हिंदी और भारतीय सिनेमा की अनुभवी अभिनेत्री सुष्मिता मुखर्जी ने अपने शानदार करियर में कई प्रसिद्ध फिल्मों में अभिनय किया है। उन्होंने 'किंग अंकल', 'गोलमाल', 'खलनायक' और 'दोस्ताना' जैसी बड़ी ब्लॉकबस्टर फिल्मों में अपनी अदाकारी की अमिट छाप छोड़ी है। इसके बावजूद उनकी पेशेवर और व्यक्तिगत जिंदगी में एक ऐसा भयानक दौर आया, जिसने उन्हें अत्यंत कठिन फैसले लेने पर मजबूर कर दिया। हाल ही में सुष्मिता मुखर्जी ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर एक भावुक वीडियो साझा करते हुए उस दौर का कड़वा सच बयां किया है, जब वित्तीय लाचारी के कारण उन्हें कई निम्नस्तरीय यानी सी-ग्रेड फिल्मों में काम स्वीकार करना पड़ा था। साल 2002 में अपना मीडिया प्रोडक्शन हाउस डूब जाने के कारण उन पर करीब 1 करोड़ रुपये का भारी कर्ज चढ़ गया था, जिसे चुकता करने के लिए उनके पास काम करने के अलावा कोई अन्य रास्ता नहीं बचा था।
प्रयास प्रोडक्शंस का डूबना और 1 करोड़ रुपये का भारी कर्ज
सुष्मिता मुखर्जी ने अपनी आपबीती सुनाते हुए उस मुख्य कारण पर प्रकाश डाला जिसने उनकी वित्तीय स्थिति को पूरी तरह बिगाड़ दिया था। उन्होंने बताया कि वर्ष 2002 में उनका और उनके पति का मीडिया प्रोडक्शन हाउस 'प्रयास प्रोडक्शंस' पूरी तरह से बंद हो गया था। उस समय भारतीय मनोरंजन उद्योग में तकनीक का नया दौर शुरू हो रहा था और एंजेल इन्वेस्टर्स तथा वेंचर कैपिटल जैसी नई अवधारणाएं बाजार में आ चुकी थीं। सुष्मिता और उनके पति को इन व्यावसायिक प्रणालियों के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। इस तकनीकी व वित्तीय बदलाव के कारण न केवल उनकी अपनी कंपनी डूबी, बल्कि उस दौर में 'ट्रैक सिनेमा' और 'अनिल चौधरी प्रोडक्शंस' जैसी अन्य संस्थाएं भी कंगाल हो गईं। इसके परिणामस्वरूप सुष्मिता मुखर्जी पर अचानक 1 करोड़ रुपये की बड़ी देनदारी आ गई।
लेनदारों का खौफ, प्रताड़ना और सी-ग्रेड फिल्मों की मजबूरी
कर्ज में डूबने के बाद का समय सुष्मिता मुखर्जी और उनके परिवार के लिए बेहद भयानक साबित हुआ। उनके घर के दरवाजे पर लेनदार और रिकवरी एजेंट आने लगे थे, जो खुलेआम गाली-गलौज और बदतमीजी करते थे। उस समय उनके बच्चे बहुत छोटे थे और घर का माहौल अत्यधिक तनावपूर्ण हो गया था। ऐसी आपातकालीन स्थिति में अपने परिवार और बच्चों की सुरक्षा के लिए सुष्मिता मुखर्जी को दोबारा काम की तलाश में निकलना पड़ा। उन्होंने बताया कि जब किसी प्रशंसक ने उनसे पूछा कि उन्होंने इतनी खराब फिल्मों का चुनाव क्यों किया, तो वह सवाल उनके दिल में छुप गया। सुष्मिता ने स्वीकार किया कि हालांकि उन्होंने बहुत खराब और महिलाओं को नीचा दिखाने वाली फिल्मों में अभिनय किया, लेकिन वे फिल्में कम से कम अश्लील नहीं थीं। उन्होंने अफसोस जताते हुए कहा कि उस समय लेनदारों को पैसे चुकाने के लिए उनके पास अपनी आत्मा बेचने जैसा कदम उठाने के सिवा कोई विकल्प नहीं था।
बेटी की विदेश में शिक्षा और 3 से 4 साल का कड़ा संघर्ष
वित्तीय देनदारियों के साथ-साथ एक मां के रूप में सुष्मिता मुखर्जी की अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियां भी थीं। एक बंगाली मां होने के नाते वह चाहती थीं कि उनकी होनहार बेटी को दुनिया की बेहतरीन शिक्षा मिले। यद्यपि उनके पति राष्ट्रवादी विचारों के थे और उनका मानना था कि भारत में ही पर्याप्त अच्छे शिक्षण संस्थान मौजूद हैं, फिर भी सुष्मिता का सपना अपनी बेटी को उच्च शिक्षा के लिए विदेश भेजने का था। उनकी बेटी ने ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जाकर पढ़ाई की, जिसका खर्च बेहद अधिक था। 1 करोड़ रुपये का कर्ज चुकाने और अपनी बेटी की महंगी पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए सुष्मिता और उनके पति ने लगातार 3 से 4 वर्षों तक दिन-रात मेहनत की। सुष्मिता जो भी पैसा कमाती थीं, उसका बड़ा हिस्सा कर्ज की किश्तों में चला जाता था। इसी लाचारी के कारण उन्होंने उन प्रोजेक्ट्स को भी हां कहा, जिन पर आज उन्हें गर्व महसूस नहीं होता।
अतीत के फैसलों से सीख और वर्तमान जीवन की संतुष्टि
अपने जीवन के इस सफर का विश्लेषण करते हुए सुष्मिता मुखर्जी ने कहा कि हर इंसान को यह स्पष्ट पता होना चाहिए कि वह पैसा क्यों कमाना चाहता है। उन्होंने अपने जीवन में एक आम मध्यमवर्गीय जीवनशैली अपनाई, महीने-दर-महीने का बजट संभाला और अध्यापन का कार्य भी किया। उनका मानना है कि जब इंसान के मन में अपनी जरूरतें और प्राथमिकताएं स्पष्ट होती हैं, तो कठिन समय में फैसले लेना आसान हो जाता है। यद्यपि उन्हें उन सी-ग्रेड फिल्मों पर कोई गर्व नहीं है, लेकिन उस समय के भयानक हालात के हिसाब से उनका निर्णय अपने परिवार को उबारने के लिए सही था। आज सुष्मिता मुखर्जी एक सफल मुकाम पर हैं और केवल वही काम स्वीकार करती हैं जो उनके दिल को छूता है। अब वह अपने मनमुताबिक प्रोजेक्ट्स चुनकर बेहद खुश और संतुष्ट जीवन बिता रही हैं।



















