश प्रतिबद्धताएं हासिल की गईं। इसी राजनयिक विस्तार के तहत न्यूजीलैंड में करीब चार दशकों के लंबे अंतराल के बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री का आधिकारिक दौरा संपन्न हुआ। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में रणनीतिक पकड़ मजबूत करने के लिए इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया की यात्राएं की गईं, वहीं मध्य एशिया में क्षेत्रीय स्थिरता और व्यापार संवर्धन के लिए उज्बेकिस्तान और किर्गिस्तान के शीर्ष नेतृत्व के साथ वार्ताएं हुईं। इसके समानांतर, जी7 शिखर सम्मेलन के अवसर पर फ्रांस में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ भी द्विपक्षीय संवाद जारी रखा गया। इस बहुआयामी कूटनीति के माध्यम से भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपने आर्थिक हितों की रक्षा के लिए किसी एक वैश्विक शक्ति के दबाव में आए बिना बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था के साथ सक्रिय रूप से जुड़ने में सक्षम है।























