सुप्रीम कोर्ट में अपने विदाई समारोह के दौरान जस्टिस संजय करोल का संबोधन केवल कानूनी औपचारिकताओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसमें जीवन के गहरे अनुभव और मानवीय संवेदनाओं की झलक साफ दिखाई दी. अपने लगभग चालीस साल के लंबे न्यायिक करियर के समापन पर उन्होंने अदालत की जिम्मेदारियों, न्याय की मूल भावना और न्यायपालिका के मानवीय चेहरे को रेखांकित किया. साल 1986 में एक युवा वकील के रूप में सुप्रीम कोर्ट के कोर्टरूम नंबर-1 में कदम रखने से लेकर देश की शीर्ष अदालत के न्यायाधीश के रूप में सेवा देने तक के सफर को याद करते हुए उन्होंने कहा कि यह पूरी यात्रा अधिकार जताने से ज्यादा जिम्मेदारी निभाने और विनम्र रहने की सीख देती है.
पटना की सीख और पद की जिम्मेदारी का सही अर्थ
अपने अनुभव साझा करते हुए जस्टिस संजय करोल ने पटना में बिताए समय को विशेष रूप से याद किया. उन्होंने बताया कि पटना ने उन्हें जीवन और न्याय का एक महत्वपूर्ण पाठ पढ़ाया, जिसे वे एक व्यावहारिक सीख के रूप में देखते हैं. उन्होंने कहा कि शिष्टाचार और सम्मान देने की एक साधारण सी आदत से परिस्थितियां बदल सकती हैं. उनके शब्दों में, एक प्रणाम कई परिणामों को बदलने की क्षमता रखता है. इसके साथ ही उन्होंने न्यायाधीश की कुर्सी और व्यक्ति के संबंध पर एक विचारणीय सवाल उठाया कि व्यक्ति कुर्सी पर बैठा है या कुर्सी उस व्यक्ति पर हावी हो चुकी है. उनके अनुसार, किसी भी संवैधानिक पद पर बैठने का अर्थ केवल अधिकारों का प्रयोग करना नहीं है, बल्कि उस पद से जुड़ी जिम्मेदारियों और आम जनता के भरोसे को समझना सबसे ज्यादा जरूरी है. उन्होंने यह भी सलाह दी कि फैसला लेने से पहले दूसरों की बात को ध्यानपूर्वक सुनना अनिवार्य है, जिसके बाद ही उचित कदम उठाना चाहिए.
याचिका के पीछे की मानवीय जिंदगी को समझना
अदालती कार्यवाही का जिक्र करते हुए जस्टिस करोल ने कहा कि जज के सामने आने वाली फाइलें केवल कागजी दस्तावेज या याचिकाएं नहीं होतीं, बल्कि उनके पीछे किसी जीवित व्यक्ति की उम्मीदें, परेशानियां और जीवन की वास्तविक स्थितियां छिपी होती हैं. उन्होंने स्पष्ट किया कि केस से जुड़े कागजात कभी भी इस बात का पूरा अंदाजा नहीं दे सकते कि किसी व्यक्ति ने अपनी जिंदगी में क्या खोया है या वह अदालत से वास्तव में किस तरह की राहत चाहता है. इसलिए, केवल कानूनी दलीलों को सुनना ही न्याय की प्रक्रिया को पूरा नहीं करता. किसी भी मामले में सही निर्णय तक पहुंचने के लिए संबंधित व्यक्ति की परिस्थितियों और उसकी मानवीय पीड़ा को महसूस करना बेहद आवश्यक है.
न्यायाधीशों के लिए विनम्रता और संविधान की व्यावहारिक परीक्षा
न्यायिक प्रक्रिया की सीमाओं को स्वीकार करते हुए उन्होंने कहा कि न्यायाधीश भगवान नहीं होते और उनसे यह उम्मीद करना कि उनका हर फैसला हमेशा बिल्कुल सही होगा, व्यावहारिक नहीं है. हालांकि, फैसले की प्रक्रिया में विनम्रता और संवेदनशीलता का होना अनिवार्य है. उन्होंने जोर देकर कहा कि देश का संविधान न्यायाधीशों से केवल कानूनों को तकनीकी रूप से लागू करने की अपेक्षा नहीं रखता, बल्कि यह मांग करता है कि कानूनों का इस्तेमाल न्यायपूर्ण और मानवीय तरीके से किया जाए. अपने विचार को एक आम उदाहरण से जोड़ते हुए उन्होंने कहा कि सड़क के चौराहे पर खड़े ट्रैफिक कांस्टेबल की लाठी और सीटी में भी संविधान की ही आवाज गूंजती है. संविधान का असली परीक्षण केवल उच्च अदालतों के कमरों में नहीं, बल्कि आम नागरिकों के दैनिक जीवन में होता है, विशेषकर तब जब किसी समाज के सबसे कमजोर या आवाजहीन व्यक्ति की बात सुनी जाती है.
युवा वकीलों को संदेश और बिना किसी पछतावे के विदाई
अपने संबोधन में उन्होंने युवा अधिवक्ताओं का उत्साहवर्धन करते हुए कहा कि उन्हें अदालत की बेंच से घबराने या अपनी बात रखने में संकोच करने की कोई जरूरत नहीं है. उन्होंने कहा कि जो वकील अदालत के समक्ष सादगी से और अपनी सीमित क्षमता में भी ईमानदारी से पक्ष रखते हैं, वे हमारी न्याय व्यवस्था का अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. उन्होंने युवा वकीलों को अपने पेशे पर विश्वास बनाए रखने, पूरी तैयारी के साथ आने, निष्पक्ष रहने और शिष्टाचार का पालन करने का सुझाव दिया. इसके अलावा, उन्होंने कहा कि हर आम नागरिक भी अपने रोजमर्रा के फैसलों और व्यवहार के माध्यम से एक जज की भूमिका निभाता है, जहां किसी को माफ करना और दूसरों के साथ सम्मानपूर्वक पेश आना न्याय का ही एक रूप है. अपने भाषण के अंत में उन्होंने बार, अपने सहकर्मियों, अदालती कर्मचारियों, याचिकाकर्ताओं और अपने परिवार का आभार प्रकट करते हुए कहा कि वे संविधान और देश की सेवा का अवसर मिलने पर अत्यंत कृतज्ञ हैं और बिना किसी अफसोस के इस मंच से विदा ले रहे हैं.



















