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अमर भूपाली से लेकर असली शेरों संग शूटिंग तक, पर्दे पर सादगी और हैरतअंगेज अभिनय रचने वाली संध्या की अनसुनी दास्तानबॉलीवुड
4 अक्तू॰ 2026, 4:24 am (2 घंटे पहले)· 0

अमर भूपाली से लेकर असली शेरों संग शूटिंग तक, पर्दे पर सादगी और हैरतअंगेज अभिनय रचने वाली संध्या की अनसुनी दास्तान

मशहूर फिल्म निर्माता वी. शांताराम की क्लासिक फिल्मों में यादगार अभिनय और नृत्य प्रस्तुत करने वाली दिग्गज अदाकारा संध्या का जीवन असाधारण कला साधना और सादगी की मिसाल रहा।

भारतीय सिनेमा के स्वर्णिम दौर में कई ऐसी अभिनेत्रियां हुईं जिन्होंने न सिर्फ किरदारों को जिया, बल्कि पर्दे पर अभिनय की नई परिभाषाएं गढ़ीं। इन्हीं में एक प्रमुख नाम संध्या का है, जिनका असल नाम विजया देशमुख था। 27 सितंबर 1938 को कोच्चि में जन्मी विजया के परिवार का जुड़ाव सीधे तौर पर थिएटर जगत से था। यही वजह रही कि कला और अभिव्यक्ति के संस्कार उन्हें बचपन में ही विरासत के रूप में मिले। अभिनय की दुनिया में बेहतर मौकों की तलाश उन्हें अपनी बहन वत्सला देशमुख के साथ बंबई ले आई। इसके बाद उनके पूरे सफर की दिशा तब बदल गई, जब उन्होंने विख्यात फिल्म निर्देशक वी. शांताराम द्वारा 1951 में बनाई गई मराठी फिल्म ‘अमर भूपाली’ के सिलसिले में निकले एक अखबार के विज्ञापन पर आवेदन किया।

ऑडिशन की अनोखी आवाज और नया नाम

जब शांताराम ने विजया देशमुख का ऑडिशन लिया, तो वे उनकी खास आवाज से खासे प्रभावित हुए। उनकी आवाज काफी हद तक शांताराम की दूसरी पत्नी और प्रतिष्ठित अदाकारा जयश्री की आवाज से मेल खाती थी। इसी फिल्म के जरिए विजया को उनका नया फिल्मी नाम संध्या मिला। ‘अमर भूपाली’ में उन्होंने गुणवती नाम का किरदार निभाया। यह संगीतमय फिल्म कलात्मक दृष्टि से बेहद सफल साबित हुई और इसे 1952 के कान्स फिल्म फेस्टिवल में प्रतिष्ठित ‘पाल्मे डी ओर’ सम्मान की दौड़ में नॉमिनेशन भी हासिल हुआ।

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कठिन रियाज और राष्ट्रीय पुरस्कार की दास्तान

फिल्मी पर्दे पर अपने अद्भुत नृत्य से पहचान बनाने वाली संध्या अपने शुरुआती दिनों में प्रशिक्षित डांसर बिल्कुल नहीं थीं। जब 1955 में आई रंगीन फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ में उन्हें काम करने का अवसर मिला, तो उन्होंने मशहूर नर्तक गोपी कृष्ण के साथ कदम मिलाने के लिए कई महीनों तक लगातार कड़ा अभ्यास किया। फिल्म में नीला के रूप में उनका शिव तांडव और बेहद बारीक भावपूर्ण नृत्य उनकी जबरदस्त लगन का उदाहरण बन गया। उनकी इस कठिन साधना के दम पर 1955 में ‘झनक झनक पायल बाजे’ को नेशनल अवॉर्ड से नवाजा गया।

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सम्मान और खिलौने बेचने वाली चंपा

संध्या के करियर का एक और अहम पड़ाव फिल्म ‘दो आंखें बारह हाथ’ साबित हुई, जिसमें उन्होंने चंपा नाम की खिलौने बेचने वाली महिला की भूमिका निभाई थी। मानवीय संवेदनाओं से भरी यह फिल्म दुनिया भर में सराही गई और इसे बर्लिन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में सिल्वर बियर अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। इसके साथ ही हॉलीवुड फॉरेन प्रेस ने इस सिनेमाई रचना को प्रतिष्ठित सैमुअल गोल्डविन अवॉर्ड प्रदान किया।

बिना बॉडी डबल असली शेरों के साथ शूटिंग का जोखिम

फिल्म ‘दो आंखें बारह हाथ’ के गीत ‘सैयां झूठों का बड़ा सरताज निकला’ में संध्या ने सिर पर टोकरी संभाली, हाथ में रावणहत्था वाद्ययंत्र बजाया और थिरकते हुए चेहरे पर कई जटिल भाव उकेरे, जिसने उनकी अनोखी मल्टीटास्किंग प्रतिभा को उजागर किया। अभिनय के प्रति उनका यह समर्पण सिर्फ नृत्य तक सीमित नहीं रहा। 1961 में प्रदर्शित फिल्म ‘स्त्री’ के दौरान उन्होंने असली शेरों के साथ दृश्य फिल्माए। इसके लिए उन्होंने शेरों के ट्रेनर्स के साथ समय बिताकर उनकी हरकतों और मिजाज को समझा। बिना किसी बॉडी डबल की मदद लिए उन्होंने सीधे खूंखार शेरों के साथ बेहद जोखिम भरे सीन खुद कैमरे के सामने दिए।

तमाशा लोकनृत्य और फिल्मफेयर मराठी पुरस्कार

उम्र के लगभग 40वें पड़ाव पर संध्या ने एक तमाशा नर्तकी चंद्रकला का साहसिक किरदार निभाया, जो कहानी में एक आदर्शवादी स्कूल मास्टर के पतन की वजह बनती है। इस प्रस्तुति ने महाराष्ट्र के पारंपरिक लावणी लोकनृत्य की जीवंत ऊर्जा को बड़े पर्दे के माध्यम से आम दर्शकों तक पहुंचाया। चर्चित गीत ‘मला लागली कुणाची उचकी’ में अपनी जानदार प्रस्तुति के दम पर उन्होंने बेस्ट एक्ट्रेस का फिल्मफेयर (मराठी) अवॉर्ड अपने नाम किया। इसके बाद 1975 में आई फिल्म ‘चंदनाची चोली अंग अंग जाली’ के लिए उन्हें एक बार फिर इसी श्रेणी में फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

निजी जिंदगी, समर्पण और शांत अंतिम विदाई

संध्या और वी. शांताराम का विवाह 22 दिसंबर 1956 को हुआ था। सिनेमाई सफर के दौरान उन्होंने महबूब खान जैसे उस दौर के दिग्गज निर्देशकों के बड़े और लुभावने प्रस्तावों को भी ठुकरा दिया, क्योंकि उन्होंने अपना समूचा करियर केवल शांताराम की सिनेमाई सोच और विजन के लिए समर्पित करने का निर्णय लिया था। 1970 के दशक के अंतिम वर्षों में फिल्मों से विदा लेने के बाद उन्होंने सार्वजनिक आयोजनों से पूरी दूरी बना ली। साल 2009 में ‘नवरंग’ की 50वीं वर्षगांठ पर आयोजित वी. शांताराम अवॉर्ड सेरेमनी में उनकी उपस्थिति बेहद दुर्लभ मौकों में से एक थी। जीवन के ढलते वर्षों में वे राजकमल स्टूडियो में शांत और एकांतवास की जिंदगी बिताती रहीं। 4 अक्टूबर 2025 को उम्र संबंधी स्वास्थ्य दिक्कतों के चलते उनका निधन हुआ और दादर स्थित शिवाजी पार्क श्मशान घाट पर उन्हें अंतिम विदाई दी गई।

सवाल-जवाब

संध्या का असली नाम क्या था और उनका जन्म कब हुआ था?
संध्या का असली नाम विजया देशमुख था और उनका जन्म 27 सितंबर 1938 को कोच्चि में हुआ था।
उन्हें सिनेमा में पहला ब्रेक किस फिल्म से मिला था?
उन्हें पहला ब्रेक वी. शांताराम की 1951 की मराठी फिल्म ‘अमर भूपाली’ में मिला, जिसके लिए उन्होंने अखबार के विज्ञापन पर आवेदन किया था।
‘झनक झनक पायल बाजे’ के लिए संध्या ने क्या खास तैयारी की थी?
वे पहले से प्रशिक्षित डांसर नहीं थीं, इसलिए उन्होंने नर्तक गोपी कृष्ण के साथ तालमेल बिठाने के लिए महीनों तक कड़ा प्रशिक्षण लिया था।
फिल्म ‘स्त्री’ में संध्या ने कौन सा साहसिक काम किया था?
1961 की फिल्म ‘स्त्री’ में उन्होंने बिना किसी बॉडी डबल के असली शेरों के साथ खतरनाक दृश्यों की शूटिंग खुद की थी।
संध्या को किन फिल्मों के लिए फिल्मफेयर मराठी पुरस्कार मिले?
उन्हें लावणी गीत ‘मला लागली कुणाची उचकी’ वाली फिल्म और 1975 की ‘चंदनाची चोली अंग अंग जाली’ के लिए बेस्ट एक्ट्रेस का फिल्मफेयर (मराठी) अवॉर्ड मिला।
संध्या का निधन कब और कहां हुआ?
उनका निधन 4 अक्टूबर 2025 को उम्र संबंधी बीमारियों के कारण हुआ और दादर के शिवाजी पार्क श्मशान घाट में अंतिम संस्कार किया गया।
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टिप्पणियाँ 4

Aisha Khan@aisha-khan·1 मिनट पहले

बिना बॉडी डबल के असली शेरों के साथ शूटिंग करने वाली बात पर थोड़ा यकीन करना मुश्किल लगता है। उस दौर में भी सुरक्षा के कुछ इंतजाम तो रहे होंगे, वरना रिस्क बहुत बड़ा था।

Riya Menon@riya-menon·1 मिनट पहले

आयशा जी, असली शेरों के साथ बिना बॉडी डबल के शूट करना सच में हैरान करने वाला है। उस जमाने के कलाकारों का डेडिकेशन आज के दौर में मिलना नामुमकिन है।

Tanvi Desai@tanvi-desai·23 मिनट पहले

संध्या जी का असली शेरों के साथ बिना बॉडी डबल के काम करना और झनक झनक पायल बाजे के लिए इतनी मेहनत करना वाकई कमाल है। आज के समय में ऐसा समर्पण शायद ही देखने को मिले।

Sneha Kulkarni@sneha-kulkarni·23 मिनट पहले

तनवी, बिल्कुल सही कहा आपने! जब मैं एक बार वी. शांताराम जी के परिवार से मिली थी, तब उन्होंने मुझे बताया था कि संध्या जी अपनी हर शूटिंग को कितनी शिद्दत से करती थीं।

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